हम हाथी के साथ उस आखिरी धृष्टता की राह देख रहे हैं, जिससे वह पागल हो जाए

धर्म के बारे में मैं जो कुछ लिखता हूँ, शुद्ध सामाजिक सन्दर्भ में लिखता हूँ, मेरा कोई अन्य, अघोषित उद्देश्य नहीं होता है।

कल 29 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर मामले पर सुनवाई फिर जनवरी तक टाल दी! इस बात पर कइयों की कई तरह की प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली।

खेद, उद्वेग, क्रोध, असहायता, संतप्त प्रतिक्रिया देने का आवेश… कई रंगों की प्रतिक्रिया थी। और अपने अपने हिसाब से वे प्रतिक्रियाएं ठीक भी थीं।

जिनकी प्रतिक्रिया नहीं आई, उनकी भी एक अभिव्यक्ति आप समझ लें – प्रतिक्रिया देने का कोई लाभ न दिखने से ऐसा हुआ होगा!

मेरी प्रतिक्रिया रही अल्प-से रोष की, और इस व्यवस्था को बदल देने के लिए और बढ़-चढ़कर काम करने की।

आप ने आज ही वायरल हुई शबरीमला के समर्थन में केरल के युवक-युवतियों की वीडियो क्लिप देखी होगी। कट्टरपंथी विधर्मियों और बेफिक्र, सिक्युलर हिन्दुओं का प्रदेश हुआ करता था केरल! और धीमे धीमे हिन्दू अल्पसंख्यक बनने के कगार पर जा खड़ा हुआ था।

संघ, भाजपा और अन्य कट्टर हिन्दू दल भी इस धीमे, लेकिन सुनिश्चित बदलाव का प्रतिकार करने में खुद को असहाय पा रहे थे। संघ की प्रतिबद्धता के कई किस्से हम ने देखे, पर ज़मीनी हक़ीक़त को बदलने में कतिपय केरली युवकों के जीवन की आहुतियां काम नहीं आ रही थी। शायद सूक्ष्म बदलाव हो रहे थे, पर व्यापक परिणाम दिखाई नहीं दे रहे थे।

जैसे 1857 के स्वातंत्र्य समर के पहले असंतोष का बारूद जनता में लबालब भरा था, पर ऐसी कोई स्पष्ट चिंगारी उठ नहीं रही थी कि विस्फोट हो। मानव बड़ा सहनशील प्राणी है – धीमे धीमे उस के लिए परिस्थितियां विकट कर दी जाएं, तो उन विकट परिस्थितियों में जी लेना वह सीख ही जाता है।

उदाहरण के लिए मुग़ल काल देख लीजिए – दोयम दर्जे का नागरिक बन कर, अपनी बहु बेटियों के छीने जाने पर भी मन मसोस कर, प्रारब्ध को कोस कर हम 800 वर्ष जिए। (मैं शुद्ध मुग़ल काल नहीं, अपितु सारे परकीय आक्रमणों और शासन के काल को गिन रहा हूँ)। विस्फोट कहीं नहीं हुआ।

लेकिन जब हमारी धार्मिक आस्था पर प्रहार हुआ, तो वह चिंगारी बना, और बारूद फट पड़ा! विस्फोट इतना भयानक हुआ, कि अंग्रेज़ लगभग भारत छोड़ भागे। कुछ जयचंदों का, और हमारी इतिहासजनित भीरु प्रवृत्ति का दाग इसे न लगता तो तभी भारत स्वतंत्र हो जाता।

खैर, अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध की गयी हमारी लड़ाई भी कई मायनों में हमारी धार्मिक आस्थाओं की मदद से ही लड़ी गई। मो. क. गांधी भी अपनी धार्मिकता का सार्वजनिक आडम्बर करते, तो वह भी राजनीतिक स्तर पर भारतीय जनता को वश में करने के लिए, क्योंकि वे जानते थे, कि यदि भारतीय जनमानस पर अधिकार ज़माना है तो धार्मिक बनना और दिखाई देना आवश्यक है – भारतीय यदि कहीं बगैर अधिक सोचे अपना सर झुकाता है तो वह केवल धर्म के प्रभाव में!

