भारत की संप्रभुता व अखंडता का रक्षा कवच हैं मोदी सरकार की चीन केंद्रित नीतियां

मेरे साथ यह अक्सर होता है कि जब मैं किसी विषय पर मनोयोग से लिखने बैठता हूँ तो लेख की धारा बीच में ही बदल जाती है। मूल तो वो ही रहता है लेकिन अपने अवलोकन को और स्पष्टता देने में, पृष्ठभूमि को विस्तार मिलता चला जाता है। मेरा यह मूल लेख न होकर, उसकी पृष्ठभूमि है, जो अपने मूल से भी बड़ा हो गया है।

मैं नरेंद्र मोदी की विदेश, रक्षा व सुरक्षा नीति का प्रशंसक हूँ और मेरा यह दृढ़तापूर्वक मानना है कि भारत की संप्रभुता व अखंडता के लिये, आज के भारत के लिये यह तीनों नीतियां प्राथमिक है।

नरेंद्र मोदी से पूर्व या तो किसी भी भारत के प्रधानमंत्री ने समझा नहीं था या फिर समझ कर भी उसको प्राथमिकता में रखना, उनके स्वार्थहित में नहीं था।

यह एक विडंबना ही है कि जो राष्ट्र 15 अगस्त 1947 को रक्तिम बंटवारे से उदय हुआ और जिसने अपनी उत्पत्ति के तीसरे ही महीने में, पाकिस्तान द्वारा किये आक्रमण को झेला व उसके परिणाम स्वरूप कश्मीर का एक बड़ा भूभाग गंवा दिया, उसके प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र की रक्षा सुरक्षा को न सिर्फ अनावश्यक बोझ समझा बल्कि उसमे लगे तंत्र का तिरस्कार भी किया था।

अपनी गुटनिरपेक्षता की विदेश नीति व धर्मनिरपेक्षता की कपोलकल्पित विचारधारा के आधार पर नेहरू की वैश्विक रूप से शांतिदूत स्थापित होने की अदम्य इच्छा ने उन्हें अयथार्थवादी और नकारा बना दिया था।

उनकी इसी करनी का परिणाम था कि 1951 से ही चीन से लगातार संकेत मिलने के बाद भी, नेहरू ने चीन के साथ लगी सीमा पर कोई भी रक्षा व सुरक्षा तंत्र को स्थापित नहीं किया था।

इसके परिणामस्वरूप भारत को 1962 में चीन के हाथों शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा और साथ में जम्मू कश्मीर के अक्साई चिन क्षेत्र में भारत को 32 हज़ार वर्ग किलोमीटर की भूमि गंवानी पड़ी थी।

यहां एक बात महत्वपूर्ण है कि 1963 में पाकिस्तान ने, भारत के कश्मीर का जो भूभाग 1947 में अनाधिकृत रूप से कब्जा किया था, उसका एक भाग चीन को देने के बाद भी, भारत ने चीन केंद्रित कोई भी नीति नही बनाई थी।

नेहरू के मरने के बाद भी जो भी प्रधानमंत्री आये, उनके लिये पाकिस्तान ही महत्वपूर्ण रहा। शास्त्री जी का तो अल्पकाल था लेकिन इंदिरा गांधी का कार्यकाल 1967 से लेकर, जनता पार्टी के बीच के 2 वर्षो को छोड़ कर 1984 तक रहा था।

उस पूरे समयकाल में भारत की विदेश नीति भले ही गुटनिरपेक्षता की रही हो लेकिन उस पर वामपंथियों का प्रत्यक्ष प्रभाव बढ़ता रहा था (इंडियन फॉरेन सर्विसेज़ के अधिकारी इससे ग्रसित है) और इसका परिणाम यह हुआ कि इंदिरा गांधी तक, चीन के साथ सम्बंध को लेकर क्षमायाचक की भूमिका में ही खड़ी पायी गयी हैं। उनके पूरे कार्यकाल में भारत में वामपंथी शिक्षण संस्थान से लेकर संस्कृति में मज़बूत होते रहे और भारत चीन से नज़र मिलाने में डरता रहा है।

