समय आपको दिखा रहा है समाज के रूप में आपकी नाकामयाबी का आईना

कई महानुभाव कल तक मोदी की शादी को लेकर खूब चटखारे ले रहे थे। ऐसे में वो अगर सोचते हैं कि लालू परिवार पर बात नहीं होगी तो उन्हें अपनी ग़लतफ़हमी दूर कर लेनी चाहिए। जब दूसरों के निजी मामले उछालोगे तो कल को अपने भी उछलेंगे ही।

मेरा इरादा उस पर बात करने का नहीं है। हम ये ध्यान दिलाना चाहेंगे कि लालू की सिर्फ एक बेटी नहीं है, दो बेटों के अलावा उनकी सात बेटियां हैं। आपने किसी का नाम सुना है क्या?

आपने नाम इसलिए नहीं सुना क्योंकि ये बहुत ही रुढ़िवादी परम्पराओं का पालन करने वाला परिवार है। लड़कियां बाहर नहीं आतीं। शादी के बाद मीसा अपने पति के परिवार की सदस्य हैं, इसलिए उनको आप देख पाएंगे, लेकिन चन्दा, रागिनी, हेमा, रोहिणी वगैरह कोई भी आपको आसानी से नहीं दिखेगी।

ऐसे परिवार की बहु को बेटा तलाक दे दे, ये बहुत बड़ी बात है। शोर शराबे से दूर अगर देखेंगे कि ये हुआ क्या है, तो और भी काफी कुछ दिखेगा।

ये विवाह बेमेल था ऐसा कहना शुद्ध बकवास है। ऐसा बोलने वाले अपने आस पड़ोस से कटे हुए लोग हैं, जिन्होंने धूप में अपने बाल पका कर खुद को उम्रदराज और अनुभवी घोषित कर लिया है।

जहाँ दोनों पक्ष एक जैसी क्षमता के हों, ऐसा कौन सा विवाह देखा है आपने? या तो आर्थिक पक्ष में ज़मीन आसमान का अंतर होगा, या पढ़ाई-लिखाई में। या फिर सामाजिक स्थिति में दोनों परिवार बिलकुल अलग होंगे, जहाँ एक को पूरा शहर जानता होगा, दूसरे को मोहल्ले के लोग भी मुश्किल से पहचानेंगे।

कहीं अगर पत्नी आर्थिक प्रबंधन में कम कुशल होगी तो पति किसी न किसी जुगाड़ से लगातार अपनी आय बढ़ाता, ज़मीनों में निवेश करता दिख जायेगा। जहाँ पति लोकव्यवहार में कम कुशल होगा वहां पत्नी रिश्ते की हर चाची, ताई, मौसी, उनके बच्चों तो क्या उनकी ननद के देवर तक से परिचय रखने वाली होगी। पति कम शिक्षित हो, और पत्नी ने दो एम.ए. और ऊपर से वकालत भी कर रखी हो, ऐसे दो-चार तो हरेक मोहल्ले में मिल ही जाते हैं।

आप जो देख रहे हैं वो बदलती हुई सामाजिक व्यवस्था है। पचास से ऊपर की एक-दो पीढ़ियों ने अपनी आँख पर जो सेकुलरिज़्म का टिन का चश्मा चढ़ा रखा है इसलिए ये बदलाव नज़र नहीं आया। इससे कितने वोट मिलेंगे वो किसी को अंदाज़ नहीं, इसलिए सामाजिक तौर पर इसकी चर्चा करना भी किसी को ज़रूरी नहीं लगता। बिहार में पहले सैराट सभा होती थी, जहाँ वर-वधु के परिवारों को मिलने जुलने का मौका मिलता था। विवाह करवाने वाले घटक भी होते थे।

सामाजिक न्याय और जातिवाद के खात्मे के नाम पर इस व्यवस्था को नष्ट कर दिया गया। सूचना क्रांति के युग में जब शादी डॉट कॉम जैसी वेबसाइट आये तो सामाजिक रूप से पहले ही कमज़ोर पड़ चुके घटकों की ज़रूरत न के बराबर रह गयी। ये घटक ब्राह्मण होते थे और ब्राह्मण द्वेष में इनका सफाया कर देना सबको उचित ही लगा होगा। इनके न होने से फौरी तौर पर किसी को कोई नुकसान होता हुआ भी नहीं दिखा। विवाह से जुड़े मसले सार्वजनिक चर्चा के नहीं होते इसलिए समस्या सुनाई भी नहीं दी।

सैराट सभा जैसे किसी सार्वजनिक स्थान पर दहेज़ की चर्चा बड़ी शर्मनाक होती। विवाह से पहले लेन-देन की बात करना बिलकुल खुले बाज़ार में बेटे की बोली लगाने जैसा होता। इस वजह से वहां तय होने वाले विवाह में दहेज़ की स्थिति कभी ऐसी नहीं होती थी कि बेटी की शादी के लिए ज़मीनें बिकें, क़र्ज़ चढ़ जाए। घटक भी सीधा परिवार का सदस्य नहीं होता था। वो कभी कभी घर आने वाला एक सम्मानित अतिथि होता था, जिसके सामने सब खुद को अच्छा दिखाने का प्रयास करते।

