ऐसे बदली जाती है प्रजा

आज कई जगह लोग लिख रहे हैं कि भाजपा नेतृत्व ने राम मंदिर पर जनता का मोहभंग किया है, जनता वही है, भाजपा बदल गयी है।

हंसी आई इस बात पर कि हम कितना कम जानते हैं कि जनता में बदलाव कैसे लाया जात है, इसलिए यह लेख इसी विषय पर है।

जो लोग तब युवा थे, 15 से 30 के बीच के थे वे आज 40 से 65 के बीच होंगे। नॉर्मल जिंदगी जी रहे होंगे तो बाप से दादा होंगे। क्या उन्हें अपने जीवन में और आज की युवा पीढ़ी के choices और preferences में फर्क नहीं दिखता?

अगर बदलावों के नाम से सब से ज़्यादा कोई पीढ़ी सोशल मीडिया में चिल्लाती है तो यही पीढ़ी है। तो क्या यह कहना कि जनता वही है, ईमानदारी है भी? चलिये देखते हैं क्या क्या बदला?

उदारीकरण तब ताजा ताजा था, उसके साथ साथ लुभावनी ‘ब्रांडेड’ नौकरियाँ आईं। उसके पहले क्या था? ऑरगनाइज्ड सेक्टर का ज़्यादातर अर्थ सरकारी नौकरियाँ होता था और वे कम थीं। बाकी लोग भूखे तो मर नहीं सकते थे इसलिए असंगठित क्षेत्र में अर्थार्जन कर ही रहे थे, उसे लेकर किसी को समस्या नहीं थी। विवाह होने में समस्या नहीं आती थी। लेकिन उदारीकरण ने सभी समीकरण ही बदल डाले।

बियाह के लिए छोकरिया के लिए MNC की नोकरिया का होना जरूरी हो गया। मीडिया क्रांति ने अरमानों के निकष कुछ इस कदर बदल डाले कि नौकरी जॉब हो गयी और युवा के लिए विवाह की न्यूनतम अर्हता हो गयी। गाँव की संपन्नता तुच्छ हो गयी शहर के महंगाई के सामने।

खोखले और थोथे स्टैंडर्डस मीडिया के माध्यम से हिन्दू समाज व्यवस्था को इस कदर ध्वस्त कर डाला कि उससे उबर पाना ही अपने आप में एक चुनौती है। हिन्दू युवाओं का गांवों से पलायन, खेती को लेकर महिलाओं के मन में हीन भावना… बहुत कुछ बदल गया जिसे प्रगति कहा गया।

लेकिन यहाँ बात सीमित रखेंगे नौकरियों के साथ आए सामाजिक बदलाव की। विदेशी कंपनियों की नौकरियों के साथ उनके अपने नियम भी आ गए। शिक्षा की अर्हताएँ बदल गयी जिसका सब से बड़ा आर्थिक लाभ कई लोगों का आर्थिक और राजनैतिक कद बढ़ा गया। और शिक्षा के नाम पर वामपंथी विचार का और प्रसार हुआ जो संस्कृति से नाभिनाल काटने का काम कर गया।

इसके साथ साथ MNC की political correctness ने लोगों के अभिव्यक्ति की जो ऐसी तैसी की है वह उनके कर्मचारी ही जानते हैं। कई डरते हैं मैसेज फॉरवर्ड करने से, फ्रेंड लिस्ट में होने से। चुगलखोरों को एक दूसरे की चुगली करने का नया बहाना मिल गया।

युवा को कोल्हू के बैल से भी अधिक जोता जाने लगा करियर बनाने के नाम पर। उसके पास समय है कहाँ? पढ़ाई खत्म फिर जॉब के पीछे, जॉब मिल गया तो बस गले का जुआ और कोल्हू नया, बाकी घूमते रहिए।

HR की पॉलिसीज़ के तहत अगर आप का कोई पुलिस रेकॉर्ड है तो आप का करियर खत्म समझ लीजिये। लिखित कुछ बही नहीं मिलेगा कि उनके खिलाफ भेदभाव किया जाता है लेकिन जिस तरह से लोगों में FIR या पुलिस केस का खौफ रहता है उससे अंदाजा चल जाता ही है।

किस तरह से आदमी दब्बू बन जाता है यह देखते ही बनता है। मोर्चे या रैली में कोई नहीं आता वह इसीलिए है। अगर पुलिस पकड़ ले गयी तो बात खत्म। या किसी ने देख लिया, कहीं किसी कैमरा में आ गए किसी चैनल पर दिख गए तो न जाने किस किस की मिन्नतें करने पड़ेंगी, यही हिन्दू युवाओं की सोच रहती है।

और फिर भी लोग कहते हैं कि जनता को दोष न लगाएँ, जनता वही है? किस कदर बदल गयी है जनता, समझ नहीं आ रहा या बस मोदी को दोष देकर हल्का होना है?

जिस जनता की रास्ते पर साथ देने की गारंटी होती है उसका ही नेता आगे बढ़ता है। और यह भी – केरल में जनता वाकई रास्ते पर उतरी, अमित शाह वहाँ पहुँच गए। बाकी भारत में जनता केवल फेसबुक और वॉट्सएप पर उतरी है।

गोवा और हैदराबाद में भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया, लेकिन वहाँ के जनता ने भी संग्राम किया था। आज केरल की जनता उतरी है। राम मंदिर के लिए युवा उदासीन है। उतर आए लाखों की संख्या में तो इस समय गोली तो नहीं चलेगी और नेता भी आएंगे।

बाकी एक नारा देखता हूँ – तोड़ने को परमिशन नहीं ली थी, बांधने को भी नहीं मांगेंगे – तोड़ना आसान है, सब को आता है। बनाना किसको आता है? और संख्या कहाँ है, केवल फेसबुक पर?

नेताओं को जनता का बैरोमीटर मिनिट टू मिनिट पता होता है। जनता उतरी तो उसके आगे चलना उसकी मजबूरी होती है। इसलिए शेष भारत के हिसाब से केरल में हिन्दू संख्या कम हो कर भी अमित शाह तुरंत दौड़े। यूं ही नहीं। अयोध्या में राम मंदिर अगर हिंदुओं के लिए रिमोट से खेलने का या मोबाइल गेम हुआ है तो क्या होगा?

फिलहाल करने को काम तो सरकार ने काफी किए हैं, लेकिन जिनको सिर्फ न किए कामों की ही बात करते रहना है उनसे बात करना भी कालापव्यय होगा। इनसे खुद तो काम कुछ होता नहीं और न कभी होगा। फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया वैसे इतना भी नाकारा माध्यम नहीं है।

युद्ध की रणभेरियाँ बज रही है तो तटस्थ रहने की कोई तुक नहीं और ना ही अनुशासनहीन गैर जिम्मेदार बकवास को वैचारिक स्वतन्त्रता कहने का। समीक्षा, आलोचना और समालोचना आदि सब के लिए युद्ध के बाद का समय ही योग्य है।

अब 2019 में मोदी को वापस लाना है, क्योंकि हिंदुओं के लिए करने को बहुत काम हैं जो उनके रहते ही निर्बाध हो सकते हैं। शब्द नोट कीजिएगा – निर्बाध। सरकारी सहायता की बात नहीं है यह, फर्क समझ में आता है तो ठीक है।

जय हिन्द। जनता कैसे बदल गयी है, समझ में आ ही गया होगा। स्ट्रेटजी में हमेशा जो उपलब्ध है उसी को अपनी ताकत बनाना होता है। और लड़ाई को समझना भी।

साईँ के बहाने करोड़ों हिन्दुओं को सनातन से दूर करने की साज़िश!

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