1977 में जब जनता पार्टी आयी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री व अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने तब एक आशा बनी थी कि कुछ बदलाव होगा, लेकिन वो विचारधाराओं की खिचड़ी सरकार थी। उसमे एक तरफ दक्षिणपंथी जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी व उसके पूंजीवाद के करीब दिखते स्वयं प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे, वही दूसरी तरफ वामपंथ के निकट खड़े दिखते समाजवादी थे। इस सब में एक अपवाद जनसंघ के सुब्रमण्यम स्वामी थे जो चीन समर्थक थे।

चीन के संदर्भ में जनता पार्टी की एक उपलब्धि यह थी कि उस वक्त के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन का दौरा किया था और यह 1962 के युद्ध के बाद किसी भारतीय विदेश मंत्री की पहली यात्रा थी।

वाजपेयी की चीन यात्रा तो लोगों को खूब याद होगी लेकिन यह बिरले ही लोगों को याद होगा कि वाजपेयी को अपनी यह चीन यात्रा बीच में छोड़ कर वापस भारत भागना पड़ा था। बीच में यात्रा रद्द करने का कारण यह था कि उनकी यात्रा के दौरान ही चीन ने वियतनाम पर आक्रमण कर दिया था। इस घटना पर उनकी काफी आलोचना भी हुई थी लेकिन वे सुब्रमण्यम स्वामी के प्रभाव में चीन चले गये थे।

इस घटना को बताना इस लिये आवश्यक था ताकि लोग चीन की मानसिकता को समझ सकें। वैश्विक कूटनीति जगत में किसी भी विदेश मंत्री की यात्रा पूर्व में तय होती है और दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करने का भी निर्णय पहले से ही तय होती है। लेकिन चीन ने भारत के विदेश मंत्री का उस वक्त आने का स्वागत किया जब वह स्वयं दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करने जा रहा था। यह भारत के लिये संकेत था कि चीन, अपने सम्बंध भारत के साथ, किस श्रेणी में रखता है या उसको कितना महत्व देता है!

जनता पार्टी की सरकार के बाद 1980 में इंदिरा गांधी जब फिर से भारत की प्रधानमंत्री बनी तब तक विश्व 70 के दशक से बदल गया था। अफगानिस्तान में सोवियत रूस आ चुका था और रोनाल्ड रीगन के अमेरिका ने, पाकिस्तान की सहायता से अफगानिस्तान को युद्धभूमि बना दिया था।

यह वही समय था जब पाकिस्तान समर्थित खालिस्तान रक्तमय आंदोलन अपने रक्तिम ज्वार पर था। उस वक्त भारत तटस्थ होते हुये भी, सोवियत रूस के साथ खड़ा था और ऐसे में चीन से किसी भी विशेष ऊष्मता की आशा भी नही थी।

लेकिन फिर भी, अपने जीवन काल के अंतिम दिनों इंदिरा गांधी ने चीन से विवाद को सुलझाने की अनाधिकारिक कोशिश की थी। उन्होंने इस काम के लिये अपने विश्वसनीय, रॉ के भूतपूर्व निदेशक रामनाथ काओ को चीन भेजा था और जिस दिन इंदिरा की हत्या हुई थी, वो बीजिंग, चीन में ही थे।

उसके बाद 1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। उन्होंने विरासत में मिली अपनी मां की विदेश नीति व रक्षा नीति का अनुसरण किया, हालांकि 80 के दशक के मध्य का विश्व इंदिरा गांधी के समय से बदल गया था।

सोवियत रूस की सत्ता के शीर्ष में अस्थिरता आ गयी थी। वहां कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी लियोनिद ब्रेझनेव, जो भारत व इंदिरा गांधी समर्थक थे, का 1982 में निधन हो गया था और अगले 3 सालो में उनके दो जनरल सेक्रेटरी यूरी अन्द्रपॉव और चेरेनेन्को का भी निधन हो गया और अब वहां पर 1985 में मिखाइल गोर्बाचेव का पदार्पण हो गया था।

गोर्बाचेव मूलतः ब्रेझनेव की अफगान नीति व चीनी नीति के विरुद्ध थे। उन्होंने सोवियत रूस की कमजोर होती आर्थिक स्थिति व सामाजिक विसंगतियों को समझते हुये ‘ग्लासनोस्त’ (glasnost-खुलापन) और ‘पेरेस्त्रोइका'(perestroika-नवीनीकरण) को अपनी नीति का आधार बनाया था।

