सर्वोच्च न्यायालय में राफेल!

प्रस्तुत लेख शुद्ध कानूनी मुद्दों पर आधारित है। इसमें कोई राजनीतिक हेतु नहीं है। अतः राजनीति से प्रेरित टिप्पणियां करना पूर्णतः अवांछनीय है।

जब मैं सरकार कहूँ तो मेरा तात्पर्य आज की सत्तापक्ष की पार्टी से न हो कर भारतीय संविधान मे निहित केंद्र सरकार से होगा।

वैसे भी यह एक लंबा लेख है, और मेरा अनुरोध है कि कोई भी टिप्पणी पूरा लेख पढ़ने के बाद और लेख की निष्पक्षता को ध्यान में रखते हुए की जाए!

30 अक्टूबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय की एक डिवीज़न बेंच प्रशांत भूषण और अन्य अधिवक्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं को सुन रही थी।

पिछली सुनवाई के दौरान बेंच ने सरकार से राफेल विमान की चयन प्रक्रिया के कागज़ात सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने के लिए कहा था, और उस आदेश का पालन भी किया गया था।

‘राफेल की कीमत और उसके तकनीकी विवरण’ देना ज़रूरी न होने की बात भी विशेष रूप से दर्ज़ की गई थी। बेंच ने सरकार के विरुद्ध की गई विभिन्न याचिकाओं में लगाए गए आरोपों पर सरकार से जवाब दाखिल करने को कहने से भी मना किया था।

लेकिन अंतिम सुनवाई के दौरान बेंच ने अपना रवैया बदला, और सरकार से कहा कि कीमतें और तकनीक विवरण भी सीलबंद लिफाफे में दाखिल करें।

बेंच ने पूछा कि यह विवरण याचिकाकर्ताओं को क्यों नहीं दिया जा सकेगा? अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने बताया कि भारत और फ्रांस के सरकारों के बीच एक द्विपक्षीय समझौते के अनुसार यह जानकारी इस कदर गुप्त रखी जानी थी, कि न्यायालय तक को नहीं दी जाएगी! इसी के साथ जानकारी इस प्रकार याचिकाकर्ताओं को देना आधिकारिक गोपनीयता कानून का उल्लंघन होगा।

तब बेंच ने अटॉर्नी जनरल से दस दिन के अंदर इस जानकारी को दिए जाने के विरोध में मुद्दों को गिनाते हुए एक शपथपत्र दाखिल करने के लिए कहा।

जब प्रशांत भूषण ने न्यायालय के देखरेख में सीबीआई के द्वारा इस मामले की जांच की मांग की, तब बेंच ने कहा कि जांच के लिए अभी समय है, और वे इस मामले में कोई निर्णय सरकारी शपथ पत्र के दाखिल करने के बाद ही लेंगे।

टाईम्स ऑफ़ इंडिया अब खबर दे रहा है कि सरकार ने निर्णय लिया है कि इस जानकारी को सर्वोच्च न्यायालय के साथ भी साझा नहीं किया जाएगा और वह ऐसा शपथ पत्र अगली सुनवाई से पहले न्यायालय में दाखिल करने जा रही है।

इस परिस्थिति में निम्नलिखित बातें हो सकती है –

1. सरकार मांगी गई जानकारी देने के विरोध में शपथपत्र दाखिल करती है।

2. ऐसे शपथ पत्र के दाखिल करने के बाद और दोनों तरफ से जिरह सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय सरकारी दलीलों में दर्ज कारणों को मानता है,

या

3. सर्वोच्च न्यायालय सरकारी दलीलों को अपर्याप्त मानते हुए सरकार को आदेश दे सकता है कि उक्त जानकारी को सीलबंद लिफाफे में दी जाए, ताकि वह स्वयं उसे पढ़ कर तय कर सकें, कि कुछ गैरकानूनी कृत्य हुआ है या नहीं। यदि हुआ है तो क्या कोई जांच ज़रूरी है या नहीं।

यदि सर्वोच्च न्यायालय दूसरा विकल्प चुनता है तो वह इन याचिकाओं पर उचित आदेश पारित कर उन्हें खारिज कर देगा।

लेकिन यदि सर्वोच्च न्यायालय तीसरा पर्याय अपनाता है और सरकार से सीलबंद लिफाफे में जानकारी देने के आदेश देता है तो कई पेचीदा कानूनी मुद्दे उपस्थित हो सकते हैं –

अव्वल तो आधिकारिक गोपनीयता कानून के तहत विशिष्ट जानकारी प्राप्त करने के लिए विशिष्ट स्तर के सुरक्षा जांच से पार होना होता है। यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडा मामला है और संसद तक को इससे परे रखा गया है।

ज़ाहिर है कि यदि उस कानून से संबद्ध अधिकार सूत्र न चाहें तो कोई न्यायालय ऐसे ही कोई आदेश पारित कर खुद को इस स्तर पर नहीं ला कर रख सकता है, गोपनीय सूचना नहीं पा सकता है। यह एक तरह से कानूनी गुत्थी बन जाएगी और याचिकाएं निष्फल हो जाएंगी।

लेकिन इस मामले में एक और पेंच है!

यदि सरकार बेंच के बस उन तीन न्यायाधीशों को आधिकारिक गोपनीयता कानून के तहत इस सूचना को प्राप्त करने का अधिकार दे कर उक्त जानकारी को उनको सौंपती है तो?

सारे मामले में यही मुद्दे की बात होगी! न्यायाधीश कानूनी मामलों के जानकार तो है ही। पर क्या वे सामरिक विमान, उनकी रचना, अस्त्र और इतर तकनीकी जानकारी के भी विशेषज्ञ हैं, कि वे इस बात की तस्दीक कर सकें, कि क्या इस सौदे में कुछ गलत हुआ है या नहीं? क्या वे तय कर पाएंगे कि जो कीमत तय हुई है वह सही है या नही?

ध्यान रहे कि आधिकारिक गोपनीयता कानून के अनुसार वे प्राप्त जानकारी किसी विशेषज्ञ के साथ साझा नहीं कर सकते हैं। ऐसे में यदि वे कुछ आदेश पारित भी करते हैं तो उसका औचित्य क्या बचेगा?

दूसरे, ऐसे किसी आदेश के बावजूद भी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और आधिकारिक गोपनीयता कानून का हवाला देते हुए उस आदेश को मानने से इंकार करती है तो सर्वोच्च न्यायालय क्या कर सकता है? राष्ट्रीय सुरक्षा के बाधित होने के मामले में वह किसे अवमानना के लिए प्रताड़ित करेगा?

संवैधानिक दृष्ट्या सर्वोच्च न्यायालय को सरकार बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है। यह भी एक कानूनी गुत्थी बन जाएगी और सर्वोच्च न्यायालय अपनी साख खो बैठेगा!

अपनी सारी ज़िंदगी कानूनी मामलों में बिताने के बाद माननीय न्यायाधीश जनतांत्रिक ढांचे के महत्त्वपूर्ण और संवैधानिक रूप से स्वतंत्र इन दो स्तंभों के बीच सीधा टकराव टालने की व्यवहारबुद्धि ज़रूर रखते हैं।

कानून के एक अभ्यासक की दृष्टि से आनेवाले दिनों में यह नाट्य क्या मोड़ लेता है, देखना रंजक होगा!

(श्री Vinayak Bichu के मूल अंग्रेजी लेख का अनुवाद)

रविश बाबू, कौन सी जांच चल रही थी राफेल में?

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