हे मी लॉर्ड! सहने और प्रतीक्षा की भी एक हद होती है!

जब शिवाजी राजे प्रतापगढ़ के दुर्ग से उतर रहे थे, मुझे इसकी बिल्कुल कल्पना नहीं थी कि वे ऐसा कर देंगे?

पर ज्यों ही अफज़ल खान ने उन्हें गले लगाकर, पीठ पर कटार मारी, एक क्षण पहले मासूम और डरे हुए से दिखने वाले राजे की शारीरिक लय ही बदल गई!

उन्होंने पलक झपकते ही उसकी अंतड़ियां खींच कर बाहर निकाल दी।

आँतें फट चुकी थीं, वे रक्त से सनी हुई, लाल रंग उगल रहीं थीं और उनमें गन्दगी के फव्वारे फूट रहे थे।

हम चार लोग सन्न रह गए!

क्या शिवाजी ऐसा भी कर सकते हैं?

एक बार तो हम भूल गए कि हमें करना क्या है?

हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां भयंकर रूप से आतंकित थीं! एड्रीनल हार्मोन के अतिरेक से वह दृश्य उस समय 100 गुना ज्यादा प्रभावी हो गया था।

नथुनों में रक्त और विसरा की गर्मी थी, तो कानों में अफज़ल की फटी आवाज़ में दिल दहलाने वाली चीख गूँज रही थी।

आँखें उस रक्तरंजित विशाल भैंसे की आतंकित मुद्रा से फ़टी की फटी रह गई।

जीभ बहुत कड़वी हो गई और पूरी त्वचा कांप रही थी!

अचानक पीछे खड़े दो अंगरक्षक राजे की ओर लपके और हमें अपनी भूमिका याद आयी। उन्हें निबटाकर हम फिर राजे की ओर लपके!

लगभग आधा पेट चीरा जा चुका था और वह भयंकर आवाज में ‘दगा दगा…!’, चिल्लाते हुए टैंट से बाहर भागा। उसकी फूली हुई अंतड़ियों का बड़ा सा गुब्बारा आगे लटक रहा था, जिसे उसने दोनों हाथों से थाम रखा था।

पीछे उसके दो धाराएं बह रही थी, जिनमें एक तो दस्त-पेशाब की और दूसरी रक्त की थी।

टैंट से निकलते ही सामने की ढलान पर वह लड़खड़ाया, फिर सम्भला और दो ही डग बढ़ाये थे कि राजे की फेंकी कटार उसकी खोपड़ी से लगी… साथ ही पगड़ी को उड़ा गई।

अफज़ल गिर गया।

लगभग 30 फुट की छलांग लगाते हुए शिवाजी उससे भी आगे जाकर खड़े हो गए।

जमीन पर लोटता अफज़ल तडप रहा था।

अंतड़ियां धूल में बिखर चुकी थीं।

सांस अभी अटकी थी।

दृश्य इतना वीभत्स था कि एक बार तो मेरी भी करुणा जाग उठी।

सामने पहाड़ी से निकलते सूर्य की किरणों से राजे का पसीना चमकने लगा।

उन्होंने हाथ उठाया, मैंने तलवार फेंकी जिसे उन्होंने क्षण भर में लपक ली और मिमियाते अफज़ल का सर काट दिया!

“हर हर महादेव!” नीचे घाटी में तुमुलनाद होने लगा।

मासूम, भले और सौम्य से दिखने वाले शिवाजी में इतना आक्रोश भरा है…!

मैं हतप्रभ था।

एक साथ, उनके मन में वे सभी क्षण जीवंत हो गए, जब उसने मां तुलजा भवानी का मंदिर भ्रष्ट किया, खड़ी फसलें जला दी, नगर श्मशान बना दिये, हिन्दू स्त्रियों का सतीत्व लूटा, शिशुओं को भालों से बींध दिया और रंभाती गायों को काटकर नदी में फेंक दिया था…!

गत 18 महीने से अफज़ल की सैकड़ों अत्याचारों की कहानियों से उपजे क्रोध के प्राकट्य का महोत्सव आज था!

वे यहीं नहीं रुके, कटे सिर को एक भरपूर ठोकर मारी, जिससे वह उछलकर शामियाने के द्वार पर आ गिरा।

जिसके नाम मात्र से जनता कांपती थी, उस अफज़ल का गंजा सिर उसी की बिखेरी गन्दगी में लोट रहा था।

उन्होंने उसे दाढ़ी पकड़ उठाया और ऊपर पहुँचकर जीजा माता के सामने फेंक दिया!

हे मी लॉर्ड! सहने और प्रतीक्षा की भी एक हद होती है!

हिसाब बराबर होगा… कालिका खप्पर भर कर रक्तपान करेगी

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