ज्योतिषीय दृष्टि में ‘सरदार’

भारत के बिस्मार्क लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात में नडियाद नामक स्थान पर हुआ था।

इनके जन्म समय को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इनका जन्म समय शाम को 19:23:32 मानते हैं तो कुछ विद्वान 17:56:00 के पक्ष में तर्क देते हैं।

मैंने दोनों कुण्डलियों का तुलनात्मक अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुँचा कि 19:23:32 वाली वृष लग्न की कुण्डली ही सही है।

इस कुण्डली में लग्नेश शुक्र, पंचमेश बुध, चतुर्थेश सूर्य और एकादशेश गुरु चारों षष्ठ भाव में चले गए हैं। सप्तम भाव में वृश्चिक राशि में बैठा नीच का चन्द्रमा लग्न को देख रहा है। नवम भाव में मकर राशि में उच्च का मंगल स्वराशिस्थ शनि के साथ विराजमान हैं। राहु एकादश भाव में मीन राशि में और केतु पंचम भाव कन्या राशि में स्थित है।

जिन विद्वानों ने इनका जन्म समय 17:56:00 माना, उसके पीछे भावना यह रही होगी कि इससे मेष लग्न की कुण्डली बन जाती है और प्रथमदृष्टया ही कुण्डली में राजयोगों की भरमार दिखने लग जाती है।

इस कुण्डली में तीन-तीन पंच महापुरुष राजयोग एक साथ बन जाते हैं। दशम भाव में मकर राशि में उच्च के मंगल से रुचक योग, स्वराशिस्थ शनि से शश योग और सप्तम भाव में अपनी मूलत्रिकोण तुला राशि में स्थित शुक्र से मालव्य योग का निर्माण हो जाता है।

यही नहीं, शास्त्रों में जितने राजयोग मेष लग्न के लिए बताये गए हैं उतने अन्य लग्नों के लिए नहीं बताये गए हैं। शायद यही कारण रहा होगा कि कुछ विद्वानों ने वृष लग्न के स्थान पर मेष लग्न का चुनाव करना अधिक उचित समझा।

ऊपर से देखने पर मेष लग्न की कुण्डली ही अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है पर जैसे ही हम नवमांश और दशमांश कुण्डलियों का तुलनात्मक विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि उनकी वृष लग्न की कुण्डली ही अधिक दमदार है। जो उनके जन्म का सही समय भी है।

व्यक्ति अपने कर्मों से संसार में जाना जाता है, इसलिए प्रोफेशन, पद, प्रतिष्ठा को दर्शाने वाली दशमांश कुण्डली का सशक्त होना बहुत आवश्यक है। सरदार पटेल की दशमांश कुण्डली में नवमेश गुरु राहु के साथ लग्न में बैठा है, लग्नेश मंगल दसवें भाव में उच्च का होकर मकर राशि में बैठा है। तृतीय भाव का स्वामी बुध एकादश भाव में है और एकादश भाव का स्वामी शनि तृतीय भाव में है। यह एक जबरदस्त परिवर्तन योग है। कुण्डली में तीसरा भाव कम्युनिकेशन और संचार माध्यमों का प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि उन्हें 2 सितम्बर, 1946 को ही भारत के अंतरिम सरकार के गठन के समय से ही गृह के साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई।

अब हम उनके वृष लग्न की कुण्डली को समझने की कोशिश करते हैं। उनके लग्न का नक्षत्र कृतिका है। कृतिका नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। इस कारण उनके व्यक्तित्व पर सूर्य का रौबदार प्रभाव झलकना स्वाभाविक है। इस नक्षत्र का संबंध देवताओं के अजेय सेनापति कार्तिकेय से है। वे भगवान शिव के अंश से उत्पन्न हुए थे। तारकासुर को वरदान प्राप्त था कि वह शिव के पुत्र से ही मरेगा, इसी कारण इन्हें अवतार लेना पड़ा। इनका बाल्यकाल में लालन-पालन और अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा कृतिकाओं ने ही दिया। कृतिकाओं ने उन्हें उस समर के लिए तैयार किया जिसके लिए उनका अवतरण हुआ था। इसी कारण कृतिका नक्षत्र शौर्य का प्रतीक है। इस विशेष लग्न नक्षत्र में सरदार पटेल का जन्म ही कह रहा है कि वे एक विशेष प्रयोजन से आये हैं और जो काम उन्होंने किया उसे वे ही कर सकते थे, कोई और नहीं।

चन्द्रमा तृतीय भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में अपनी नीच राशि वृश्चिक में स्थित है। ऊपर से नीच का दिखने वाला यह चन्द्रमा षडबल में सबसे बलवान ग्रह है। केतु और मंगल चन्द्रमा के नक्षत्र में बैठे हैं। चन्द्रमा पराक्रम भाव का स्वामी है और एक युद्धप्रिय राशि वृश्चिक में बैठकर लग्न को देख रहा है। ऐसे लोग किसी से दब नहीं सकते। चन्द्रमा मंगल की राशि में है और वो मंगल उच्च का होकर नवम भाव में शनि के साथ स्थित है। चन्द्रमा वृष लग्न के लिए योगकारक ग्रह शनि के नक्षत्र अनुराधा में है। इस प्रकार मंगल और चन्द्रमा दोनों शनि के प्रभाव में हैं, इसलिए उनका आक्रामक व्यक्तित्व उच्छृंखल नहीं बल्कि नियंत्रित है।

