मोदी द्वारा अभिजात्य वर्ग के रचनात्मक विनाश को समझिये और समर्थन दीजिए

ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था ने extractive (दोहन करने वाली) संस्थाओं का निर्माण किया, चाहे वह अफ़्रीकी देश हो या भारत।

स्वतंत्रता मिलने के बाद अफ्रीकी राजनेताओं ने ब्रिटेन की शोषण या दोहन करने वाली नीतियों को जारी रखा, क्योकि इनसे सत्ता पर उनका वर्चस्व बना रहेगा। यह पैटर्न स्वतंत्रता के बाद के अफ़्रीकी देशों जैसे कि घाना, केन्या, जाम्बिया, ज़िम्बाब्वे, सिएरा लेओने इत्यादि में दिखाई देता है।

परिणाम क्या हुआ? ज़िम्बाब्वे को 1980 में स्वतंत्रता मिली. वर्ष 2008 में इस देश के नागरिकों की आय 1980 की तुलना में आधी रह गयी है, इससे भी बदतर हालात सिएरा लेओने में हुआ।

कई थिंक टैंक (प्रबुद्ध मंडल) और शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि अफ्रीका के अनेक देशों में अभिजात्य वर्ग ने स्वतंत्रता के बाद सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और तानाशाही स्थापित कर दी।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में उन्होंने लोकतंत्र स्थापित करना स्वीकार कर लिया। लेकिन चुनाव करवाने के लिए कुछ वर्षो – 5 से 10 साल – का समय मांग लिया. क्योंकि वे चुनाव आयोग, अदालत, ब्यूरोक्रेसी और मीडिया में अपने प्यादों को बैठा कर सत्ता ‘लोकतान्त्रिक’ तरीके से बनाये रखना चाहते थे।

कहने के लिए चुनाव आयोग ने चुनाव करवा दिया, लोगों ने वोट डाल दिए, और जब विपक्ष वोटर लिस्ट और चुनाव में धांधली की शिकायत करता था, तो चुनाव आयोग शिकायतों को खारिज कर देता था।

हालत यहां तक हो जाती थी कि निर्वाचन-क्षेत्र से परिणाम कुछ होते थे, चुनाव आयोग घोषणा कुछ और करता था। जब विपक्ष अदालत में चुनौती देता था तो जज किसी तकनीकी कारणों का सहारा लेकर उनकी याचिका को खारिज कर देते थे।

अगर विपक्ष न्यायालय और चुनाव आयोग के विरुद्ध प्रदर्शन करते थे, तो सेना और पुलिस नृशंस तरीके से मारपीट और हत्या करके उनके प्रदर्शन को दबा देती थी। सुरक्षाबलों के द्वारा विपक्ष के दमन के समाचार को मीडिया छुपा देता था, विपक्ष के आरोपों को प्रकाशित नहीं करता था तथा केवल अभिजात्य वर्ग के समर्थन में खबरें छापता था।

थिंक टैंक (प्रबुद्ध मंडल) और शोधकर्ताओं ने इसे ‘बनावटी लोकतंत्र’ का नाम दिया।

अगर हम भारत के सन्दर्भ में देखें, तो पाएंगे कि स्वतंत्रता के बाद सत्ता पर एक अभिजात्य वर्ग ने कब्ज़ा जमा लिया, एक ही परिवार के लोग या उनके प्रॉक्सी शासन करने लगे। यह स्पष्ट होने लगा है कि सोनिया सरकार ने अपने गुर्गों को धीरे-धीरे ब्यूरोक्रेसी, न्यायालय तथा मीडिया में बैठा रखा है।

उदाहरण के लिए कुछ मित्रों ने बताया कि एक वरिष्ठ मी लार्ड जिनके पिता कांग्रेस के नेता थे, कैसे उन्हें वर्ष 2010 में जज नियुक्त किया गया; कैसे वे कुछ ही महीनों में राज्य अदालत के मुख्य पंच हो गए, और फिर वह उससे बड़े न्यायालय में आ गए और प्रगति करते ही गए। सब कुछ सोनिया सरकार के समय में हुआ।

मैं सोचकर हैरान हो जाता हूं कि कैसे सोनिया सरकार ने शातिर सोच से 2010 में ही इन महोदय की गोटी फिट कर दी थी जिससे वह एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाएं जहां वे सोनिया, उनके परिवार और सपोर्टरों का समर्थन कर सकें। यही हाल मीडिया और ब्यूरोक्रेसी में भी मिलता है जहां काँग्रेसी गुर्गे फिट हैं।

इस अभिजात्य वर्ग के शोषण का परिणाम यह हुआ कि अधिकांश भारतीय भीषण गरीबी से जूझते रहे; घर में बिजली नहीं, शौचालय नहीं, पानी नहीं, और डिजिटल युग में इंटरनेट नहीं। ना ही शिक्षा के साधन, ना ही स्वास्थ्य उपलब्ध, ना ही रोज़गार, ना ही उनके क्षेत्र में कोई उद्यम, ना ही सड़क, ना ही रेल, ना ही बैंक।

ज़रा सा पेट भरने के लिए उन्हें ‘माई-बाप’ सरकार की तरफ दीन भाव से देखना पड़ता था जो चुनाव के समय एक सूती धोती, 500 रूपए का नोट और एक पव्वा चढ़ा के उन्हें कृतार्थ कर देता था।

अगर किसी के मन में गलती से भी यह विचार आ जाए कि यह कांग्रेसी और कम्युनिस्ट विलासिता में कैसे रहते हैं जबकि उनकी स्वयं की स्थिति दरिद्रता वाली है, तो उसके लिए इस अभिजात्य वर्ग ने संप्रदायवाद तथा समाजवाद का नारा ढूंढ रखा था. सेकुलरिज़्म का एक जयकारा लगाया, बहुसंख्यकों को गरियाया और जनता भाव-विह्वल होकर अपने सारे कष्ट भूल जाती थी।

प्रधानमंत्री मोदी भारत की औपनिवेशिक संरचना को बदल रहे हैं। उस औपनिवेशिक संरचना को जिसे अंग्रेज़ों ने उस समय के अभिजात्य वर्ग को सौंप दिया; जिसे अभिजात्य वर्ग ने अपना लिया और उसी से अपने परिवार और खानदान को राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के शीर्ष पर बनाए रखा।

भारत की मिट्टी पर पले-बढ़े, शिक्षित, और उसी धरती पर संघर्ष करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा इस अभिजात्य वर्ग के रचनात्मक विनाश को समझिये और उन्हें समर्थन दीजिए।

भूल जाइए कि मोदी ऐसी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था चोरों के लिए छोड़ने जा रहे हैं

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