भिंडरावाले : काँग्रेस की तुच्छ राजनीति का एक मोहरा

वर्ष 1977 के चुनाव में इंदिरा कांग्रेस की हार और पंजाब में अकाली दल की जीत से प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में सरकार बनी थी।

अकाली दल हर जगह कांग्रेस को हराता था जिसके चलते कांग्रेस प्रबंध कमेटी ने इसके लिए किसी ऐसे कद्दावर आदमी को खोज निकालने के लिए कहा जो अकालियों को टक्कर दे सके।

ज्ञानी ज़ैल सिंह, दरबार सिंह, स्वर्ण सिंह पंजाब राजनीति के बड़े नाम थे।

अपना वर्चस्व बढाने के लिए बेचैन ज्ञानी ज़ैल सिंह ने जरनैल सिंह भिंडरावाले की खोज की, जो दमदमी टकसाल का धार्मिक प्रचारक था और सिखिज़्म में दमदमी टकसाल की महत्ता बहुत ज्यादा मानी गई।

ज्ञानी ज़ैल सिंह ने ही भिंडरावाले को संजय गांधी से मिलवाया था, इसके लिए बाकयदा इंटरव्यू भी हुआ था।

पंजाब से दो आदमियों को चुना गया था जिसमें एक भिंडरावाले था। संजय गांधी को भिंडरावाले का अक्खड़पन और तीखे तेवर भा गए थे।

तब संजय गांधी के करीबी मित्र कमलनाथ ने इस बात को पत्रकार कुलदीप नैयर संग बातचीत में माना था कि वह लोग भिंडरावाले को कभी कभार आर्थिक मदद भी करते थे ताकि उसका कद और प्रभाव पंजाब में बढ़े और अकालियों को वह टक्कर दे सके। लेकिन उनको भी अपेक्षा नहीं थी कि भिंडरावाले आगे चल कर भस्मासुर बन जाएगा।

13 अप्रैल 1978 को अकाली और निरंकारियों में खूनी मुठभेड़ हुई जिसमें 13 अकाली सिख मारे गए। निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह के खिलाफ हरियाणा में मुकदमा चला और उनकी रिहाई भी हो गई जिसके चलते सिक्खों में रोष की भावना भड़कने लगी थी।

निरंकारी और अकालियो का बैर हमेशा से चलते आया हैं। दरअसल सिक्खों के अंतिम गुरु, गुरु गोविन्द सिंह जी ने यह आदेश दिया था कि उनके बाद गुरु ग्रन्थ साहिब (सिक्खों की पवित्र पुस्तक) ही सिक्खों के गुरु हैं।

और निरंकारी पंथ में जीवित डेरा प्रमुख को गद्दी मिलती हैं और वह संत या बाबा कहलाते हैं जिसे अकाली दल नहीं स्वीकारते हैं।

भिंडरावाले ने अकाली और निरंकारियों के झगड़े में एंट्री कर मूवमेंट अकाली से हथिया लिया और 24 अप्रैल 1980 को बाबा गुरबचन सिंह की हत्या होने से पूरे पंजाब के सूत्र उसके हाथ में चले गए क्योकि उनकी हत्या में शामिल लोगों का सम्बन्ध उसके संग था।

उसी दौर में कुलदीप नैयर भिंडरावाले से इन्टरव्यू के लिए गए थे। उन्होंने अपनी किताब में इस घटना का ज़िक्र भी किया हैं।

उन्होंने भिंडरावाले से पूछा था कि आपके साथ इतने हथियारबंद लोग क्यों रहते हैं?

भिंडरावाले ने पलट कर सवाल पूछा था कि पुलिस वालों संग इतने हथियार क्यों रहते हैं?

नैयर ने कहा कि पुलिस तो सरकार की नुमाइंदी हैं।

तब भिंडरावाले ने कहा कि उनसे जाकर कहना मुझसे टक्कर लेकर तो देखें, उन्हें पता चल जाएगा कि सरकार किसकी है।

यह बात चल ही रही थी कि देश के कद्दावर नेता स्वर्ण सिंह जो कि कांग्रेस शासन में रक्षा और विदेश मंत्री रह चुके थे, वह कमरे में आये और तख़्त पर बैठे भिंडरावाले के सामने हाथ जोड़ कर फर्श पर बैठ गए।

यह देख कुर्सी पर बैठे कुलदीप नैयर हड़बड़ा कर उठे और स्वर्ण सिंह से बोले कि, अरे आप यहाँ बैठिये।

तो स्वर्ण सिंह ने भिंडरावाले की तरफ देखते हुए कहा कि संतो के सामने मैं कुर्सी पर नहीं बैठ सकता, मैं यही ठीक हूँ।

इस घटना का ज़िक्र उस समय के कुलदीप नैयर ने अपनी किताब ‘बियॉन्ड द लाइन, एन ऑटोग्राफ’ में किया हैं।

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