शराबी

महानगर में नज़र आने वाले अनगिनत लोगों से इतर किसी कोने में जब दस-बीस लोग घेरा बनाकर खड़े दिख जाएं तो समझ लेना चाहिए कि वहां कोई हादसा हुआ है।

उस रोज़ भी वहां एक हादसा ही हुआ था पर अलग किस्म का। एक आदमी सड़क किनारे लुढ़का पड़ा था। दूसरा, लुढ़क जाने से किसी तरह खुद को बचाए रख कर खड़ा था और तीसरा जो एक बच्चा था, वह इस नाटक के बीच भरी-भरी आंखों से दर्शक की तरह सब कुछ देख रहा था।

खड़ा शराबी बार-बार बोल रहा था लेकिन उसे समझने वाले एक-आध ही थे। शब्द उसके मुंह से बाहर निकलने से पहले सुस्ता कर गिर जाते।और स्थिति पूर्ववत हो जाती।

यह साफ ही नहीं हो पा रहा था कि लुढ़का हुआ व्यक्ति कौन है, दूसरे व्यक्ति से उसका क्या रिश्ता है और छोटा बच्चा उनके साथ क्यों है।

तमाशा देखने वालों की संख्या धीरे-धीरे ज्यादा होती जा रही थी। वहां से गुज़रने वाले लोगों में से अधिकांश झांकने आ जाते थे कि आखिर चल क्या रहा है और फिर उन्हें समझते देर नहीं लगती कि नाटक के केन्द्र में शराब है।

तमाशाई जमात में कुछ लोग पता पूछने वाले थे, कुछ उपदेशक और कुछ पुलिस को सूचना देने की जिम्मेदारी से भरे सामाजिक। इन सबके बीच कुछ लोग तटस्थ भाव से दार्शनिक की मुद्रा में देखने वाले भी थे।

“क्या ज़िंदगी है!”

एक मुटल्ला, जो खुद छितराए हुए चेहरे से छक कर शराब पी चुके होने का संकेत दे रहा था, बोल पड़ा। दूसरे ने उसके सुर में सुर मिलाया।

“अरे जिस दिन पैसे मिले, उसी दिन उड़ा दिया.. शराबी का कोई ईमान धरम नहीं होता।’

वहीं कोने में किसी सोसाइटी का सिक्योरिटी गार्ड खड़ा था, उसने रौब के साथ बच्चे से पूछा – ‘कौन है ये तुम्हारा”

बच्चा… रो पड़ा जैसे बर्रे ने काट खाया हो… पापाआआआ…!

साथी शराबी जोश में आ गया। अरे मैं.. जानया हूं.. इकत्तीस नंबर.. गई में रहता है..
शराबी जब बोलना शुरू करता था तो पूरी प्राणशक्ति से शब्दों को उठाता लेकिन भीतर मदिरा की उत्तुंग लहरें उन्हें धर के पटक देतीं और शब्द उठते-गिरते ही मुंह से बाहर निकल पाते।

“ये तुम्हारे साथ था तो तूने इसे इतनी शऱाब क्यों पीने दी… साला भभका मार रहा है चार फीट दूर से ही।” संस्कारी मुटल्ला बोला।

“कितनी दारू पी है बे”

अद्धा..

“भाग साले… अद्धा पीकर ये हाल होता है किसी का। पूरी बोतल ठेली है अंदर”।

यानी मुटल्ले ने शराब पीने के वर्षों के अनुभव से यह बताया कि अद्धे में आदमी पूरी तरह से नहीं गिरता।

नई सच कहता हूं… अद्धा…! पूरा वाक्य बोलने की ताकत नहीं बची थी…

“कहां रहता है”

“यही त्रिओकपुई में”…

“बेटे तुम अपने घर का पता जानते हो…?”

बच्चा ज़ार-ज़ार रो रहा था।

“तेरी मम्मी कहां है?”

बच्चे ने सिर हिला कर बताया, नहीं है।

तब तक शऱाबी साथी बोल पड़ा…

“अरे है, मै जानया हूं.. इसकी मम्मी को..”