सोवियत रूस में हुये नये बदलाव और उससे बदलने वाले विश्व को लेकर भारत न तो तैयार था, और न ही राजीव गांधी का राजनैतिक नेतृत्व, इसको समझने में सक्षम था। तब तक भारत, चीन को लेकर पूरी तरह सोवियत रूस पर ही निर्भर था।

राजीव गांधी ने 1988 में चीन का ऐतिहासिक दौरा किया और वे 26 वर्षो में पहले भारत के प्रधानमंत्री थे जो चीन गये थे। भारत में राजीव गांधी के काल को भारत चीन के संबंधों के बीच एक नए युग का आरंभ के रुप में प्रचारित किया जाता है, लेकिन यह अर्धसत्य है।

गोर्बाचेव जो स्वयं सोवियत रूस के चीन के साथ संबंधों को ठीक कर रहे थे, उन्होंने राजीव गांधी को सलाह दी कि वे चीन को लेकर अपने पैरों पर खड़े हों और खुद ही चीन से, डेंग ज़िओपिंग (Deng Xiaoping) के जिंदा रहते, भारत का विवाद सुलझायें।

इसी के बाद राजीव गांधी चीन से नई शुरुआत करने गये थे। राजीव गांधी का भारत, 1986 में गोर्बाचेव के भारत दौरे के अंत में, उनके द्वारा पाकिस्तान व चीन को लेकर विवाद पर, भारत के समर्थन में कुछ भी कहने से इनकार कर देने को भी नहीं समझ पाया था।

1988 में जब राजनैतिक व वैश्विक राजनीति में अपरिपक्व राजीव गांधी चीन गये थे तब चीन के सर्वमान्य नेता, वयोवृद्ध डेंग ज़िओपिंग थे, जो न चीन के राष्ट्रपति थे और न ही वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी ही थे लेकिन चेयरमैन ऑफ द सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के हैसियत से वे सर्वशक्तिमान थे।

उनको माओ के समकक्ष ही माना जाता था। उन्होंने ही बाज़ार आधारित आर्थिक नीति का समागम चीन के वामपंथ से कराया था। डेंग का चीन में बड़ा मान था लेकिन भविष्य, चीन की सामूहिक नेतृत्व की नीति के अनुसार, प्रधानमंत्री ली पेंग व कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी जहाओ जियांग के हाथ था।

राजीव गांधी व डेंग की 45 मिनिट की मुलाकात और चीन के प्रधानमंत्री ली पेंग का राजीव गांधी से अलग से यह कहना कि यात्रा सफल है, को बड़ा महत्व दिया गया। लेकिन उस समय यह बात नहीं बताई गई कि चीन की सेना का नेतृत्व, भारत से सीमा को लेकर कोई समझौता करने के विरुद्ध था।

राजीव की चीन यात्रा से जो भी आशा थी वो ज़मीन पर कभी भी सामने नहीं आई क्योंकि उसके बाद राजीव गांधी विवादों में फंस कर 1989 में चुनाव हार गये थे।

उसके बाद भारत में एक राजनैतिक अस्थिरता का युग आया जिसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने लेकिन उनकी प्रथम व अंतिम प्राथमिकता, भारत न हो कर स्वयं के अस्तित्व की थी।

भारत में 1991 से 1996 तक पी नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्रित्व का वह काल आया, जिसमें पहली बार, भारत के राजनैतिक नेतृत्व ने विश्व में बदल गये आर्थिक व सामरिक संतुलन को स्वीकार किया। भारत जिस के विश्वास पर वैश्विक राजनीति में साझेदारी कर रहा था, वह सोवियत रूस समाप्त होकर 15 राष्ट्रों में विखंडित हो चुका था।

नरसिम्हाराव ने भारतीय अर्थव्यवस्था को खोला और नये शक्ति संतुलन में अपनी जगह तलाशने की कोशिश की थी। उन्होंने जब 1993 में चीन की यात्रा की थी उस वक्त चीन की अर्थव्यवस्था ने ज़ोर पकड़ना शुरू कर दिया था।

1988 में जब राजीव गांधी चीन गये थे, उस वक्त समाजवादी भारत और वामपंथी चीन की आर्थिक विकास की दर एक ही थी। लेकिन उसके 5 वर्षो के बाद जब नरसिम्हाराव चीन गये थे तब तक भारत नीचे की तरफ जा रहा था और चीन ऊपर की तरफ बढ़ रहा था।

