मोदी जैसे दस-बीस हमें और चाहिए, पैदा करने होंगे तब ही बात बनेगी

मोदी जी पर एक बात और कहनी है।

2014 का चुनाव जीता जा चुका था। उसके कुछ समय बाद का एक, पत्रकारों से बात करने का उनका वीडियो ध्यान है। मुझे बहुत खोजने पर भी नहीं मिला। मैंने सुना है कि उन्होंने क्या कहा था।

और बात वही थी। चुनाव तो जीता जा चुका था, मंत्रालय आदि जैसे जैसे जिसको सम्हालना था, वो सब नॉर्मल बात रहता है। पर आगे क्या करना है।

ये बात तो मोदी जी को भी जीतने के बाद ही पता लगी होगी। किसी का नया जॉब लगता है तो उसको भी वर्कप्लेस की जगह समझने को टाइम तो लगता ही है। तब निर्णय कर पाता है कि करना क्या है। कंपनी के लिए फायदे के लिए निष्ठा से लगना है तो क्या क्या करना है।

उस वीडियो में जो उन्होंने कहा था, वो ये था कि – जितना मैंने सोचा था, स्थिति तो उससे कहीं ज्यादा बुरी तरह खराब है! इसे गौर से पढियेगा।

गुजरात में सीएम की तरह काम किया तो आर्थिक तौर पर उसे मज़बूती दी। केदारनाथ त्रासदी के समय भी वो लीडर के तौर पर ही अपने कदम ऑलरेडी बढ़ा रहे थे। पीएम बनेंगे या नहीं, उसकी चिंता उनको उस वक्त भी नहीं थी।

आर्थिक जगत के अनुभव और उसकी बात को समझकर, कि आर्थिक स्थिति के भेद से समस्या है, उसका निराकरण हुआ तो देश अलग दिशा में चल सकता है।

वीडियो में जो बात कही थी, वो पिछली सरकार के छोड़े बेहाल देश की कहानी थी।

हुआ क्या, निश्चित मन हो गया, विदेशी यात्राएं शुरू हो गईं, जो कि जनता के तो खास काम का बात नहीं होता पर एग्रीमेंट पर एग्रीमेंट साइन किये गए, बाहर से अच्छी चीज लाई गई।

बल्कि अभी ताजे भाषण में आनंद महिंद्रा के साथ बात में मछुवारों के लिए इनोवेशन का बात कर रहे थे, तो उनका अपना नया विचार नहीं था। वो जापान से मछुवारों के ऑलरेडी एक्जिस्ट कर रहे सफलता की कहानी थी, पर कर सकते हैं, वो कदम उठाना या उसकी बात करना भी बड़ी बात होती है।

उस वक्त लोग कह रहे थे ये बन्दा देश में कम, विदेश में ज्यादा रहता है, कैसा पीएम है। अब आराम से वही जनता सफलता के लड्डू खा रही है तो गरबलाये मन से ही सही, स्वीकार करती है कि देश की सीमाएं सुरक्षित हुई हैं, अंतरराष्ट्रीय पटल पर मान बढा है। नेचुरल एनर्जी की तरफ बढ़े हैं, धीमे धीमे ही सही, पर ठोस रूप से आगे बढ़े हैं।

2014 के वीडियो में वो बात थी। मोदी जी जिस काबिलियत को रखते हुए सीएम थे, उसी काबिलियत का और ज्यादा प्रयोग पीएम के रूप में किया।

अब प्रश्न आता है राममंदिर का।

पहले तो ये जान लेना चाहिए कि मोदी जी सफलता से काम कर रहे थे, तो मतलब कि कोई बाधा नहीं थी… भूल जाइए। समर्थक तो अपनी इच्छाओं की लिस्ट बढाकर उनको परेशान कर ही रहे थे, बुरा नहीं है, अपने को परेशान नहीं करेंगे तो किसको करेंगे।

पर विपक्ष हर तरह से रोड़े लगाता आया है। भावनात्मक तौर पर, कुटिलता से आर्थिक तौर पर, याद हो कॉपर का साउथ इंडिया में पर्यावरण के नाम पर खान से निकलवाना ही कोर्ट के जरिए बंद करवा दिया। कॉपर महंगी चीज है। इम्पोर्ट करना पड़ा और काफी महंगा पड़ता है।

फिर भी वो लगे रहे। आत्मविश्वास भरते रहे। आत्मविश्वासहीन जनता को मंदिर बनाकर दे भी दिया जाए तो वो उसे भी नहीं सम्हाल सकती। ये निश्चित है।

अभी जनता में विश्वास है तो उसका कारण मोदी जी का किया कार्य ही है। वरना एक मरे थके देश के नागरिक रूप में प्रतिष्ठा भारत की थी, ये कटु सत्य है। भारत में आपको पता न चले, पर विदेश में उसकी ठोककर गूंज सुनाई देती है। पहले तो गूंज छोड़िये, कोई बात तक नहीं करता था।

मंदिर अगर आत्म स्वाभिमान का केंद्र है, तो उसके लायक भी बनना पड़ता है। मोदी जी से अपेक्षा तो जो होगी सो होगी, यहां कुत्तों की तरह ही प्रतिष्ठित लोग संवाद के नाम पर लड़ते आएं हैं। दुर्भाग्य से कहना पड़ता है कि आप असल में मोदी के लायक ही नहीं हैं। मेरा निजी विचार है।

एक बात और जोड़ते चलूं, कईयों को विश्वास है मोदी जी देश को बचा लेंगे। दूर से ऐसी बुद्धियों को प्रणाम करते हुए कहूंगा, इस विचार से जितनी जल्दी दूर निकल जाएं, उतना बेहतर होगा।

ये विचार डाल लीजिये, कि मोदी जी जैसे दस-बीस हमें और चाहिए, हम पैदा करेंगे। तब तो बात बनेगी, वरना बहुत दुखी हो जाना पड़ेगा। संसार का सिस्टम अलग चलता है। भावनाओ का स्थान है, पर भावनाओ पर निर्णय नहीं होता रहा है।

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