बंकिम चंद्र चटोपाध्याय के विख्यात उपन्यास ‘आनंदमठ’ अंग्रेज़ों से लोहा लेने के प्रयास की कहानी है, लेकिन उस का भी आधार धार्मिक ही है।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी के जीवन का आधार था उन का धार्मिक और आध्यात्मिक चिंतन, जिस के बल पर वे देश के अग्रणी नेता बने।

योगी अरविंद घोष अपने जीवन के उत्तरार्ध में संन्यास ले कर विरक्त जीवन की ओर मुड़े, पर उन की धार्मिक आस्था उन्हें राजकीय गतिविधियों से अछूता नहीं रख पाई।

भारत को भारत माता के रूप में, अपनी मातृभूमि, पुण्यभूमि के रूप में देखने वाले ही स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़े थे। वैटिकन और मक्का-मदीना के मुरीद या तो बेफिक्र तमाशा देख रहे थे या सक्रिय रूप से स्वतंत्रता संग्राम के विरोध में अंग्रेज़ों को सहयोग दे रहे थे। अपवाद इस परिच्छेद के पहले वाक्य में समाहित है।

तो वापस आ कर हम आज की परिस्थिति पर एक नजर डालें –

यद्यपि हम 100 करोड़ हिन्दुओं की बात हम हर सांस के साथ करते हैं, हमें पता है कि संवैधानिक बेड़ियों ने और मक्कार राजनीति ने हमें अपने ही देश में दोयम नागरिक का दर्जा दे रखा है।

हम अपने आराध्य को पूजने में स्वतंत्र नहीं है। हमारे मंदिरों में विधर्मियों को हठात घुसाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय सक्रिय मदद करता है।

हमारे कई प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कई सदियों से विधर्मियों के कब्ज़े में, खंडित और अपमानित रूप में हैं।

अपने ही देश में कश्मीरी पंडित मार-काट कर भगा दिए हैं, और जो दुष्ट इस में संलिप्त हैं, उन्हें सरकारी राजस्व पर पालने-पोसने के लिए हम मजबूर हैं।

असंतोष का बारूद भरा है। उस पर दबाव बढ़ रहा है। पर लगता है अभी हमारे तितीक्षा की सीमा लांघी नहीं गई है। इस परिस्थिति में यदि कोई छोटी-मोटी राहत मिल जाती है तो दबाव और कम हो जाएगा, हिन्दू समाज करवट बदल कर सो जाएगा।

इसलिए मेरा मानना है कि कल सर्वोच्च न्यायालय ने जो रवैया अपनाया, और जिस दिशा में वह इस विवाद को ले जा रहे हैं, उसमें हिन्दू समाज को जगाने की क्षमता है। इस लिए मैं उसे स्वागत योग्य कदम मानता हूँ।

हम हाथी पागल होने की खबरें कभी कभी सुनते हैं। वस्तुतः हाथी पागल नहीं होता – वह अपने ऊपर के अन्याय को सहते सहते अपनी सहन शक्ति की सीमा तक आ पहुँचता है। उस के उपरांत जो कुछ कदम माहूत (महावत) या परिचारक उठाता है, वह हाथी के संयम का बाँध तोड़ देता है, और उस मनुष्य की जान चली जाती है। हाथी का पागलपन बस उसकी आत्मरक्षा की इच्छा की अभिव्यक्ति होता है!

हम हाथी के साथ उस आखिरी धृष्टता की राह देख रहे हैं, जिससे वह पागल हो जाए।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया से देश में सामाजिक स्तर कुछ सकारात्मक बदलाव आएगा, इस आशा को हम तिल-तिल मरते देख रहे है। अब आशा ऐसी की जा रही है कि जैसे मीर बाक़ी ने राम मंदिर तोड़ते समय किसी क़ानून के बारे में नहीं सोचा, जैसे उस विवादित ढाँचे को ध्वस्त करने के लिए सामूहिक रूप से क़ानून की धज्जियाँ उड़ानी पड़ी, उसी तरह यदि हिन्दू हित के कामों को अंजाम देना है तो क़ानून का पालन नहीं, बल्कि उसे तोड़ कर ही शायद काम बने !

प्रस्थापित व्यवस्था को चाहिए कि किसी तरह देश को उस अंजाम तक पहुँचने से बचाए। और शायद राम मंदिर के निर्माण की अनुमति उस दिशा में एक कदम होगा।

मेरे लिए राम मंदिर बनना स्वागत योग्य कदम है ही, लेकिन सामूहिक आत्महित की चेतना हिन्दू मानस में जागना उससे भी बढ़कर बात होगी। प्रभु राम एक मंदिर के मोहताज नहीं, सारे हिन्दुओं के हृदय में वे वास करते हैं। और उस हृदय में आत्मसम्मान की चेतना जाग उठना उस एक मंदिर से कई बेहतर बात होगी।

सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे, और भारत को वही प्रतिष्ठा, हिन्दुओं को वही खोया आत्मसम्मान पुनः दिलाएंगे!

हे मी लॉर्ड! सहने और प्रतीक्षा की भी एक हद होती है!

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