यह वह 5 वर्ष का काल था जब भारत ने खुले बाज़ार की आर्थिक नीति को आधार बना कर, स्वावलंबी बनने की शुरुआत थी लेकिन चीन केंद्रित नीति कहीं भी परिदृश्य में नहीं थी।

उसके बाद का काल एच डी देवगौड़ा व इंद्र कुमार गुजराल के प्रधानमंत्रित्व का था और यह दोनों दुर्घटना थे। इनके काल में भारत की सुरक्षा नीति, राष्ट्र की प्राथमिकता ही नहीं थी। देवगौड़ा को इससे मतलब नहीं था और गुजराल, पाकिस्तान के ही प्रवक्ता थे।

इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्रित्व काल आया और पहली बार भारत चीन के बीच संबंधों में, भारत कुछ शक्ति के साथ बात करने में समर्थ हो पाया था। यह सामर्थ्य, अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा, वैश्विक मत के विरुद्ध जाकर, परमाणु बम का परीक्षण करने से मिला था।

इस परीक्षण का विरोध जहां विश्व में शक्तिशाली राष्ट्रों ने किया था वहीं भारत में इसका विरोध, कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने किया था। वाजपेयी ने जहां एक तरफ चीन से विवादों को सुलझाने के लिये वार्ता का क्रम बनाये रखा, वहीं साथ में उन्होंने स्वतंत्रता के बाद पहली बार, चीन से भारत की सुरक्षा के दृष्टिकोण से, लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक, आधारभूत संरचनाओं को खड़ा करने वाली परियोजनाओं को मूर्तरूप देना शुरू किया था।

लेकिन फिर भी, अटल बिहारी वाजपेयी की नीति भी पाकिस्तान ही केंद्रित थे। वैसे कूटनीति जगत के विश्लेषकों का मानना है कि वाजपेयी की 2003 की चीन यात्रा के दौरान यह माना जाने लगा था कि चीन से ले दे कर विवाद का अंत हो जायेगा लेकिन 2004 में वाजपेयी चुनाव ही हार गये।

यह वह काल था जब चीन वो नहीं था जो आज बन गया है। उस काल में चीन आर्थिक उन्नति की दौड़ में शामिल हो गया था और पाकिस्तान भी पूरी तरह, अफगानिस्तान के कारण अमेरिका से शरण पाये हुआ था।

इसके बाद तो भारत का 10 वर्ष का काला अध्याय आया जब 2004 से लेकर 16 मई 2014 तक, भारत पर अनाधिकारिक व असंवैधानिक रूप से सोनिया गांधी ने नेशनल एडिवायज़री काउंसिल की अध्यक्षा की धारिता में, मनोनीत किये गये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के द्वारा परोक्ष रूप से शासन किया था। इस पूरे काल भारत की रक्षा व सुरक्षा नीति से चीन को नेपथ्य में धकेल दिया गया व चीन समर्थकों को राजनैतिक प्रश्रय दिया गया।

इन 10 वर्षो में, चीन जहां आर्थिक व वैश्विक शक्ति के रुप से बहुत आगे निकल गया, वहीं भारत पिछड़ते हुये, चीन के समक्ष एक खोखला राष्ट्र बनकर रह गया था। इस काल में पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा शुरू की गयी आर्थिक विकास व सुरक्षा के दृष्टिगत आधारभूत संरचनाओं की परियोजनाओं को या तो लंबित कर दिया गया या फिर बन्द कर दिया गया था।

इस नीतिगत दरिद्रता व पिछले 7 दशकों की जड़ता का अंत 26 मई 2014 को हुआ जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने। मोदी सरकार ने पहले ही दिन से भारत की विदेश, रक्षा व सुरक्षा नीति में मूलभूत बदलाव करते हुये उसे चीन केंद्रित कर दिया। ऐसा करके स्वतंत्रता के बाद पहली बार भारत ने चीन को अपनी संप्रभुता व अखंडता के लिये आशंका के रूप में स्वीकार किया गया है।

मेरे लिये यही एक कारण, बहुत बड़ा कारण है, जिसके लिये नरेंद्र मोदी को 2019 में फिर से भारत की विदेश, रक्षा व सुरक्षा की नीतियों को बढ़ाने व स्थायित्व प्रदान करने के लिये, प्रधानमंत्री बनाना है।

अरुणाचल प्रदेश : चीन का दावा और भारत का कूटनीतिक दांव किरेन रिजिजू

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