अमेरिकी मास्टरकार्ड को रुला मारा भारतीय रूपे कार्ड ने

मास्टरकार्ड और वीज़ा का नाम हम में से अधिकतर ने सुन रखा है। जिनके भी पास क्रेडिट या डेबिट कार्ड है, उन्होंने इस्तेमाल भी किया होगा। ये एक पेमेंट प्रोसेसिंग तकनीक है, जो कि हमारे ट्रान्जेक्शन के लिए कुछ पैसे लेती है बैंकों से।

2012 में मनमोहन सिंह सरकार और आरबीआई ने ‘रूपे’ कार्ड लॉन्च किया था जो कि देसी वर्जन था मास्टर कार्ड का। उसके बाद मोदी सरकार ने बैंकिंग सेक्टर में इसे प्रमोट करना शुरु किया और जन-धन वाले अकाउंट्स के कारण इसके उपयोग और संख्या में अचानक से वृद्धि आई।

2018 तक आते-आते इस कार्ड के प्रयोग का (संख्या का नहीं) ये आलम है कि पिछले चार सालों में भारत के एक अरब कार्डधारकों में से आधे रूपे कार्ड का प्रयोग करते हैं। पिछले दो सालों में इसके प्रयोग की गति ऐसी तेज हुई है कि मास्टरकार्ड वालों को रुलाई आ रही है।

बात यह है कि पहले इन दो विदेशी कम्पनियों की डूओपॉली थी इस क्षेत्र में। साथ ही, हर ट्रान्जेक्शन पर लगने वाली फीस भारत से बाहर जाती थी। मनमोहन सिंह सरकार के इस आइडिया को मोदी ने लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया, और फिर ये कार्ड मात्र चार सालों में मास्टर कार्ड वालों की हालत पतली कर रही है।

फिर क्या हुआ? फिर ट्रम्प के आगे मास्टरकार्ड के मालिक पहुँचे ये बताने कि मोदी ने भारत में उनके बिज़नेस को बर्बाद कर दिया है, और वो लोगों को ‘देशभक्ति’ और ‘देश सेवा’ के नाम पर ‘रूपे कार्ड’ को इस्तेमाल करने कह रहा है।

आप ऐसी कम्पनियों की हिमाक़त देखिए कि इन्हें ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ कहने वाले राष्ट्रपति के पास ‘इंडिया फ़र्स्ट’ कहने वाले प्रधानमंत्री की शिकायत करनी पड़ रही है कि भारत का पैसा अमेरिका में क्यों नहीं आ रहा है। मतलब ये उम्मीद लेकर शिकायत की जा रही है कि ट्रम्प इंडिया की बाँह मरोड़ेगा और कहेगा कि भारत के लोग भारतीय पेमेंट प्रोसेसर का प्रयोग न करें, बल्कि अपना पैसा अमेरिका को दें!

मोदी ने जिस तरह से ‘भीम’ और ‘रूपे’ कार्ड को प्रमोट किया है, और कहा कि ‘हाँ, ये देश सेवा है क्योंकि आप जब रूपे इस्तेमाल करते हैं तो उस पैसे से सड़कें बनती हैं’।

वैसे, मास्टरकार्ड के मालिक ने मोदी के इसी बयान का ज़िक्र करके अपनी सरकार से मोदी की शिकायत की है कि वो तो ‘देश सेवा’ का नाम लेकर लोगों को उकसा रहा है।

भारत के लोग ज़िंदगी भर किसी न किसी तरह की ग़ुलामी करते रहें, और यहाँ का पैसा वहाँ भेजते रहें, तभी तक सही हैं। मुझे आश्चर्य होता हो कि एक विदेशी कम्पनी ऐसा सोच भी कैसे लेती है कि भारतीय लोग अपने देश में बनाई सेवाओं का प्रयोग न करें क्योंकि उनका बिजनेस खराब होगा?

मोदी से आप खूब असहमति रखिए, लेकिन इस तरह की ख़बरों को सुनकर अच्छा लगता है कि विदेशियों को जहाँ तक संभव है, बांस करते रहना चाहिए। कई जगह आप बारगेनिंग कैपेसिटी में नहीं होते हैं, आपको उनके सामने झुकना पड़ता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आदमी खड़ा होना ही छोड़ दे।

3000 करोड़ एक मूर्ति के लिए, 3600 करोड़ दूसरी के लिए! कितना ज़रूरी है ये सब?

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