Dead End आने पर लौटना ही पड़ता है पीछे

“विज्ञान के युग में दुनिया आगे जाने की बात करती है और तुम उसे पीछे ले जाने के चक्कर में हो।”

फोन पर एक मित्र था, जिसकी उपरोक्त बातों में व्यंग्य से अधिक मज़ाक उड़ाने वाला भाव था। फिर भी मैंने शांत भाव से पूछ ही लिया – वो कैसे?

“अब तुम्हारी पुस्तक का शीर्षक ‘अगली सदी का एकमात्र प्रवेश मार्ग – वैदिक सनातन हिंदुत्व’, ही यह कह रहा है, जिसका मतलब ही सीधे सीधे है कि अगर अगली सदी में हमे जाना है तो हमे पीछे जाना होगा।”

हम पीछे कब जाते हैं, जब हम आगे ना जा पा रहे हों। इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि जब हम किसी सड़क पर चल रहे हैं और सामने डेड एन्ड आ जाए तो हम क्या करते हैं, हम पीछे ही तो मुड़ते हैं। हमारे मार्ग में आगे नदी नाला खाई कुछ भी ऐसा आ जाए जिसे हम पार कर आगे नहीं बढ़ सकते तो हम क्या करते हैं, गाड़ी बैक कर पीछे ही तो जाते हैं।

इसी तरह हम जीवन में भी आगे कहाँ जा पा रहे हैं। आगे डेड एन्ड नजर आने लगा है। अब आप को नहीं दिख रहा तो इसमें मेरा दोष नहीं। वैसे यह आगे ना जा पाने की बात अकेला मैं नहीं कह रहा, यह आधुनिक वैज्ञानिक स्वयं कहने लगे हैं और हॉलीवुड इस पर पिक्चर बना कर पैसे भी कमा रहा है। फिर भी आप कह रहे हो कि दुनिया आगे जा रही है।

वैसे आगे जाना क्या होता है? क्या स्मार्ट फोन खरीद कर दिन भर व्हाट्सएप देखते रहना आगे जाना है या बाज़ार में आई नई से नई मॉडल की मोटर-साइकिल खरीद कर उस पर सुबह सुबह दूध लेने जाना, आगे जाना है या फिर किश्तों में कोई नई कार खरीद कर मॉल में 200 रूपये की पिक्चर देखना और दस रूपये वाले पॉपकॉर्न सौ रूपये में खरीद कर खा लेना ही आगे जाना है।

वैसे इन मॉल्स में आगे जाने के और भी कई पैमाने हैं, जैसे कि ब्राँडेड जूते पैंट और शर्ट का पहनना। महिलाओं के संदर्भ में बात करनी हो तो उनके आगे जाने के तो अनगिनत पैमाने हैं जो फिर 365 दिन चौबीस घंटे खत्म नहीं हो सकते।

लेकिन फिर हम सब नई पीढ़ियाँ बौद्धिक स्तर पर कितनी खोखली है इसका अनुमान आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि हमारा दिमाग बाज़ार से नियंत्रित होता है। इस तरह से आगे जाते जाते हमारा आधुनिक काल कितना अशांत हो चुका है क्या तुमको दिखाई नहीं देता।

शायद तुम्हें नज़र ना आये, मगर जिस पश्चिम संस्कृति का हम पीछा कर रहे हैं, उन्हें साफ़ नज़र आ रहा है, इसलिए वहाँ बैचैनी है। यह बेचैनी उनकी फिल्मों, साहित्य और विचार विमर्श में साफ़ नजर आती है। मगर उनके पास इसका समाधान नहीं है।

यही कारण है जो हिन्दुस्तान का कोई भी धर्मगुरु वहाँ पहुँचता है तो उसे हाथों हाथ लिया जाता है। यह धर्मगुरु जो कुछ भी बत्ताता है उसे ही मैंने भी सरल शब्दों में एक विशेष संदर्भ के साथ इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है।

मगर मैं जानता हूँ तुम इसे पढोगे नहीं। और फिर बिना पढ़े हुए कमेंट भी ज़रूर करोगे। इसमें तुम्हारी गलती नहीं है, यह हमारी आदत है। वैसे अब हम उस दौर में पहुंच चुके हैं जहां जब तक कोई बात अंग्रेज़ी में ना बताई जाए तब तक भारतीयों को वो बात पिछड़ी और कभी कभी हास्यास्पद भी लगती है।

खैर, मेरे भाई, मैं तुम्हे पीछे नहीं ले जा रहा, सिर्फ वो मार्ग बतला रहा हूँ जिस पर चल कर सदियों से हमारे पूर्वज अपनी अपनी मंज़िल तक सकुशल आनंदपूर्वक पहुंचते रहे हैं। मेरा यहां मात्र इतना बतलाना कर्तव्य है कि आधुनिकता के मार्ग पर आगे ना जाएँ, वहां खतरा ही खतरा है। इस मार्ग पर आगे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक स्तर पर सिर्फ विनाश ही विनाश है, यूं कह लीजिये कि सर्वनाश है।

लेकिन हिंदुस्तान में एक समस्या है, आपने देखा होगा कि किसी चौराहे पर किसी एक दिशा के लिए यह निर्देश लगा भी होता है कि आगे ना जाएँ, तब भी अधिकांश उसी राह पर आगे ज़रूर जाते हैं क्योंकि आगे वाला जा रहा होता है। अर्थात हम अब भेड़चाल हैं। और तुम कहते हो कि हम आगे जा रहे हैं। जाओ आगे जाओ, जब लौट कर आओगे तब मैं तुम्हें इसी मोड़ पर मिलूंगा, साथ ले जाने के लिए, क्योंकि आखिरकार तुम मेरे मित्र हो।

क्यों और किसके लिए लिखी गई ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’

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