इस वक्त तक वहां पुलिसवाले की कमी थी जो हुआं हुआं करते हुए पूरी हो गई।

एक मुस्टंडा सा पुलिस वाला मोटरसाइकिल की सीट को सांस लेने की आजादी देता हुआ नीचे उतरा।

“हां भई, क्या बात हो गई…”

“अरे कितनी चढ़ा ली है… ये बच्चा किसका है ?”

“कहता तो खुद को इसी का है साहब”। कोने से आवाज़ आई।

पुलिस वाले ने बच्चे से पूछा, ये कौन है तुम्हारा बेटा”

“पापा”। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया।

दूसरे शऱाबी की ओर मुड़ते हुए पुलिसवाले ने पूछा, तू क्या कर रहा था इसके साथ ?
“कहां रहता है, अपना पता बता ! ”

“गली नंबर 31, तिओकपुई…”

“तू इसकी बीवी को जानता है, फोन नंबर है इसके पास ?”

जेब की तलाशी शुरू हुई। एक मोबाइल फोन बरामद हुआ लेकिन वह भी निढाल था, उसकी बैटरी जा चुकी थी। जेब से बटुआ भी निकला.. जिसमें आधार कार्ड था। ऊपर नाम लिखा था, राजेश साहू। पता ये बतला रहा था कि शऱाबी दमोह जिले के किसी कस्बे का रहने वाला है। बटुआ उसमें ठूंसे गए रद्दी कागज से फूल गया था।

शायद कागजों पर उन सभी घरों का पता और नंबर रहा हो जहां-जहां उसके रंगों की ब्रश चली हो और जिन-जिन घरों को रंगते हुए उसने अपनी शामें रंगीन की हों। आज उसका बटुआ खाली था। उसमें अठन्नी तक न थी।

“इसमें तो कुछ भी नहीं है, तू इसे जानता है तो इसे घर लेकर जा न!”

“हां साब, ले जाऊंगा…”

“अबे तू क्या ले कर जाएगा, सीधे खड़े होने की हिम्मत तो है नहीं! देसी पीकर दिमाग दुरुस्त हो गया है तेरा!”

“अरे पानी लेकर आ ! किसी रिक्शावाले को रोक, इसे लाद देते हैं, ये शराबी ले कर जाएगा !!”

तब तक हवलदार महोदय भी आ पहुंचे। उन्होंने शराबी को निर्विकार भाव से देखा, चेहरे पर कोई हरकत नहीं हुई।

ज्यादा पी ली है, होश हवा है!

हवलदार ने टोका, कहां रहता है, पता कर लिया तूने?

“त्रिलोकपुरी का नाम ले रहा ये दूसरा शराब्बी”

बाल्टी में पानी आ चुका था। सिपाही हंस कर बोला, अभी इसके कान में पानी गेर दूं तो नशे का बिच्छू बाहर आ जाएगा।

बच्चा सदमे में था। सारंगी के बुझते हुए सुर सा पापा-पापा कर रहा था। अब से कुछ देर पहले तक बच्चे के साथ जो संवेदना दिख रही थी वह उड़ चुकी थी। पुलिसवाले ने ऐसे सैकड़ों शऱाबियों को निबटाने का वृत्तांत सुनाते हुए माहौल को हलका बना डाला था। बच्चा अब भी रो रहा था, उसे सुनने वाले कम हो गए थे। पुलिस वाले ने लुढ़के हुए शराबी के सिर पर थोड़ा सा पानी गिरा दिया मगर उसमें कोई हलचल नहीं हुई।

“अरे ये तो उठ ही ना रहा!”

