सबरीमला : अपनी मूर्खता व नालायकी का ठीकरा जनता के सर न फोड़िए मीलॉर्ड

कुछ महीनों पहले एक नगर के म्यूनिसिपल कमिशनर के साथ मीटिंग में जाना हुआ। मीटिंग का विषय था- waste to energy अर्थात कूड़े से बिजली उत्पादन।

वहाँ इस विषय से सम्बंधित अन्य सारे स्टेकहोल्डर मौजूद थें। जैसे के कूड़ा कचरा एकत्र करने वाली कम्पनी, शहरी विकास मंत्रालय से अधिकारी गण आदि।

म्यूनिसिपल कमिशनर ने कूड़ा कचरा एकत्र करने वाले कम्पनी के रेप्रेज़ेंटटिव से कहा कि मुख्यमंत्री साहब आने वाले हैं, ज़रा फलाने मंदिर परिसर में साफ़ सफ़ाई बेहतर रहे, ये ठीक से सुनिश्चित करना।

उस रेप्रेज़ेंटटिव ने कहा कि सर! सफ़ाई कर्मी लगाते हैं लेकिन दर्शनर्थियों की क़तार में वो साफ़ सफ़ाई नहीं कर पाता क्योंकि लोग डाँट के भागा देते हैं। वो किसी से छू गया तो लोग ग़ुस्सा हो जाते हैं। इसीलिए सफ़ाई कर्मियों ने हाथ खड़े कर दिए कि वहाँ सफ़ाई नहीं करेंगे। कोशिश कर रहे हैं लेकिन वहाँ की सफ़ाई की गारंटी नहीं है।

म्यूनिसिपल कमिशनर साहब बड़ी कोफ़्त हुई। उन्होंने मुँह बिचका कर शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारी की ओर देखते हुए बोला कि क्या सफ़ाई होगी, लोगों के दिमाग़ में भरा कचरा तो साफ़ हो! लोग छुआ छूत, घृणा से ही बाहर नहीं निकल पाएँ हैं। पुलिस लगा के बल पूर्वक कोशिश करें तो अलग उपद्रव हो! फिर चलने देते हैं जो चल रहा है! क्या करें!

प्रथम दृष्ट्या तो उनकी बात किसी को भी बड़ी वाजिब जान पड़ेगी! मंदिर के भीड़ में खड़ी जनता खलनायक ही लगेगी!

ये सब चल ही रहा था तभी मैंने उस कूड़ा कचरा वाली कम्पनी के रेप्रेज़ेंटटिव से कहा, “आप सफ़ाई कर्मी को पंडों वाला ड्रेस पहनाकर और चंदन टीका इत्र वगैरह लगा कर मंदिर परिसर में सफ़ाई के लिए जाने को क्यों नहीं बोलते?

ऐसे बहुत से मंदिर हैं जहाँ सफ़ाई कर्मी इसी प्रकार सफ़ाई करते हैं। क्या ये आवश्यक है कि सफ़ाई कर्मी मैला कुचैला गंदा दिखे! मैं मैनहोल से बाहर सफ़ाई करके निकलूँ और आप से आके लिपटूँ, क्या आप लिपट जाने देंगे?

अतः इस साधारण सी समस्या को छुआ छूत मानकर उसे जटिल बना देना उचित नहीं! बल्कि ये समस्या हाईजिन की है। सफ़ाई कर्मी को पंडे की ड्रेस में भेजिए, कोई मना नहीं करने वाला, बिना किसी पुलिस फ़ोर्स के लोग ख़ुशी ख़ुशी सहयोग करेंगे!”