सूर्य, बुध, शुक्र और गुरु षष्ठ भाव में बैठे हैं, उस पर योगकारक ग्रह शनि की दृष्टि आ रही है। लग्नेश, पंचमेश, लाभेश का संबंध षष्ठ भाव से हो रहा है जो इन्हें सफल वकील बना रहा है। ये सारे ग्रह विदेश के बारहवें भाव को देख रहे हैं और चन्द्र कुण्डली से सूर्य दसवें प्रोफेशन के घर का स्वामी होकर बारहवें भाव में चला गया है। इन चार ग्रहों में से तीन गुरु, सूर्य और बुध विदेशी ग्रह राहु के स्वाति नक्षत्र में हैं। यही कारण है कि जब 1910 में इनकी शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा चल रही थी तो ये बैरिस्टरी अध्ययन के लिए इंग्लैंड चले गये।

पंचम भाव जो बुद्धि का प्रतिनिधि है उसमें एक बौद्धिक ग्रह बुध के कन्या राशि में स्थित केतु इन्हें तीक्ष्ण मस्तिष्क के स्वामी के साथ ही दूरदर्शी भी बना रहा है। इनकी कुण्डली में त्रिकालज्ञ योग भी है। यही कारण था कि पड़ोसी देश चीन के 1962 में भारत पर आक्रमण करने के बारह वर्ष पूर्व ही, 9 नवम्बर, 1950 को इन्होंने भविष्य में चीन के आक्रमण करने की भविष्यवाणी कर दी थी।

लग्नेश शुक्र, एकादशेश गुरु और पंचमस्थ केतु पुष्कर नवांश में है। गुरु अपनी ही मीन राशि में पुष्कर नवांश में है जो लग्न कुण्डली का एकादश भाव है तथा शुक्र और केतु वृष राशि में पुष्कर नवांश में हैं जो लग्न कुण्डली का लग्न भाव है। इस विशेष स्थिति ने कुण्डली को बहुत अधिक बलवान बना दिया है।

इनकी कुण्डली में राजकुलोत्पन्न राजयोग है। जब कुण्डली में तीन या उससे अधिक ग्रह अपने उच्च राशि, मूलत्रिकोण राशि या स्वराशि में स्थित हों तो इस प्रभावशाली योग का निर्माण होता है। इनकी कुण्डली में मंगल, शुक्र और शनि के कारण यह योग बन रहा है। इसके अतिरिक्त हर्ष योग, ख्याति योग, देश-विदेश यात्रा योग, पारिजात योग, सिंहासनांश योग आदि अनेक योग इनकी कुण्डली को बल प्रदान कर रहे हैं। इसके साथ ही इनकी कुण्डली में महादान योग भी है। इस योग के प्रभाव से ही खेड़ा सत्याग्रह के समय गांधी की अपील पर इन्होंने अपनी अच्छी खासी चल रही वकालत छोड़ दी। यही नहीं, प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार होने के बावजूद, सिर्फ गांधी का मान रखने के लिए इस पद का भी दान कर दिया।

चतुर्थ भाव जो कि अपने घर का प्रतिनिधित्व करता है उसका स्वामी सूर्य विवाद के षष्ठ भाव में राहु के नक्षत्र में बैठा है। ये स्पष्ट रूप से भूमि विवाद दिखा रहा है। इन्होंने अपने मंगल की महादशा और केतु के अन्तर्दशा में देशी राज्य विभाग की स्थापना की और देशी राज्यों के भारत में सम्मिलन की अपील की तथा 562 देशी रियासतों को भारत में मिलाकर भारत का राजनीतिक एकीकरण किया। मंगल की महादशा और शुक्र के अन्तर्दशा में 13 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद पर आक्रमण करने का कठोर आदेश दिया और 17 सितम्बर, 1948 को उस पर हमारे सुरक्षाबलों ने अधिकार कर लिया।

जैमिनी ज्योतिष के अनुसार इनका आत्मकारक ग्रह शनि है और अमात्यकारक ग्रह शुक्र है। चर दशा के अनुसार 1 नवम्बर, 1942 से 1 नवम्बर, 1952 तक दस वर्षों के लिए सिंह राशि की दशा चल रही थी। सिंह राशि से दशम भाव वृष राशि पर आत्मकारक शनि और अमात्यकारक शुक्र दोनों का प्रभाव था। इस प्रबल राजयोगकारक दशा ने उप-प्रधानमंत्री के साथ गृह मंत्री तथा सूचना व प्रसारण मंत्री का महत्वपूर्ण पद दिया, जिसका निर्वहन इन्होंने अत्यंत कुशलतापूर्वक किया।

इन्हीं विशेष समयावधि में उन्होंने अपने जीवन की सबसे बेहतरीन पारी खेली और नवोदित भारत को सैकड़ों टुकड़ों में विखण्डित होने से बचा लिया। ईश्वर द्वारा पूर्वनियोजित अपनी इस दैवीय पारी को खेलकर राहु की महादशा और राहु की ही अन्तर्दशा में भारत का बिस्मार्क और हम सभी का कार्तिकेय 15 दिसम्बर, 1950 को गोलोक धाम के लिए प्रस्थान कर गया.

भारत की कुण्डली के अनुसार सत्ता पक्ष के लिए विजय का मार्ग प्रशस्त

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