तो सचिन विराट हो जाते…

मैं जानता हूं इस शीर्षक को पढ़कर कई सचिन प्रेमी लट्ठ लेकर मेरी तलाश में निकल पड़े होंगे। लेकिन क्या करूं समय बहुत आगे निकल चुका है।

एक वक्त ऐसा भी था जब सचिन के आउट होने पर खाना मेरे हलक से नीचे नहीं उतरता था।

सचिन ने जीत के हर्ष से कहीं अधिक हार की विषण्णता हमें दी है। भले ही वे व्यक्तिगत प्रतिभा में बहुत आगे रहे हों पर पिच पर उनका शौर्य बहुत बिखरा हुआ है।

सचिन और विराट की तुलना में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि सचिन ने दुनिया ने तमाम सूरमा गेंदबाजों को झेला। बल्कि यूं कहिए कि उनके छक्के छुड़ा दिये (जो कि अपने मुंह मियां मिट्ठू होने से अधिक नहीं) जबकि विराट कोहली तो बस देवांशु झा टाइप गेंदबाजों को मार रहे हैं। अब कोई गेंदबाज कहां होता है..!

मुझे याद है, एक समय सचिन ब्रैडमेन भी बन ही गए थे। तुलना करने वालों के चरण धरने को मैं तब भी व्याकुल था, आज भी हूं। यहां भी तर्क यह कि सचिन ने तो धुरंधरों को खेला और ब्रैडमेन तो अंडर आर्म और पिच पर ऐसे ही गेंद घड़का देने वालों गेंदबाजों को मार मार कर अमर हो गए।

दिलचस्प यह कि उतने ही फुद्दू गेंदबाजों को खेलते हुए उनका कोई समकालीन उनके आसपास तो क्या… मीलों दूर तक नहीं दीखता।

ब्रैडमैन एक किंवदंती हैं। उनके 29 शतकों में दैत्याकार शतकों का अंबार है। बारह दोहरे और दो तिहरे शतक। अपनी अंतिम पारी में वे चार रन से चूक गए… चार रन और जोड़े होते तो औसत सौ का होता। बुद्धि की बलिहारी यह कि उनसे आधे औसत पर खड़े लोगों की तुलना होने लगी।

एक वक्त जब सहवाग तीसरा तिहरा शतक जड़ने के मुहाने पर थे, तब भारत में उन्हें भी ब्रैडमैन घोषित कर ही दिया गया था। गोया, ब्रैडमेन कोई पावरोटी बेचने वाला हो। हुंह एक हुआ… दूसरा न होगा !! आंकलन करते हुए कभी उसका लाघव और प्राबल्य देखा क्या..?

कुछ ऐसा ही विराट कोहली के साथ हो रहा है। विराट की निरंतरता, पौरुष, संतुलन और युद्धकौशल अद्वितीय महारथी सरीखा है। मैं पूछना चाहता हूं कि जब दुनिया से महान गेंदबाजों की खेप चुक ही गई तो सभी विराट क्यों नहीं हो जाते..? क्यों नहीं विराट जैसे अविश्वसनीय औसत के साथ सभी रन बना रहे? क्यों नहीं शतकों का अंबार लगा रहे, क्यों नहीं जीत के प्रति हमें विराट की ही तरह आश्वस्त कर रहे?

रोहित शर्मा में प्रतिभा कूट कूट कर भरी हुई है लेकिन मैदान पर कार्यान्वयन कैसा है… या दुनिया का कोई दूसरा बल्लेबाज़ खोजकर ला दीजिए, जिसमें विराट जैसी निरंतरता हो। वह तो रोबो है, जिसकी प्रोग्रामिंग कर दी गई है। कोई आसपास है ही नहीं।

सचिन अपने जीवन में विराट जैसा विश्वास तो कभी भर ही नहीं सके। उन्हें देखकर हम कभी यह संतोष न कर सके कि अब तो बेड़ा पार लगने ही वाला है क्योंकि शतक जमाने के साथ-साथ नौका डुबोने में भी उनका सानी नहीं था। पता चला कि सचिन के स्ट्रेट ड्राइव का सौन्दर्य देखकर अभी ताली बजा ही रहे थे कि अगली गेंद पर वे गली में गुम हो गए। सचिन के पास महान प्रतिभा थी। तूणीर में आग्नेयास्त्र से लेकर ब्रह्मास्त्र तक थे लेकिन शरक्षेप और निर्णायक रण वे उनका संधान न कर पाते थे।

