सरदार : नेहरू को चीन-भारतीय कम्युनिस्टों से भारत को खतरे की चेतावनी और उपेक्षा

भारत में लोग सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्मदिन के वातावरण में, उनके जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं जिनके परिणाम स्वरूप 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुये राष्ट्र को आज के स्वरूप में नया भारत मिला है।

यह भारत का ही दुर्भाग्य था कि जिस नव स्वतंत्र राष्ट्र को क्षितिज पर, राजनीतिक रूप से व्यवाहरिक, दूरदर्शी व शत्रुओं को चिह्नित कर, निष्प्रभावित करने वाले सरदार पटेल जैसे व्यक्तित्व का साथ मिला, उनके परामर्श व चेतावनियों को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर 26 मई 2014 तक के सभी प्रधानमंत्रियों ने या तो उपेक्षा की या फिर वे उसको प्राथमिकता से क्रियान्वित करने में असफल रहे।

नेहरू द्वारा, भारत के आंतरिक मामलों में पटेल जी की जो उपेक्षा हुई उसके परिणाम तो आज हमारे सामने जम्मू कश्मीर व भारत में रुके पाकिस्तान समर्थक मुस्लिम वर्ग के कट्टरपंथ के रूप में सामने है, लेकिन विदेशी मामलों में पटेल के परामर्शों की, नेहरू द्वारा उपेक्षा करना, भारत को बहुत भारी पड़ा है।

सरदार पटेल भारत के प्रथम गृहमंत्री के साथ उपप्रधानमंत्री भी ज़रूर थे लेकिन वे स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के शिल्पकार नहीं थे। स्वतंत्रता के बाद, विदेश मंत्रालय को प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने अधीन ही रखा था। यही कारण था कि 1949 से चीन का तिब्बत को लेकर सामने आया दृष्टिकोण व उस पर जो भारत की प्रतिक्रिया थी, वह पूरी तरह नेहरू की थी और वह सरदार पटेल के परिधि क्षेत्र के बाहर था।

नेहरू की चीन के प्रति तुष्टिकरण की नीति व चीन द्वारा तिब्बत को अपना भूभाग मानने के कथानक की नेहरू द्वारा स्वीकार्यता ने जहां तत्कालीन विदेश सचिव सर गिरजा शंकर बाजपेयी को चिंतित कर दिया था, वहीं स्वयं नेहरू के मंत्रिमंडल में भी लोग इसको लेकर असहज हो गये थे।

चीन के मामले में नेहरू, विदेश सचिव सर बाजपेयी को किनारे करते हुये, अपने विश्वसनीय, चीन में स्थित भारत के राजदूत के के पणिक्कर से सीधे संवाद करते थे, जो माओ त्से तुंग से अभिभूत व चीन के दृष्टिकोण के समर्थक थे।

सरदार पटेल का विदेश मंत्रालय से कोई वास्ता नहीं था लेकिन फिर भी उन्हें चीनियों की मानसिकता की अन्य किसी भी भारतीय राजनेता से ज्यादा समझ थी और चीन की निष्ठा को लेकर उनका एक निश्चित दृष्टिकोण था।

अक्टूबर 1950 में जब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर कब्ज़ा कर लिया, तब नेहरू ने चीन की इस कार्यवाही का कोई विरोध नहीं किया बल्कि उसे स्वीकार कर लिया था। नेहरू के इस कृत्य पर सरदार पटेल बहुत व्यथित हुये और उन्होंने 7 नवम्बर 1950 को नेहरू को एक पत्र लिखा, जिसका एक एक कथन, भविष्यवाणी था। इस पत्र का ड्राफ्ट सर गिरजा शंकर बाजपेयी ने तैयार किया था।

इस पत्र के माध्यम से सरदार पटेल ने नेहरू को चीन को लेकर जो भी चेतावनियां दी थीं व उनकी अनदेखी करने पर भारत की सुरक्षा को लेकर भविष्य में आने वाले संकट को लेकर चेताया था, वो सब, 12 वर्ष बाद चीन द्वारा भारत पर आक्रमण किये जाने से न केवल सिर्फ सत्य हुई थी बल्कि आज भी 2018 में वे सारे संकट प्रासांगिक हैं।

उस पत्र में सरदार पटेल ने नेहरू को जो मुख्य बातें कही थीं, उन को ही मैं यहां लिपिबद्ध कर रहा हूँ। पटेल ने उसमें लिखा है कि “वर्तमान का कटु इतिहास हम को यही बताता है कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध कम्युनिज़्म, कोई ढाल नहीं है बल्कि कम्युनिस्ट उतना ही अच्छा या बुरा होता है, जितना एक साम्राज्यवादी होता है। चीन की अपने भूतकाल के साम्राज्य की सीमाओं को वर्तमान में भी मानने की वैचारिकी और कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद, पश्चिम की शक्तियों के विस्तारवाद और साम्राज्यवाद से बिल्कुल ही अलग है क्योंकि वो एक विचारधारा के आवरण में छुपा हुआ है, जो दस गुना ज्यादा खतरनाक है।”

“इस परिदृश्य में चीन की सीमाओं को लेकर उसकी महत्वाकांक्षा न सिर्फ हमारी (भारत) तरफ के हिमालय की ढलान है बल्कि असम के बहुत महत्वपूर्ण भाग भी है।”

“हमें प्राथमिकता से अपनी सैन्य स्थिति के स्थापन का परीक्षण करना होगा और सेना को प्रभावी रूप से वहां नियुक्त करना होगा जहां यह आवश्यक है। हमें यह करते हुये, सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मुख्य मार्गों व उन क्षेत्रों का विशेष ध्यान रखना होगा, जहां(चीन से) विवाद होने की आशंका है।”