ये बात शहरी विकास मंत्रालय से आए अधिकारी को पसंद आ गई, उन्होंने उस कम्पनी के रेप्रेज़ेंटटिव से बोला कि भाई, इनके सुझाव को नोट करो और इसे अमल में लाओ! ये मुझे ठीक लगा! बाद में पता चला कि ये नुस्ख़ा काम कर गया।

किसी समस्या का समाधान इस बात पर निर्भर करता है कि आपने उस समस्या को समझा कितना है। यदि आपने उस समस्या को नहीं समझा है या ग़लत समझा है तो समाधान तो दूर बल्कि आप ख़ुद और बड़ी समस्या बनने जा रहे हैं।

सबरीमला केस भी कुछ अलग नहीं है! सुप्रीम कोर्ट के जज तो बन गये लेकिन बेचारे नहीं जानते कि सबरीमला क्या है, यहाँ महिलाओं का प्रवेश क्यों वर्जित हैं? उन्हें नहीं पता कि ऐसे भी मंदिर हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश भी वर्जित हैं!

उन्हें नहीं पता कि भारतीय संस्कृति ही इकलौती संस्कृति है जहाँ सिर्फ़ देवता ही नहीं बल्कि अनेक देवियों की भी पूजा होती है। अतः लैंगिक भेदभाव का प्रश्न ही नहीं!

उन्हें कोई कैसे समझाए कि जैसे महिलाओं के लिए आरक्षित कोच में पुरुषों का चढ़ना माना होना लैंगिक भेदभाव नहीं है! ठीक वैसे ही 12 वर्ष से ऊपर व 40 वर्ष से नीचे की महिलाओं का सबरीमला मंदिर में प्रवेश वर्जित है! बाक़ी बच्चियाँ व बूढ़ी महिलाएँ जा सकती हैं! ये किसी भी प्रकार से लैंगिक भेदभाव नहीं है और न ही संविधान की मूल भावना के ख़िलाफ़ है!

लेकिन ये चूँकि जज साहब ने भारत और भारतीय संस्कृति को चारण भाटों द्वारा लिखी गई चंद पुस्तकों से ही समझा है, उनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है, इसीलिए एक सामान्य सी समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है।

ज़रा सोचिए कि बिना किसी बात के कोर्ट ने अपना और सबका कितना बहुमूल्य समय और धन इसपर नष्ट किया है! पूरी पुलिस फ़ोर्स लग गई है इसमें!

ज़रा सोचिए कि यदि इसी प्रकार कहीं उस दिन म्यूनिसिपल कमिशनर साहब का भी दिमाग़ ख़राब हो जाता और वो भी उपरोक्त समस्या को संविधान की अवहेलना मानते हुये पुलिस लगाकर क़तारबद्ध दर्शनर्थियों की कुटाई करवा देते, तो सफ़ाई कितनी होती पता नहीं… लेकिन ये एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया होता… वो भी बिना किसी बात के! और कमिशनर साहब अपनी मूर्खता व नालायकी का ठीकरा जनता के सर फोड़ देते।

ये दुर्भाग्य ही है कि हमारे देश में व्यवस्था में बहुतेरे पदासीन हो जाते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि भारत की संस्कृति क्या है? भारत के लोग कैसे सोचते हैं, नहीं पता! लोगों की भावनाएँ नहीं पता! बल्कि इस देश को बहुत ही जाहिल व असभ्य रूप में देखते हुए आगे बढ़ते हैं।

नौकरशाही हो या जज हों, प्रवेश परीक्षा से लेकर ट्रेनिंग तक यही सीखकर बड़े होते हैं। वामपंथियों द्वारा बनाया हुआ पूरा एक सेलेबस है जिसकी घुट्टी लेने के बाद ही इस व्यवस्था में प्रवेश मिलता है!

हालाँकि ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो ख़ुद को इस दूषित विचार से बचा ले जाते हैं, लेकिन संख्या कम है!

और एक बार जो घुट्टी लेली और वो चढ़ गई तो उसके बाद उन्हें देश में केवल समस्या ही समस्या दिखती है। पूरा देश ही एक समस्या दिखता है! उन्हें वो भी समस्या दिखती है जो अस्तित्व में भी नहीं है, लेकिन समाधान एक पैसे का नहीं दिखता और इस प्रकार वो ख़ुद एक बड़ी समस्या बन जाते हैं!

और वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या यही है!

समानता पर बात निकलेगी तो बहुत दूर तक चली जाएगी

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