कर्म करो, फल की चिंता मत करो : जीवन के अनुभवों में गीता सार

Geeta Updesh

मेरे पिता मुझ से भी बड़े वाले नास्तिक हैं और खूंखार पाठक भी। आजतक श्रद्धा से मंदिर नहीं गये ना पूजा-पाठ में सम्मिलित होते हैं। उन्होंने मेरे बचपन में घर पर एक लंबा-चौड़ा पोस्टर लगा रखा था गीता के सार का, जिसके एक तरफ कृष्ण थे दूसरी तरफ घुटनो पर झुका अर्जुन तथा बीच में गीता का ज्ञान।

पापा के शब्दों में, ” Geeta is simply brilliant.”

कर्म करो, फल की चिंता मत करो, ये मेरे पापा ने कम से कम ढाई हजार बार बोला होगा मुझसे, मेरी हर दुविधा में।

पिछले सप्ताह क्लास से निकल रही थी तो कैंटीन के सामने इस्कॉन वालों की छोटी सी स्टॉल दिखी किताबों की। दो गेरुआ वस्त्र धारी कृष्ण के भक्तों ने कमान संभाल रखा था।

Krishna consciousness की किताबें मुझे पसन्द आती है तो मैं दौड़ कर पहुँच गयी। जेब में 150 रुपये थे जिसमें से मेरे घर वापस आने का भी खर्च था। कार्ड था मेरे पास पर वे ले नहीं रहे थे। अतः, मैंने एक 30 रुपये की पतली किताब उठायी। फिर पर्स वापस चेक किया। किसी कोने में कोई छुपा पैसा नहीं था। फिर बजट देख कर एक 70 रुपये की दूसरी किताब पर हाथ रखा। लालच तो आ रहा था पर उस वक्त उससे ज्यादा खरीदना सम्भव नहीं था।

तभी बगल में खड़ी एक मॉडर्न सी जीन्स-टॉप वाली अधेड़ उम्र की औरत बोल पड़ी – Excuse me, how is your Hindi?

मैंने कहा- I think I am good in it.

उनके हाथ में एक हिंदी की किताब थी तो मुझे लगा कि शायद मेरी मदद चाहिये होगी। पर उनका अगला वाक्य मुझे आश्चर्यचकित कर गया।

– ठीक है, फिर ये किताब मेरी तरफ से गिफ्ट है तुम्हें।

– पर क्यों? मेरे मुँह से निकल पड़ा।

-क्योंकि तुम गीता को समझने की कोशिश कर रही हो जो आजकल ज्यादातर इस जेनरेशन के लोग नहीं करते। क्या पता जिंदगी के किस मोड़ पर इन किताबों में लिखी कौन सी बात तुम्हारे काम आ जाये।

फिर उन्होंने उस हिंदी वाली किताब को उलट-पलट कर देखने के बाद एक अंग्रेजी की किताब भी उठा ली जो ज्यादा महंगी थी, ये बुदबुदाते हुये कि तुम्हे शायद ये वाली ज्यादा फायदा करे। मैं झेंप गयी और बोल पड़ी।

– मैम एक किताब काफी है। Thanks, but it’s really fine.

तब उन्होंने एक बहुत खूबसूरत बात कही…

– it’s not about being fine, it’s about knowledge.. वैसे तो knowledge की कोई उम्र नहीं होती। अब मुझे देखो, सारी पढ़ाई कम्प्लीट करने के बाद मनोविज्ञान सीखने का शौक आया तो इस कॉलेज में एडमिशन लेने की सोच रही हूँ। पर आप जिस उम्र के दौड़ से गुजर रही हैं वह आदर्श है knowledge को explore करने के लिये। इसीलिये चुपचाप रख लो।
इतना स्नेह और अधिकार था उनके शब्दो में कि मेरी formality की दुकान वहीं ढह गयी।

फिर वे मेरा bill pay कर के और good luck बोल कर चल दी।
मैं इस्कॉन वाले दोनों भक्तों की तरफ मुड़ी भावविह्वल होकर, आखिर इंसानियत की एक नयी मिसाल कायम हुयी थी। कोई अजनबी अपने पैसे लगा कर दूसरे के बच्चे को पढ़ने के लिये किताबे दे रहा था। पर वो दोनों भक्त ऐसे निर्लिप्त भाव से मुस्कुराये मानो दुनिया में किसी और के लिये इतना सोचना दुनिया की सबसे सामान्य चीज़ हो।

मुझे समझ आया कि इन लोगों के लिये इतनी अच्छाई सामान्य ही है। तभी तो इस्कॉन में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो करोड़ो की सम्पत्ति छोड़ दूसरों की सेवा कर रहे हैं।

पर मेरे साथ ऐसा शायद पहली बार हुआ था। तो तुरन्त exited होकर घर पर फोन किया। पापा ने भी बड़े निर्लिप्त भाव से कहा,
” गीता और उसके followers बहुत brilliant होते हैं… I told you..” 😀
पर आज कृष्ण को मानने वाले ज्यादा हैं, उनकी बातें मानने वाले बहुत कम।

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