सिरे से खारिज किये जाने लायक किताब ‘युद्ध में अयोध्या’

बरसों पहले कभी अस्सी के दशक में मशहूर व्यंगकार शरद जोशी दैनिक व्यंग लिखते और वो नवभारत टाइम्स में छपा करता।

उनके व्यंगों की ‘प्रतिदिन’ नाम की श्रृंखला आई तो उसमें स्पष्ट लिखा था कि ये अख़बारों में छपे उनके व्यंगों का संग्रह है। कौन सा किस दिन लिखा गया था, उसकी तारीख भी मौजूद थी।

नए दौर के पक्षकार शायद सन्दर्भ देने की परिपाटी भूल गए हैं। ‘युद्ध में अयोध्या’ के लेखक हेमन्त शर्मा अपनी किताब की सन्दर्भ सूची में भी नहीं बताते कि ये उनके पत्रकारिता के दौर के अखबार (जनसत्ता) में छपे लेख हैं या इन्हें उन्होंने अलग से किताब के लिए लिखा था।

किताब शुरू से ही पूर्वाग्रहों से ग्रस्त दिखाई देती है। अनुक्रमणिका में लिखे अध्यायों के नाम ही स्पष्ट कर देते हैं कि लेखक किस पक्ष से कहानी सुनाने वाला है। कथानक अगर ‘ध्वंस’ से गढ़ना शुरू ही किया जाए तो फिर इसका अंदाजा लगाना मुश्किल भी नहीं रह जाता।

लेखक बताते हैं, “बैरिकेडिंग लांघ कुछ कारसेवक चबूतरे पर पहुंच चुके थे। इन सबने आडवाणी और जोशी के साथ धक्का-मुक्की की। मौके पर मौजूद अशोक सिंघल ने बीच-बचाव करना चाहा, पर वहां कोई किसी को पहचान नहीं रहा था”… लेकिन इससे पहले ही वो कह चुके होते हैं, “कारसेवक तो इसी खातिर यहां आए थे। कारसेवकों को वही करने के लिए बुलाया गया, जो उन्होंने किया। ‘ढांचे पर विजय पाने’ और ‘गुलामी के प्रतीक को मिटाने’ के लिए ही तो वे यहां लाए गए थे”!

आश्चर्य है कि शुरूआती पंक्तियों में निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद वो बताते हैं कि भीड़ नेताओं को भी पहचानने से इनकार कर चुकी थी। हाँ, यहाँ ये जरूर है कि घटनाक्रम लिखते समय वो अपनी भावनाओं को बीच बीच में डालना नहीं भूले। कारसेवकों को हिंसक, क्रूर, वहशी और न जाने क्या क्या बताते वक्त वो पहले कारसेवकों पर चल चुकी गोलियों का हिसाब पूछना जरूर भूल जाते हैं।

वो ये भी नहीं बताते कि सिर्फ बातों से कोई इतना उग्र क्यों था कि “नाखूनों से” इमारत ढहा देने पर तुले थे? लेखक फैज़ाबाद के कमिश्नर से और जोन के आई.जी. से परिचित होना बताना नहीं भूलते।

अपनी साठ से अधिक बार अयोध्या यात्रा के क्रम में उन्हें कैसे ये अंदाज़ नहीं था कि भीड़ उग्र भी हो सकती है, ये उनकी एक खोजी पत्रकार के रूप में क्षमताओं पर सवालिया निशान भी खड़े करता है।

वो ये तो बताते हैं कि 6 दिसम्बर से पहले उन्होंने कभी संघ (आरएसएस) के लोगों को राम-मंदिर आन्दोलन से जुड़ा हुआ नहीं देखा, लेकिन अपनी पूरी किताब में वो ये नहीं बताते कि इसके बाद भी वो संघ से जुड़े लोगों को तथाकथित “महाभारत” का परोक्ष रूप से जिम्मेदार क्यों मानते हैं।

उनकी पुस्तक के विमोचन में जो लोग नजर आये, वो उनकी व्यवहारकुशलता ज़रूर दर्शाता है। जिन्हें उन्होंने दोषी करार देता हुआ कथानक बनाया है, उन्हीं संगठनों के लोग उनकी पुस्तक का विमोचन करते नज़र आते हैं।

किताब में कहीं भी वाराणसी से जुड़ा कोई विवरण नहीं मिलता लेकिन सन्दर्भों में ‘बनारस: ए सिटी ऑफ़ लाइट’ का जिक्र आता है। इस किताब का उन्होंने क्या इस्तेमाल किया मालूम नहीं। अयोध्या के सन्दर्भ में हैंस बेकर का लिखा काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, उसका सन्दर्भ लिया गया है या नहीं, मालूम नहीं।

इसी बीच में किताब में एक जबरन घुसाया हुआ सा लगने वाला ‘संघर्ष’ नाम का अध्याय भी है। ये मुख्यतः मीनाक्षी जैन की किताब ‘राम एंड अयोध्या’ का ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ कनफ्लिक्ट एट अयोध्या’ की नक़ल मालूम पड़ता है, लेकिन लेखक ने कहीं उनकी किताब का भी सन्दर्भ नहीं दिया।

इसके अलावा मंदिर निर्माण से सम्बंधित कई किताबों के सन्दर्भ तो दिए गए हैं, लेकिन उनसे पढ़कर क्या लिखा गया ये पता नहीं चलता। किताब में मंदिर की संरचना, उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री, या स्थापत्यकला जैसी बातों का कोई ज़िक्र नहीं मिलता।

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि किताब का शोध पक्ष बहुत कमजोर है। लेखक को मौके पर मौजूद एक चश्मदीद गवाह की नज़र से तो देखा जा सकता है, लेकिन उनकी भावना प्रधान किताब को एक पक्ष में झुके होने और सन्दर्भ से परे हटने के कारण नकार दिया जाना चाहिए।

ज़मीन से बहुत पहले, दिमाग में लड़ी और हारी या जीती जाती है लड़ाई

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY