भये प्रगट कृपाला

वर्ष 1949 की बात है। अर्थात आज़ादी मिल चुकी थी लेकिन बंटवारे के साथ।

यहां महत्वपूर्ण है बंटवारा, जो धर्म आधारित था। और उस बंटवारे के ज़ख्म अभी ताज़ा थे।

और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है यह कि तब तक देश का संविधान लागू नहीं हुआ था, अर्थात धर्म निरपेक्ष का नेरेटिव भी नहीं गढ़ा गया था। जिसे थोपने में भी बाद में फिर दशकों लगे।

इन सब के बावजूद इतिहास में उस दौर के पन्नो को पलटने पर अनेक घटनाक्रम और उस पर हुई प्रतिक्रियाएं समझ नहीं आतीं। और पीड़ा देती हैं।

हां, तो हम बात कर रहे थे वर्ष 1949 की। महीना दिसंबर का था, तारीख 22 और 23 की ठंड वाली लम्बी रात में अयोध्या में जो कुछ हुआ वो ऐतिहासिक था।

जब संकरी गलियों के मंदिरों में भगवान विश्राम कर रहे थे और संत-साधू मठों में सो रहे थे तब रामजन्मभूमि के गर्भगृह में रामलला प्रकट हुए।

यह द्वापर नहीं था अर्थात कंस नहीं था, फिर भी उन्हें, करीब 500 वर्ष के विदेशियों द्वारा दिए गए वनवास के बाद, अपने ही जन्मस्थान पर भी, रात के अँधेरे में ही क्यों अवतरित होना पड़ा? क्या ताज़ा ताज़ा मिली हुई आज़ादी उनके लिए नहीं थी? क्या अनेक कंस तब भी थे?

उपरोक्त सवालों के जवाब हाँ ही हैं, क्योंकि उस रात और उसके बाद के घटनाक्रम पर निगाह डालने पर ऐसा ही कुछ लगता है।

उस रात रामलला के प्रकट होने के प्रमुख सूत्रधार बने पांच रामभक्त। इन्हें पांच पांडव भी कह सकते हैं, जिन्होंने पूरी व्यवस्था रची, अपने ही इष्ट को ससम्मान उनके ही जन्मस्थान पर अधिकारपूर्वक स्थापित करने की।

इन पांच लोगों में थे, नाथपंथी समुदाय की शीर्ष पीठ गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजयनाथ, संत बाबा राघवदास, निर्मोही अखाड़े के बाबा अभिरामदास, दिगम्बर अखाड़े के रामचंद्र परमहन्स और साथ में गीताप्रेस के हनुमानप्रसाद पोद्दार।

थे तो और भी, जो अपनी अपनी भूमिका निःस्वार्थ भाव से चुपचाप अदा कर रहे थे, और कइयों ने बाद में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया। लेकिन जब हम इन पांच महान रामभक्तों को ही धीरे धीरे भुला दे रहे हैं तो बाकी की चर्चा करना भी यहां व्यर्थ होगा।

घटनाक्रम कैसा हुआ होगा, इस पर अनगिनत विद्वानों का अपना अपना वर्णन है, कई किताबें हैं और फिर अगले दिन की एफ आई आर की कॉपी भी है। अगर इसके विस्तार में ना जाएँ, तब भी यह तो समझ आता ही है कि यह सब कितना कठिन रहा होगा।

जब इन पांच रामभक्तों ने रात की हड्डी कंपा देने वाली ठंड में सरयू स्नान किया और गर्भगृह में पहुंचे तब वहाँ पुलिस का पहरा था। फिर भी ये पाँचों रामभक्त अपनी धर्म स्थापना में सफल हुए थे और उन्होने मिल कर तुरंत इमारत के अंदर और बाहर गेरू से सीताराम और जयश्रीराम लिख दिया था।

उन दिनों रामजन्मभूमि मंदिर के ठीक सामने राम चबूतरे पर रामचरितमानस का अंखड पाठ चल रहा था, जिसके कारण कुछ एक भक्त वहां पहले से मौजूद थे। यह खबर आते ही कि भगवान प्रकट हो गए हैं, मौजूद भक्त पूरी भक्ति में आ चुके थे और ज़ोर ज़ोर से गाने लगे,

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी।
हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप विचारी।!

गोस्वामी तुलसीदास की ये चौपाइयां चरितार्थ हो रही थीं। और फिर तो आसपास के मंदिरों से भी घंटे-घड़ियाल बजने लगे थे। तड़के साढ़े चार बजे चारों ओर उत्साह और ऊर्जा का संचार था।

सिर्फ अयोध्या में ही नहीं हिन्दुतान में भी नया सबेरा नए संकल्प के साथ आया था। लेकिन भगवान को देखकर सिर्फ सूर्य देवता मुस्कुरा रहे थे और भक्त अपने इष्ट के आगमन पर प्रसन्नचित्त थे मगर साथ ही सतर्क भी क्योंकि उनकी शंकाएं सत्ता को लेकर निर्मूल नहीं थी। और वही हुआ जिसका पांच राम भक्तों को डर था, जिसके कारण उन्हें यह सब रात के अँधेरे में करना पड़ा था।

इस लेख को लिखने का असली उद्देश्य तो यहां से शुरू होता है। बाद के दिनों के लखनऊ और दिल्ली के घटनाक्रम दुःख भी देते हैं और हैरान भी करते हैं।

अगले दिन एफआईआर दर्ज की गई। किसलिए? क्या देश धार्मिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुआ था? जो कहते हैं नहीं, तो फिर उनसे सीधा सरल सवाल होना चाहिए कि धर्म पर आधारित विभाजन का फिर क्या औचित्य था?

पांच से सात सौ साल तक धर्म आधारित दो विदेशी सत्ताधारियों में से एक ने देश छोड़ दिया, दूसरे ने अपना हिस्सा ले लिया तो फिर इनके द्वारा जबरन किए गए कब्ज़े को मुक्त क्या नहीं किया जाना चाहिए था? और अगर यथास्थिति ही बनाई रखनी थी तो फिर धर्म आधारित दो स्वतंत्र देश बनाने का क्या तात्पर्य?

सवाल तो कई हो सकते हैं, लेकिन उपरोक्त संदर्भ में भी बात यहीं नहीं समाप्त हो जाती, उसके बाद सत्ता के गलियारों में दिल्ली से लेकर लखनऊ तक जो पत्रव्यवहार हुए वो आज तक किसी भी तरह से तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में रखकर समझाए नहीं जा सकते।

पढ़ने में आता है कि दिल्ली के सत्ता शीर्ष ने लखनऊ के सत्ता शीर्ष को मूर्तियां हटाने का निर्देश दिया था। और यही निर्देश लखनऊ से फ़ैजाबाद भेजे जा रहे थे। लेकिन फ़ैजाबाद के कलेक्टर के के के नायर अड़ गए।

के के नायर

अंग्रेज़ों के जमाने के नौकरशाह के के नायर केरल के रहने वाले थे। वही केरल जहां से शंकराचार्य अवतरित हुए थे, वही केरल जो आज भी सबरीमला में धर्म स्थापना के लिए संघर्षरत है।

अमूमन नौकरशाह को जनहित के मामले में निष्क्रिय माना जाता है लेकिन नायर साहब मानो राम के विशेष दूत थे। यही कारण रहा कि जब उन पर मूर्ति हटाने के लिए अधिक दबाव डाला गया तो उन्होंने इस्तीफा तक देने की बात लिख कर दे दी।

उपरोक्त संबंधित लिखित प्रमाण आज भी पढ़कर हैरानी होती है। और इस हैरानी के अनेक कारण हैं। जो आज भी मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करते हैं। वो तो यूनाइटेड प्रोविंस के प्रमुख गोविन्द वल्लभ पंत को सरदार पटेल का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त था वरना नेहरू अयोध्या में पूर्व स्थिति के लिए अड़े हुए थे। लेकिन कलेक्टर नायर भी एक मजबूत दीवार की तरह खड़े हो गए थे।

और फिर जो कुछ हुआ वो इतिहास है। सवाल उठता है कि अगर उपरोक्त पांच रामभक्त और नायर जैसे रामदूत नहीं होते तो रामलला आजतक अपने जन्मस्थान पर स्थापित नहीं हो पाते। ऐसे में क्या हिन्दुस्तान बिना श्रीराम की आज़ादी के आज़ाद माना जाता?

सवाल अनेक हैं? उनमें से एक यह भी कि जब भी उपरोक्त घटनाक्रम को लिखने वालों को कहीं भी पढ़ता हूँ तो तकरीबन सभी इसे लेकर अपराधबोध से ग्रसित नज़र आते हैं। फिर चाहे वो राजनेता हों या फिर तथाकथित बुद्धिजीवी और लेखक।

क्यों भाई? गंगा-जमुना की बात करने वालों, जब दो धारा दो देश में बंट गई तो फिर यह राग किस लिए? कई राम की मर्यादा की बात करते हैं, साथ ही ऐसे ऐसे अलंकृत शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनको पढ़कर तो श्रीकृष्ण भी अर्जुन से अपना गांडीव रखने के लिए कह देते। लेकिन फिर कैसे मिलता पांडवों को उनका हक? क्या वे पूरी ज़िंदगी वन में ही बिता देते? एक बार के लिए मान भी लो कि पांचों भाई जंगल में रह लेते लेकिन फिर हस्तिनापुर पर शासन तो अधर्म का ही बना रहता।

श्रीराम ने भी रावण का वध किया था, क्योंकि राक्षस ने माता सीता का षड्यन्त्रपूर्वक छल से अपहरण किया था। धर्म की स्थापना के लिए शास्त्र और कर्म दोनों ही आवश्यक हैं।

यह सत्य त्रेता के श्रीराम और द्वापर के श्रीकृष्ण के साथ कलयुग में 1949 के उपरोक्त पांच रामभक्त और नायर भी जानते थे, लेकिन आज के रामभक्त ना तो यह जानना चाहते हैं ना ही समझना, जबकि अब तो पिछले सत्तर वर्षों में सेक्युलर का वटवृक्ष वामपंथ का विष पी कर सत्ता के हर दीवार पर अपनी जड़े गहरी जमा चुका है। ऐसे में कैसे पाएंगे रामलला अपनी भव्यता को, जब आज की वानर सेना गिलहरी कर्म के लिए भी तैयार नहीं?

अपना राम स्वयं चुनती है अयोध्या

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  1. इस लेख को पढने के बाद पूर्ण सत्य ज्ञात हुआ लेखक को साधुवाद ।
    मेरा मत है जब भी देव श्रीराम का भव्य मंदिर बने तो तत्कालीन कलेक्टर नायर साहब और उन पांच महामानवो को भी याद किया जाये ।
    नायर साहब के किसी वंशज को बुलाकर उनका यथायोग्य सम्मान किया जाये ।

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