फिर थोड़ा पानी और… लोगों ने उसे झकझोरना शुरू किया। सड़क किनारे वह धूल धूसरित पड़ा था। पूरे बदन में मिट्टी लगी थी, ऊपर से सिर पर पानी की धार पड़ी तो माथा कीच़ड़ से सन गया। अब धीरे-धीरे उसके बदन में हरकत होने लगी थी। लेकिन आंखें अब भी एक तिहाई ही खुली और खुली भी तो उसे कुछ समझ में नहीं आया।

लोग उसे लगातार झकझोर रहे थे, लेकिन नशा उस पर चढ़ बैठा था। पुलिस वाले ने हाथ हिलाकर एक ई रिक्शावाले को रोका।

” ओय रोक… इसे त्रिलोकपुरी छोड़ के आ..”

रिक्शावाला चुप खड़ा था। नज़र उसने ऐसी बनाई जैसी नाले से निकले कुत्ते को देखकर हो जाती हैं। मगर पुलिस वाले की बात भला कैसे टालता।

“अऱे उठा इसे”

कोई आगे बढ़ने को तैयार नहीं था। पुलिस वाले ने साथी शराबी की गिरेबां पकड़ी।

“उठाता क्यों नहीं इसको, दारू पिलाने तो साथ ले गया था। अब रास्ते में छोड़ कर फरार हो रहा है। चल बावड़ी के…!”

उसने शराब की लय में हिलते हाथ-पावों के साथ उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन बस हिला ही सका।

“अरे भाई जरा मदद. !”

भीड़ से कोई भी आगे आने को तैयार नहीं था। कुछ सफेदपोश रास्ता नापने लगे।

पुलिसवाले ने दुबारा कड़क आवाज़ में कहा, अरे उठा इसको। दो चार मजदूर जैसे लोग आगे आए। दो ने पांव पकड़ा और दो-तीन उसका हाथ पकड़ कर उठाने लगे।

शऱाबी आंखें खोल कर देखने लगा था। भूगोल देख रहा था, काल की गणना कर रहा था, अपनी स्थिति भी जानने की कोशिश में था पर कुछ समझ नहीं पा रहा था।

बेटे को तो शर्तिया ही न देख पा रहा था, न कुछ याद ही था उसे कि अब से कुछ देर पहले वह जिस लोक में विचर रहा था, उसी का एक रास्ता भुलावे के इस द्वार तक भी आता है।

शराबी को किसी तरह से ई रिक्शा में ठूंस दिया गया। उसे दो सीटों के बीच बिठाया गया। अब भी उसकी देह अपने बंधन में नहीं थी, इस मशक्कत के दौरान बेसुधी के कुछ बूंद शायद बह गए हों पर दिमाग से अब भी वह ठस्स पड़ा था।

दूसरा शऱाबी रिक्शा पर एक ओर बैठ गया, बेटे को दूसरी सीट पर बिठाया गया।

“इसे त्रिलोकपुरी छोड कर आ! इसका बेटा जानता है पता, क्यों तू जानता है न अपना घर?”

बेटे ने देखा, कुछ जवाब नहीं दिया। एक शऱाबी और एक अबोध बच्चे के बीच तीसरा शराबी पड़ा था किसी सांस लेती हुई गठरी की तरह। रिक्शावाला रुका हुआ था, हवलदार ने उसे जाने का इशारा किया, तभी भीड़ से एक आदमी सामने आया जो अब तक खामोशी से सब देख रहा था।

उसने रिक्शावाले के हाथ में सौ रुपये का नोट थमाते हुए कहा, इस बच्चे को महफूज घर पहुंचने के लिए सौ रुपये दे रहा हूं। आप ये निश्चित करना कि बच्चा ठीक से घर पहुंच जाए।

पिता की ओर इशारा करते हुए उसने कहा, इसके लिए तो घऱ और सड़क एक जैसे है। रिक्शावाले के चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई। उसने बैट्री में चाभी भरी। रिक्शा अपने रास्ते पर चल पड़ा।

महानगर स्थिर खड़ा रहा, पुलिसवाले अपनी मोटर साइकिल का हूटर बजाकर रवाना हो गए, क्या पता किसी दूसरे पड़ाव पर कोई और पड़ा मिल जाए…।

महाकवि निराला को प्रणाम : क्या यह मनुष्य की मेधा है!

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