“हमारी सीमायें शताब्दियों से तिब्बत के साथ लगी थीं और उससे हमारी सीमा सम्बन्धी सन्धि भी हुई है लेकिन वर्तमान में स्थिति सीमा विवाद की है क्योंकि चीन उस सन्धि में सम्मलित नहीं था।”

“अब तक हमारी प्रतिरक्षा का मापदंड, पाकिस्तान से सैन्य बल में हमारी श्रेष्ठता पर आधारित है। लेकिन अब हमको इसका इस आधार पर पुनर्मूल्यांकन करना होगा कि हमारी उत्तर और पूर्वोत्तर सीमाओं पर कम्युनिस्ट चीन आ गया है जिसकी महत्वाकांक्षाएं एवं उद्देश्य, हमारे प्रति मित्रवत नहीं है।”

“अब तक कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को, विदेश के कम्युनिस्टों से संपर्क व उनसे हथियार, साहित्य प्राप्त करने इत्यादि को लेकर दिक्कत थी। अब तक, भारत के कम्युनिस्टों को इस सब के लिये, बर्मा व पूर्वी पाकिस्तान की सीमाओं व विशाल समुद्री क्षेत्र के अवरोधों का सामना करना पड़ता था लेकिन अब उनको चीन के कम्युनिस्टों व उनके अपरोक्ष, विदेशी कम्युनिस्टों से सम्पर्क करने में आसानी होगी। अब जासूसों, देशद्रोहियों और कम्युनिस्टों को देश में घुसपैठ करने में सहूलियत होगी।”

“हम लोग अब तक, कम्युनिस्टों से उत्पन्न खतरों से तेलंगाना और वारंगल जैसे अपवाद स्वरूप क्षेत्रो में निपट रहे थे लेकिन अब हम लोगों को कम्युनिस्टों से भारत की सुरक्षा के खतरों को उत्तर व पूर्वोत्तर सीमाओं पर निपटना होगा, जहां से वे कम्युनिस्ट चीन द्वारा भेजे गये हथियारों पर, सुरक्षित रूप से निर्भर हो जायेंगे।”

एक तरफ नेहरू ने सरदार पटेल द्वारा लिखित इस पत्र का कोई संज्ञान नही लिया था, वहीं दूसरी तरफ नेहरू के मन्त्रिमण्डल के मंत्रियों में नेहरू की चीन तिब्बत नीति को लेकर आक्रोश उपज रहा था। इसको लेकर नेहरू व उनके मित्र सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) के बीच झड़प भी हुई थी।

उस वक्त नेहरू की तिब्बत नीति के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये सरदार पटेल और उनके अनन्य समर्थक के एम मुंशी के साथ मन्त्रिमण्डल के राजाजी, बलदेव सिंह, सी डी देशमुख, जगजीवनराम और श्रीप्रकाश हो गये थे और वही नेहरू का साथ देने वालो में केवल गोपालस्वामी अयंगर, मौलाना आज़ाद और रफी अहमद किदवई थे।

उस वक्त नेहरू की तिब्बत चीन नीति को लेकर इतना रोष था कि मन्त्रिमण्डल की बैठक में नेहरू के विरुद्ध इसकी कोई परिणीति होनी ही थी लेकिन भारत के भाग्य में कुछ और ही व्यथा बदी थी।

सरदार पटेल का स्वास्थ्य बिगड़ गया और उसको एक अवसर बनाते हुये, नेहरू ने 12 दिसम्बर 1950 को यह कहते हुये उनको मंत्री पद के कार्यो से विमुक्त कर दिया कि सरदार को आराम की आवश्यकता है और साथ में समस्त विभागों को यह भी आदेश दे दिया गया कि कोई भी शासन सम्बन्धी फ़ाइल और पत्राचार, सरदार पटेल को नहीं भेजे जाएं।

सरदार पटेल शायद नेहरू के इस वितृष्णा भरे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं कर पाये और उसके ठीक 3 दिन बाद, 15 दिसम्बर 1950 को उनका स्वर्गवास हो गया। हालांकि इतिहास में उनकी मृत्यु एक स्वाभाविक मृत्यु के रूप में अंकित है लेकिन उसके साथ यह भी सत्य है कि उनकी बीमारी को मृत्यु तक ले जाने में नेहरू की ही भूमिका थी।

मुझको इतिहास यही समझा रहा है कि सरदार पटेल की मृत्यु ने, जहां नेहरू की सरदार पटेल के प्रति वैमनस्यता व वैश्विक जगत को लेकर उनकी अव्यवहारिकता की सहायता से, भारत को लज्जाजनक रूप से, चीन द्वारा पराजित होने के द्वार खोल दिये थे, वहीं कम्युनिस्टों को भारत को छिन्नभिन्न करने के प्रयास के लिये जड़ें जमाने का भरपूर मौका मिल गया था।

यही कारण है कि देशद्रोही भारत का कम्युनिस्ट, सरदार पटेल की स्मृतियों को भारत के मानस से मिटा देना चाहता रहा है और इस कार्य में कांग्रेस का सक्रिय सहायक रहा है।

आज मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि जो चिंतन सरदार पटेल ने चीन को लेकर 1950 में किया था, वो 64 वर्षो की सुप्तावस्था के बाद 26 मई 2014 को फिर से जाग्रत हुआ है। एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले 64 वर्षों से हो रही इस अनियमितता को दूर कर के, चीन को लेकर भारत की सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाई है और वही दूसरी तरफ सरदार वल्लभभाई पटेल को पुनः भारत के मानस पटल पर स्थापित किया है।

मेरे लिये नरेंद्र मोदी जी को 2019 में भारत का पुनः प्रधानमंत्री चुनने के लिये यही कारण काफी है।

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