शक्ति का प्रदर्शन कहीं तो आवश्यक है ही ना?

हाशिमपुरा कांड में 18 पुलिस कर्मचारियों को उम्रक़ैद हुई।

इस पर अभी मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की जाएगी।

शुरुआत जन्मना हिन्दू कॉमरेड लोग जुमलेन्द्र की सरकार कहकर करेंगे, फिर जन्मना हिन्दू काँग्रेस राज के लाभार्थी और पिट्ठू उनके सुर में सुर मिलाएंगे और फिर उनसे जुड़ जाएँगे मोदी से नाराज़ हिन्दू, जिनको यह मुद्दा पकड़ा कर ये साइड में बैठकर उनका उत्साहवर्धन करते रहेंगे।

तो साहिबान, मुझे यह कहना है कि कानून की नज़र में ये दोषी हैं और यह सज़ा कानून के दायरे में है। लेकिन कुछ अलग बातें रखना चाहता हूँ, जो इस केस से अलग हैं।

मार्च 1987 में मेरठ दंगों में हिंदुओं की जो ‘शांतिपूर्ण’ हत्याएँ हुई थीं जिनकी संख्या तीन सौ से अधिक मानी जाती है, उससे उद्वेलित कुछ PAC के जवानों ने जून 1987 में हाशिमपुरा गाँव से 40 ‘शांतिप्रिय’ उठाए और उन पर गोलियां चलाकर उनकी लाशें कनाल में बहा दी थी।

उन पर ये मुकदमा चल रहा था। मुकदमे के बारे में मुझे इतना ही कहना है, बाकी आप अपने पसंद के न्यूज़ पोर्टल पर पढ़ सकते हैं। अब मैं अपनी बात पर आता हूँ।

मुद्दा क्रमांक 1 :

1987 से आज तक ये केस लड़ा गया। देखिये कितनी ज़िद और शिद्दत से ज़काती लोग प्रतिशोध के लिए डटे रहे। इसी के कारण मुझे हमेशा “जद्दोजहद” की जगह “ज़िद ओ’ जिहाद” ही दिखता है।

जी हाँ, इसे मैं प्रतिशोध ही कह रहा हूँ, जिसे न्याय का नाम दिया गया है। क्या दंगा शुरू करने वालों ने तथा दंगों में हिंदुओं की हत्या करने वालों जो किया उसको लेकर कभी ऐसी न्याय की भावना आती है इनके मन में? आज तक उनमें से किसी ने नाम लेकर दंगाइयों की सार्वजनिक निंदा भी की है?

बाकी मीडिया के सामने घड़ियाली आँसू बहाना और सांप्रदायिक तत्वों की निंदा करना तो समझ में आता है। और जहां हिन्दू प्रतिशोध के लिए खड़े हो जाये वहाँ दिल बड़ा करने की सलाह कौन देते हैं, लंबी सफ़ेद दाढ़ियों पर हाथ फेरते?

मुद्दा क्रमांक 2 :

आज तक समय समय पर इसके नाम से शांतिपूर्ण तरीके से समय समय पर आक्रोश केवल किया गया है, मेरठ दंगों पर और वहाँ की गयी हत्याओं पर एक शब्द नहीं। जन्मना हिन्दू ही उनकी बातों को उठा उठा कर बाकी हिंदुओं को शर्मिंदा करने में लगे रहते थे, कभी मेरठ दंगों पर तथा वहाँ मारे गए हिंदुओं के लिए एक सवाल नहीं पूछा कि हाशिमपुरा कांड करने को ये PAC के लोग उद्यत क्यों हुए।

मुद्दा क्रमांक 3 :

उस समय वीर बहादुर सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और काँग्रेस की सरकार थी। लेकिन कोई भी सरकार होती तो भी लोकतन्त्र के अंदर यह कांड को गुनाह ही माना जाता और केस भी चलता और सज़ा भी होती। इसलिए जन्मना हिन्दू कॉमरेड और काँग्रेसी ये कहने लगे कि एक हिंदुवादी सरकार ने इनको निर्दोष मुक्त नहीं किया, तो बात में कोई वज़न नहीं।

मुद्दा क्रमांक 4 :

यह हिंदुओं की सामाजिक ज़िम्मेदारी का मुद्दा है और सब से अहम यही मुद्दा है। पाकिस्तान में एक क्रूर कानून है जिसे ईश निंदा कानून कहा जाता है। इस कानून के बारे में यह सुनने में आया है कि गैर मुसलमान का हर तरह से शोषण करने में इसी कानून का सब से अधिक दुरुपयोग होता है क्योंकि मुसलमान को उस गैर मुसलमान पर सिर्फ आरोप लगाना है कि उसने ह. मुहम्मद की तौहीन की। सफाई उस गैर मुसलमान को देनी होती है और वह भी चार मुसलमान गवाह दे कर। इससे आप सच्चे इस्लाम की सत्ता का स्वरूप समझ सकते हैं कि अगर शरीय अदालत आई तो क्या होगा।

अस्तु, बात यह थी कि एक इसाई बुढ़िया पर उसके एक परिचित ने यह तोहमत लगाई। बुढ़िया का यह कहना था कि वो निर्दोष है और उसकी जो छोटी सी ज़मीन है उसे हड़पने के लिए उस पर यह तोहमत लगाई गयी है, वरना उसकी क्या मजाल कि वो ह. मुहम्मद की तौहीन करे?

