अभिजात्य माफ़िया द्वारा पाले पोसे विषवृक्ष की जड़ों में मट्ठा डालने का साहसिक प्रयास

आप अवश्य इसे मेरा अहंकार मानें, पर मैं विनम्रतापूर्वक कहूँगा कि मैं कई दशकों से राजनीति का गम्भीर अध्येता रहा हूँ।

वैज्ञानिक दृष्टि मेरी बनावट में है, उसे किसी नेहरू या रामचंद्र गुहा से मुझे उधार लेना नहीं पड़ा। हर बात को तर्क की तुला पर तौलता हूँ। विदेश में रहता हूँ, पर खाये पिए अघाए लोगों में शामिल नहीं हूँ।

नरेन्द्र मोदी के बारे में 2013 में मेरे मन में तमाम शंकाएँ थीं। उन शंकाओं के बावजूद 2014 में समर्थन न करने का तो प्रश्न ही नहीं था। पर नरेन्द्र मोदी वह करेंगे जो उन्होंने इतने कम समय में कर दिखाया है – इसका मुझे अनुमान तक न था।

जैसे जैसे समय बीता है उनके बारे में मेरी राय पुख्ता होती चली गई है।

मुझे आज यह कहने में कोई हिचक नहीं कि हम सौभाग्यशाली हैं कि नरेन्द्र मोदी जैसा व्यक्ति हमारा प्रधानमंत्री है। नरेन्द्र मोदी असाधारण बुद्धि, धैर्य, कर्मठता, साहस और निश्चय शक्ति से लैस राजनेता हैं। ऐसा जैसा हमने और हमारी पिछली पीढ़ियों ने न देखा।

एक छोटा सा उदाहरण। सरदार पटेल की जिस मूर्ति का अनावरण आज हुआ है – यह कोई मामूली बात है? सिर्फ एक मूर्ति है? नेहरू वंश की चट्टान के नीचे दबी iconography से देश को सदा के लिए उबारने की साहसिक योजना है।

उन्होंने साढ़े चार वर्ष के छोटे से समय में जो कर दिखाया है उसकी आशा कम से कम मैंने तो सपने में भी न की थी। विध्वंसात्मक रचना या रचनात्मक विध्वंस का काम।

धैर्य और संयम से अभिजात्य यथास्थिति की इमारत की ईंटें सरकाई हैं। एक के बाद एक। अभिजात्य माफ़िया द्वारा जतन से पाले पोसे विषवृक्ष की जड़ों में मट्ठा डालने का साहसिक प्रयास किया है। गुंजलक मार कर बैठे साँप के बिल में गरम पानी डाला है।

यह कोई मामूली साहस का काम नहीं है। हम आप होते तो काँख देते। भाग चलते या बिक गए होते।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जो लोग लम्बे समय से देश के सिर पर क़ाबिज़ थे, मज़े लूट रहे थे, वे बिलबिला कर बाहर निकले हैं। वे ऐसा न करते तो आश्चर्य की बात होती।

और वे सिर्फ राजनीति में नहीं हैं। वे विश्वविद्यालयों में हैं, पत्रकारिता में हैं, साहित्य में हैं, ब्यूरोक्रेसी, पुलिस और न्यायपालिका में हैं। हर जगह व्याप्त हैं। लम्बे समय से हमारे सिर पर पाल्थी मार कर बैठे हैं – देश उनकी सम्पत्ति में तब्दील है।

नरेंद्र मोदी ने जो बीड़ा उठाया है वह कठिन है, दुरूह है। रास्ते में चप्पे चप्पे पर साँप बिच्छू काटने को उद्यत छिपे बैठे हैं। यह लम्बा संघर्ष है। जीत की यहाँ कोई गारंटी नहीं। कम से कम बीस वर्षों का प्रोजेक्ट है।

अब हमको आपको यह तय करना है कि हम आप किसके साथ खड़े हैं। साँप बिच्छू के साथ या उसके साथ जो देश की तक़दीर बदलने के लिए पूरी ताक़त से लगा है, खून पसीना एक कर रहा है।

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