खुद से करें ये सवाल, कि आखिर क्यों बनना है IAS, IPS, डॉक्टर या इंजीनियर

20 वर्षीय श्री मति ने परसों देर शाम अपने कमरे में फांसी लगा के आत्महत्या कर ली।

उसने सिर्फ 3 लाइन का एक छोटा सा सुसाइड नोट लिखा है, अपने parents और भाई के लिए… Sorry बोला है… लिखती है, ‘sorry… मुझसे नहीं होगा…’

20 साल की श्री मति, ईरोड – तमिलनाडु से ग्रेजुएशन करने के बाद civil services की तैयारी के लिए दिल्ली आयी थी और करोल बाग इलाके में एक किराए के कमरे में रहती थी…

उसे IAS बनना था…

क्यों IAS बनना है, ये तो उसे भी शायद पता न था… उससे किसी ने पूछा भी नहीं, बताया भी नहीं… श्री मति अकेली लड़की नहीं है जिसे IAS, IPS या Doctor, Engineer बनना है… ऐसी हज़ारों नहीं, लाखों नहीं… करोड़ों श्री मति हैं जिन्हें IAS, IPS, या डॉक्टर, इंजीनियर बनना है…

क्यों बनना है? कोई नहीं जानता।

IAS बनना है क्योंकि ये हिंदुस्तान की सबसे प्रतिष्ठित नौकरी है… IAS बनने से समाज में इज्जत बहुत बढ़ जाती है… Status… Recognition… Power… पैसा (हराम की कमाई)।

IAS बन के मैं समाज के लिए कुछ विशेष करूंगा, हज़ारों लोगों की ज़िंदगी बदल दूंगा… इस जज़्बे के साथ कितने लोग IAS बनते हैं?

आज कितने लोग Doctor बनना चाहते हैं सिर्फ मानवता की सेवा के लिए?

मूल उद्देश्य तो मोटा भारी भरकम पैसा कमाना और Status ही है… मानवता की सेवा तो profession में inbuilt है इसलिए हो जाती है थोड़ी बहुत…

समाज में मानवता की सेवा, या समाज को बदल के रख देना… इसके तो और भी बहुत से तरीके हैं।

ये काम तो बिना Doctor या बिना IAS बने भी हो सकते हैं…

कोई मानवता की सेवा करने को मरा जा रहा हो… ‘हाय अगर मुझे देश सेवा या समाज सेवा का मौका न मिला तो मैं मर जाऊंगा… जान दे दूंगा… हमसे इस दुनिया का दुख देखा नहीं जाता…’

‘अब हमारी जिनगी का एक्के मक़सद है… अपुन को समाज की सेवा करने का… अपुन को अक्खी मुम्बई के लोग का दुख दूर करने का… अपुन अगर अक्खी मुम्बई का दुख दूर नही किया न, तो माँ कसम अपुन जान दे देगा…’

ऐसा कहीं होता है क्या?

ये IAS, IPS, ये Doctor, Engineer… ये सब सिर्फ और सिर्फ status और power के symbols हैं… बेचारी 20 साल की श्री मति इस तथ्य और इस सत्य को समझने में चूक गयी…

काश कोई होता मेरे जैसा… जो बेचारी श्री मति को समझाता कि IAS और IPS बन के भी आदमी अजर अमर नहीं हो जाता… वो कोई इंद्र की माफ़िक़ देवता स्वर्ग लोक का राजा नहीं हो जाता…

काश कोई होता जो श्री मति को IAS मुकेश पांडेय, DM बक्सर की कहानी सुनाता जिसने गाज़ियाबाद में ट्रेन से कट के खुदकुशी कर ली, या फिर कानपुर के SP – IPS सुरेंद्र कुमार दास की कहानी सुनाता जिन्होंने ज़हर खा के जान दे दी…

ये दोनों लड़के, देश दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित Exam / नौकरी पा के भी कितने निरीह, लाचार, बेसहारा थे… कितने हताश, कितने निराश थे… इतनी powerful पोजीशन में होने के बावजूद ये दोनों अपने निजी जीवन में कितने कमज़ोर, कितने लाचार रहे होंगे…

क्या मनःस्थिति रही होगी मुकेश पांडे या सुरेंद्र दास की, जब उन्होंने जान देने का निर्णय लिया होगा… जब ज़हर की शीशी हाथ में उठायी होगी? दिलो दिमाग और शरीर से कितने कमज़ोर रहे होंगे ये दोनों… कि देश की सबसे पावरफुल पोजीशन और पोस्टिंग भी इन्हें ताक़त न दे पाई… ज़िंदा रह के परिस्थितियों से लड़ के उन्हें ठीक करने की ताक़त?

एक आदमी सारी ज़िंदगी एक झोपड़ी में रह के, आधा पेट नून भात खा के भी जीवन बिता देता है पर संघर्ष से नहीं भागता, उसी में सुख खोज लेता है, और एक आदमी DM / SP हो के भी इतना लाचार, इतना दुखी?

इसका मतलब जीवन का सार Power / Posting / Status में न हो के कहीं और है?

20 वर्षीय श्री मति, IAS मुकेश पांडेय और IPS सुरेंद्र कुमार दास की कहानी हर उस युवा को सुनाइये जो Civil services, या CPMT, NEET, या JEE की तैयारी में जुटा है…

खुद से ये सवाल करें, कि आखिर क्यों बनना है IAS या डॉक्टर इंजीनियर?

युद्ध दिलो दिमाग में जीते जाते हैं, ज़मीन पर तो लगी रहती है हार जीत

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