पाकिस्तान में कोई उसकी मानने के मूड में नहीं था। लेकिन पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को उसकी बात में सच्चाई दिखी और उन्होंने कानून का ही विरोध किया कि यह केवल उत्पीड़न और ब्लैकमेल का जरिया है इसपर पुनर्विचार हो।

इससे कुपित होकर उनके बॉडी गार्ड ने उनको गोलियों से भून दिया। उसे अरेस्ट किया गया, केस चला और फांसी भी हुई। लेकिन वहाँ के समाज ने उसको बहुत नवाज़ा। जब भी कोर्ट में पेश किया जाता तो वकील उस पर गुलाब की पंखुड़ियाँ बरसाते। उसके लिए कवितायें लिखी गयी और न जाने क्या क्या।

जब फांसी चढ़ाया गया तो शहीद भी कहा गया। यह वहाँ के मुस्लिम समाज ने किया, पाँच साल से ऊपर हो गए उस बात को। तब मेरा एक सहकर्मी था जिसको मैंने इस पर छेड़ा तो उसने सलमान तासीर का नहीं बल्कि उस बॉडीगार्ड का समर्थन किया। और मुझे यह पता था कि उस बॉडीगार्ड का और मेरे इस सहकर्मी का फिरका अलग था, फिर भी। वो बॉडीगार्ड पाकिस्तानी और ये मैच में इंडिया की टीम का समर्थक भारतीय, फिर भी।

मैं उस बॉडीगार्ड का समर्थन नहीं कर रहा, बस उस समाज की अपने लोगों के लिए कमिटमेंट की बात कर रहा हूँ। यही उस समाज की कमिटमेंट है जो देशद्रोही अफज़ल की याद में घर घर अफज़ल पैदा किए जाते हैं – हाँ, देश द्रोही ही, उसका लंबा वीडियो उपलब्ध है जहां वो साफ साफ कह रहा है कि जो लोग उसके घर आ रहे थे वे कौन थे उसे पता था और वो उनकी हर तरह से मदद कर ही रहा था। कोई जबर्दस्ती न थी, वरना पुलिस को खबर कर देता।

यही उस समाज की कमिटमेंट है जो याक़ूब के जनाज़े में भीड़ लाती है। यही उस समाज की कमिटमेंट है जो मीम अफज़ल जैसे ज़हीन आदमी को भी मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों के लिए जनाज़े की नमाज़ की मांग को जायज़ ठहराने को चैनल पर लाती है – वरना आतंक का कोई धर्म नहीं होता, सुन सुन कर कान पक गए ही होंगे?

ज़कात में किसके किसके हिस्से होते हैं, सबूतों के साथ लिख चुका हूँ। गैर मुस्लिम हुकूमत को बदलकर मुस्लिम हुकूमत लाने के लिए जो जान लगा देते हैं उनका भी एक हिस्सा होता है। हमारे लिए वे आतंकी हैं, लेकिन उनका पोषण उनका मज़हब ही धर्मकर्तव्य बताता है। सरकारी मुलाज़िमों को घूस दे कर अपनी तरफ कर देना भी कर्तव्य बताया है जिसे ‘दिल मोहना’ कहा गया है।

उन 18 PAC वालों के लिए हिन्दू समाज ने क्या किया है? अब तो यही जन्मना हिन्दू कॉमरेड और जन्मना हिन्दू काँग्रेसी पीडी और सैफईय्ये जाकर उनके परिजनों को भी अपमानित करेंगे। अज्ञात जात रविष न्याय की जीत पर प्राइम टाइम करेंगे। और मोदी सरकार ने इन 18 PAC वालों को निर्दोष मुक्त नहीं किया कहने वाले हिन्दू, उस अज्ञात जात को देखा तो तुरंत लपक कर सेलफ़ी खिंचवाएंगे।

हम ही सुनिश्चित करते हैं कि दुबारा कोई वीर पैदा नहीं होता। किसी को वीरता दिखाने की इच्छा ही नहीं होती।

हाँ, पूरी ताकत से एक दूसरे पर कीचड़ जरूर उछालते हैं। फू फा कर के फूत्कारते ज़रूर हैं। शक्ति का प्रदर्शन कहीं तो आवश्यक है ही ना?

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