बौद्ध धम्म के उन्मूलन के मूल में ‘अर्थ’ था, न कि कोई ‘शुंग’ या ‘शंकर’

राष्ट्रवादियों! आप पुरानी रीति की लड़ाई नहीं लड़ रहे जिसमें दो सेनायें एक दूसरे के समक्ष रहती हैं तथा भौगोलिक क्षेत्र सीमित रहता है।

आप ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं जिसका विस्तार ठोस से ले कर वायवीय स्तरों तक सम्पूर्ण संसार में है। सैनिक कितने हैं, कैसे हैं, क्या करते हैं, उनकी मंशा क्या है, उद्देश्य क्या हैं इत्यादि का बहुत बड़ा भाग दृष्टिपथ में है ही नहीं।

ऐसे में यदि आप वास्तव में विराट उद्देश्य की लड़ाई लड़ रहे हैं, क्षुद्र स्वार्थ वश नहीं तो मृषा, असत्य एवं कल्पना से बचें। मूल स्रोत तक जा कर परख लें तब प्रस्तुत करें क्यों कि आप के पास झूठ के पोषण, छिपाव एवं प्रसार हेतु न तो सुव्यवस्थित समर्पित तन्‍त्र है, न अधिकारी पीठों पर विराजमान ‘कार्यकर्ता’, न ही मस्तिष्क प्रक्षालित समर्थक। इन सबके लिये बहुत समय, ऊर्जा, धन, निष्ठा, जीवन आदि सब स्वाहा करने पड़ते हैं। भारतीय राष्ट्रवादी पिछड़ गये, यह कटु यथार्थ है।

झूठ की लड़ाई समृद्ध लड़ सकता है कि सचाई तो है ही, शक्तिशाली समर्थक तंत्र भी है, किञ्चित असत्य भी सही, बात बिगड़ी तो सँभाल ली जायेगी, हज़ार मार्ग हैं! वह दूसरे स्तर की लड़ाई है, आप तो अभी पहले के लिये ही संघर्ष कर रहे हैं!

यहाँ एक बहुत ही जनप्रिय रीति है – बुद्ध एवं बौद्धधर्म को समस्त समस्याओं की जड़ बताने की जिसके बीज पुराणों में हैं। यहीं तक नहीं, हास्यास्पद तो यह है कि बड़े गर्व से बौद्ध उच्छेदक बता कर महापुरुषों को कलंकित किया जाता है तथा शत्रु पक्ष उसे सहर्ष स्वीकार कर ‘पीड़ित’ होने का नाटक करते हुये जीतता रहता है!

इस व्याधि के अ‍नेक अन्य विषयक उदाहरण विविध रूपों में मिलते हैं – भार्गव राम, आदि शंकर आदि नायक तो ‘उपयोग’ में लाये ही जा रहे हैं, रावण जैसे खल चरित्रों के भी पौ बारह हैं, बपुरों ने सहस्राब्दियों पहले कभी सोचा भी नहीं होगा कि वे इतने ‘उपयोगी’ हो जायेंगे!

ऐसा ही एक कलंकित नायक है पुष्यमित्र शुंग जिसे बौद्ध उच्छेदक बताया जाता है जब कि उसके समय में बौद्ध धम्म न केवल फल फूल रहा था अपितु उसे राज्य संरक्षण भी प्राप्त था। केवल एक अवसर पर राजनीति में बौद्धों के अति हस्तक्षेप के कारण पुष्यमित्र को हिंसक हस्तक्षेप करना पड़ा था।

आप उसे बौद्ध संहारक बताते हैं, नवबौद्ध वामी इत्यादि उसमें नमक मिर्च लगा कर प्रचारित करते हुये आप को आक्रान्‍ता यूरेशियन सिद्ध करते हैं। जो भ्रम उत्पन्न होता है, उसमें आप के अपने दूर होते चले जाते हैं। क्या समझते हैं, महिषासुर के प्रतिष्ठित होते जाने में आप का कोई योगदान नहीं है?

आप को आश्चर्य होगा कि आज से लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व तक बौद्ध धर्म को उत्तर भारत के हृदय क्षेत्र में न केवल राज्याश्रय प्राप्त था अपितु जनता भी उसकी अच्छी संख्या में अनुयायी थी। जैसे आज कल साँई चाँद मियाँ घर घर विराजमान है न, बोधिसत्त्व भी घर घर विराजमान थे। तो बौद्ध धम्म यहाँ से लुप्त कैसे हो गया? एक दिन में नहीं हुआ, शताब्दियाँ लगीं। अपने संकुचित कालबोध को विस्तार दें।

बुद्ध ने कर्मकाण्डों का निषेध किया, यज्ञों का किया। बौद्ध जनता की आस्था उनके जीवित रहने तक उनमें थी, संघ में थी, विविध बौद्ध मठों में भी रही। मृत्यु पश्चात उनके अवशेषों पर स्तूप बने, चैत्य बने। विशाल विहार ही बौद्ध धम्म की शक्ति थे जो शक्तिशाली, धनी एवं स्थिर राज्य के धन एवं संरक्षण से पोषित थे।

वे राज्य विशालकाय थे, तब ही कराधान का कुछ ‘अतिरिक्त’ निठल्ले महाविहारों के पोषण हेतु दे देना उनके लिये शक्य था। जब तक बड़े एवं दीर्घायु साम्राज्य रहे, बौद्ध धम्म फलता फूलता रहा। जब राज्य लघु हुये, कराधान सीमित हुआ तो पहली चोट व्यर्थ के व्यय पर पड़ी। अर्थ नहीं तो कुछ नहीं, विहार श्रम एवं उत्पादन में तो थे नहीं।

जैन हों या ब्रह्म मार्गी, विविध धार्मिक आयोजन लघु स्तर पर जन जन के यहाँ थे – व्रत, उपवास, संस्कार, अनुष्ठान, दीक्षा, विविध देवता, उपासना आदि आदि। वे विकेंद्रित थे तथा उदार एवं नवोन्मेषी भी। जैनियों को श्रेष्ठि वर्ग का भी विपुल संरक्षण प्राप्त था।

ऐसा नहीं था कि बौद्ध जन यह सब नहीं करते थे किन्‍तु उनकी शक्ति का स्रोत विकेंद्रित धर्म नहीं, विहार केंद्रित धम्म ही बना रहा। बुद्ध के अतिरिक्त आराध्यों में भेद की रेखा बहुत क्षीण थी।

ऐसे में जब धन एवं पोषण के अभाव में विहार धीरे धीरे उजड़ने लगे तो बौद्ध धम्म की जनता पर पकड़ समाप्त होने लगी। रही सही कमी मुसलमानी आक्रमणों ने पूरी कर दी क्यों कि उनके लिये बुतशिकनी पुण्य थी तथा उजड़ते, क्षीण होते विहार बहुत ही सरल आखेट थे।

बौद्ध धम्म के उन्मूलन के मूल में ‘अर्थ’ था न कि कोई ‘शुंग’ या ‘शंकर’।

बौद्ध धम्म हो या कोई भी भारतीय मूल का पंथ, सहजीविता अन्तर्निहित है, उन्मूलन का ‘श्रेय’ अपने सिर ले पुरखों का, इस मिट्टी का, सनातन धर्म का अपमान तो न करें!

वैविध्य के साथ सहजीविता का भाव इस देश के रक्त में है जिसका आज के युग में अब्राहमी मज़हबों जैसे राक्षसी मत भी यहाँ ध्वंसक लाभ ले रहे हैं। संगठित मज़हबों के समक्ष आज हिंदू पिट रहे हैं तो एक कारण चर्च एवं मस्जिदों का शक्तिशाली तंत्र भी है जो बाहरी पूँजी द्वारा पोषित है। आप ने तो अपने मंदिर नष्ट ही कर दिये, वहाँ का पुजारी आप को संसार का सबसे नीच प्राणी लगता है!

मंदिर में अंतिम बार कब गये थे? कब चार मित्रों के साथ वहाँ बैठ कर चर्चा किये थे? वहाँ पुजारी के हाथ में अधिकतम कितनी मुद्रा दिये हैं आज तक?

यदि आप समझते हैं कि सरकार आप के लिये यह सब करेगी तो ऊपर बौद्ध धम्म का उदाहरण है ही, कोढ़ में खाज की भाँति इसाई विधान भी है। जो आज उपलब्ध हैं, उन पुजारियों एवं ब्राह्मणों को गाली देने के स्थान पर यह विचार करें कि जो दिख रहा है वह वैसा क्यों है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि अति सेकुलरी उत्साह में आप सोचते समय अनजाने ही काल्पनिकता का भी सहारा लेने लगे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप एक बुराई को सौ अच्छाइयों की तुलना में भीमाकार बना कर प्रस्तुत कर रहे हैं? आप ने सुधार हेतु क्या प्रयास किये? कहीं ऐसा तो नहीं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होने के श्रेष्ठता भाव में आप जातिवाद से संक्रमित हो चुके हैं? अपने नायकों, मनीषियों एवं आराध्यों को स्वयं विकृत किये जा रहे हैं?

सोचिये, सोचने में धन नहीं लगता, आप क्या सोच रहे हैं, अन्य कोई नहीं सुन सकता। वहाँ सत्यनिष्ठ रहें, शनै: शनै: आप में भीतर परिवर्तन होने लगेगा, दृष्टि व्यापक होने लगेगी।

अपना कल्मष बिखेर कर दूषण प्रसार से पूर्व, स्थिर हो सोचें कि इस संवेदी त्वरित समय में क्या ऐसा करना ठीक है?

शंकर प्रच्छन्न बौद्ध हैं : आक्षेप के आधार और खण्डन

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