पांडव स्वर्गारोहण

महाभारत युद्ध के पश्चात वेदव्यासजी की आज्ञा से पांचो पांडव द्रौपदी सहित स्वर्गारोहण हेतु हिमालय की और प्रस्थान करते हैं। मार्ग में पांचाली की सबसे पहले मृत्यु होती है फिर क्रम से सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आइये इस कथा के पीछे के दर्शन को समझने का प्रयास करें।

पांचाली की उत्पत्ति यज्ञवेदी से पंचभूतों के संघात से हुई थी, जैसे सृष्टि के समस्त पदार्थ पंचभूतों (तत्वों) से उत्पन्न होते हैं। प्रलय काल में सबसे पहले सृष्टि के पंच तत्व निर्मित पार्थिव पदार्थ (पांचाली) ही विलीन होते हैं।

फिर सहदेव जो अश्विनकुमार में से एक दस्त्र के अंश से उत्पन्न हुए थे वे मृत्यु को प्राप्त हुए। दस्त्र पृथ्वी तत्व के अभिमानी देवता हैं। प्रलय काल में पदार्थों के बाद पृथ्वी तत्व ही विलीन होता है।

फिर नकुल मृत्यु को प्राप्त हुए जो जल तत्व के अभिमानी देवता असत्यक (अश्विन कुमार) के अंश से उत्पन्न हुए थे, प्रलय में भी पृथ्वी तत्व के बाद जल तत्व विलीन होता है।

फिर अर्जुन की मृत्यु होती है जो तेज और विद्युत के अभिमानी देवता इंद्र के अंश से उत्पन्न हुए थे। प्रलयकाल में जल तत्व के बाद तेज का लोप होता है।

फिर भीम भी मृत्यु को प्राप्त हुए जो वायु अंश से उत्पन्न हुए थे। प्रलय दशा में तेज के बाद वायु तत्व का लोप होता है।

धर्मराज युधिष्ठिर धर्म के अंश से उत्पन्न हुए थे। धर्म धारण करता है आकाश तत्व भी सृष्टि को धारण करता है। वे कृत्रिम नर्क के दर्शन कर सदेह स्वर्ग पहुँचे किन्तु मृत्युलोक का शरीर स्वर्ग के सुखों को भोगने की क्षमता नहीं रखता अतः मंदाकिनी (प्रकृति) में स्नान कर इह लोक का शरीर त्याग दिव्य शरीर प्राप्त कर स्वर्ग में प्रवेश करते है। प्रलय काल में सबसे अंत में आकाश तत्व भी आदि प्रकृति में विलीन हो जाता है।

पांचाली की तादात्म्यता अर्जुन से विशेष प्रेम करने से आनन्दमय कोष में हो गई थी अतः वह मृत्यु को प्राप्त हुई।

सहदेव की तादात्म्यता अपनी सुंदरता को ले कर अन्नमय कोष से हो गई थी अतः वे भी मृत्यु को प्राप्त हुए।

नकुल की तादात्म्यता अपनी विद्या को ले कर ज्ञानमय कोष से हो गई थी अतः वे मृत्यु को प्राप्त हुए।

अर्जुन की तादात्म्यता अपनी प्रतिज्ञाओं के कारण मनोमय कोष से हो गई थी अतः वे भी मृत्यु को प्राप्त हुए।

भीम की तदात्म्यता अपने बल को लेकर प्राणमय कोष से हो गई थी अतः वे भी मृत्यु से न बच सके।

मित्रों श्रुति कहती है-
प्रमादोवयम मृत्युः ।
प्रमाद ही मृत्यु है ।

स्थूलशरीर (अन्नमय कोष), प्राणमयकोष, मनोमय कोष, ज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष इन पांच शरीरों से मिल कर मानव शरीर बनता है, इनमें से किसी भी एक या अधिक शरीर से तादात्म्य बना लेना ही प्रमाद है। अब यदि प्रमाद है तो मृत्यु तो अवश्यम्भावी है।

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