ये घटक पश्चिम के मैरिज काउंसिलर जैसी भूमिका में होता था। खुद सैराट सभा में शादी करने के कारण इसने खुद दहेज़ नहीं लिया होता था, तो घटक के रूप में शादी तय करवाते समय दहेज़ मांगने वालों को गलत कह देने का नैतिक साहस भी इसके पास होता था। ये दोनों पक्षों के घर में कई बार बतौर अतिथि रह चुका होता था इसलिए करीब करीब हर सदस्य के बर्ताव, पसंद-नापसंद से वर-वधु को परिचित करवा देना भी इसके लिए आसान काम होता था।

वर-वधु के लिए ये घटक नामक जीव बचपन से ही परिचित, साल में एक-दो बार आने वाले किसी चाचा-मामा जैसा होता था। घर के सब लोग उससे हमेशा सम्मान से बात करते दिखते थे, इसलिए वर-वधु में किसी मन-मुटाव की स्थिति में उसका होना आधा झगड़ा सुलझा देता। बहु अपनी सास को दुष्टा मान सकती थी, युवक अपने ससुर को धूर्त मान लेता, लेकिन घटक दोनों को अपने ही पक्ष का लगता। उसके लिए मैरिज काउंसिलर की भूमिका बड़ी आसान होती थी।

बिहार को सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला और पूरे देश को जबरन समाजवादी बनाने के नाम पर राजनीति ने सामाजिक व्यवस्था के साथ जो बलात्कार किया है उसका नतीजा ये हुआ कि विवाह की ये व्यवस्था नष्ट हो गयी। अपना काम बनने के बाद राजनीति को मेहनत करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। समाज से एक व्यवस्था के ख़त्म होने पर उन्होंने दूसरी व्यवस्था बनाने की ज़रूरत नहीं समझी। वो भूल गए कि राजनीतिज्ञ कमल की तरह पानी में रहकर पानी से अलग नहीं होता।

जहाँ तक कानूनी व्यवस्था का सवाल है, हिन्दू मैरिज एक्ट से हुई शादी में तलाक इतना आसान नहीं होता। अगर शादी को साल भर भी नहीं हुआ है तो संभवतः जोड़े को मैरिज काउंसिलर से मिलने की सलाह दी जाएगी। बिहार में ऐसे कितने लोग हैं पता नहीं। भूतपूर्व मुख्यमंत्री माता-पिता और उपमुख्यमंत्री के खानदान से होने के कारण बड़े लोगों को ये सुविधा मिल जायेगी। गरीब राज्य बिहार में कई कमज़ोर राजनीतिक-आर्थिक स्थिति के लोग भी होंगे जिन्हें शायद ये सुविधा कभी नहीं मिली, न मिलेगी।

दूर से सुनकर फैसले सुनाते जो धूप में बाल पकाए बुढऊ लोग इसपर किस्म-किस्म के त्वरित फैसले भी सुनाएंगे। उन्हें कोई अंदाज़ नहीं होता कि तलाक या सम्बन्ध विच्छेद की स्थिति से गुज़र रहा व्यक्ति किस मानसिक स्थिति में होता है। बाल-बच्चे, कमाई-धमाई के चक्कर में जब उन्हें ऐसे किसी व्यक्ति का सुनाई दिया भी तो उन्होंने कह दिया कि “बेवक़ूफ़ होगा”। कोई और कमी तो नहीं जैसी बातें करके चटखारे लगाए और आगे निकल लिए।

गौर से देख लीजिये इस घटना को। बड़ी है, टीवी पर दिख गयी है, इसलिए अब ये आपको अपने आस-पास आसानी से नज़र आएगा। इसे देखकर अनदेखा करना आपके लिए आसान है। अनदेखा करने के बदले कूल डूड के मम्मी-डैडी की पीढ़ी को इसे गौर से देख लेना चाहिए। ये कहीं दूर घटने वाली घटना नहीं है। थोड़े ही समय में जैसे जैसे अभी की 20-25 वाली पीढ़ी थोड़ी और बड़ी होगी, मुश्किल से पांच साल में आपको ये अपने और पास होती हुई नज़र आएगी।

एक समाज के तौर पर आपके पास कोई सामुदायिक स्थल नहीं हैं। समाज के बनने की पहली सीढ़ी यानि परिवार के टूटने को देखकर अनदेखा करना भी नहीं चाहिए। एक समाज के रूप में आपकी नाकामयाबी का आईना आपको समय अपने आप दिखा रहा है।

फिर मत कहना प्रिया, वॉरियर मोड में क्यों होती हो!

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