अर्जुन और कर्ण महान धनुर्धर थे। दोनों की धनुर्विद्या का परिचय पाकर लोग वाह-वाह कर उठते थे पर दोनों महान योद्धा भी थे। रण में उतरते तो पराजय की छाया भी नहीं पड़ने देते। सचिन का निजी आवरण तो घना है लेकिन अपराजेय शूर का आलोक नहीं है। वे कभी भी बल्ला सौंप सकते थे। विराट में वो पौरुष है, भले ही सचिन के बल्ले से निकलने वाले शॉट्स सा सौन्दर्य ना हो।

अब गेंदबाजों के मिथक पर आते हैं। यह एक विशुद्ध छायावाद है कि सचिन ने धुरंधर गेंदबाजों की बखिया उधेड़ दी। सबसे पहले पाकिस्तान। सचिन का डेब्यू 89 का है और 89 के बाद 99 तक भारत-पाक में कोई टेस्ट सीरीज नहीं हुई। दस वर्ष! ये वो दस वर्ष हैं जब दुनिया भर के पिचों पर वसीम अकरम और वकार यूनुस की पदचाप सुनाई देती थी। सचिन ने इन दोनों को उनके यौवन के उफान पर झेला ही नहीं। इसके बावजूद टेस्ट में सचिन महान का पाकिस्तान के खिलाफ 37 का औसत है।

हैरत तो यह कि अब तक हमारे प्रशंसक विश्वकप में शोएब अख्तर की गेंद पर एक छक्के से छूट ही नहीं पा रहे जबकि विराट कोहली ने पाकिस्तान के सभी गेंदबाजों की खबर ली है और लंबी-लंबी पारियां खेली हैं। यकीन ना हो तो पाकिस्तानियों से पूछ कर देख लो कि विराट और सचिन में किसे पवेलियन भेजना पहले पसंद करोगे..

सचिन ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ उत्कृष्ट प्रदर्शन किया लेकिन उनके खाते में एक भी श्रृंखला ऐसी नहीं है, जिसमें उनका बल्ला शुरू से आखिर तक बोला हो। अपने करियर में उन्होंने एक सीरीज़ में सर्वाधिक 495 रन बनाए हैं। तीन शतक।

दुनिया के धुरंधर टेस्ट बल्लेबाजों का आंकड़ा उठा कर देख लीजिए.. ब्रैडमैन से लेकर गावस्कर, लारा, पोन्टिंग…। इन सबों ने एक एक श्रृंखला में छह सौ… सात सौ, आठ सौ रन तक बनाए हैं। मारमार के भुस भर दिया है। लंबी लंबी पारियों के पर्वत खड़े कर दिये हैं। मगर सचिन के हिस्से में यह नहीं है।

वन डे में उनका सबसे तेज़ सैकड़ा ज़िम्बाब्वे के खिलाफ है। हेनरी ओलंगा जैसे गरीब गेंदबाज के खिलाफ 70 गेंदों में शतक बनाया है उन्होंने। हालांकि, मैं यह कह कर उनके साथ अन्याय नहीं कर सकता कि उन्हें मारना नहीं आता था। दर्जनों पारियों में वे बीस-बीस गेंदें कम खेलकर शतक पूरा करते रहे।

और यह गेंदबाजी का मिथक ही बेकार है। मैं कह सकता हूं कि गावस्कर ने दुनिया के सबसे महान गेंदबाजों को खेला। सचिन के दौर में मार्शल, होल्डिंग, क्राफ्ट, एंडी रॉबर्ट्स, गार्नर, लिली, थामसन नहीं थे। वेस्ट इंडीज के वॉल्श और एम्ब्रोज़ को सचिन ने खेला लेकिन बहुत कम। दोनों सचिन के शिखर काल में अपनी ढलान पर थे और रिटायर हो गए। दक्षिण अफ्रीका में डोनाल्ड को उन्होंने कभी डोमिनेट नहीं किया। औसत देख लीजिए। जब इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ रन बनाए तब कुछ अच्छे गेंदबाज थे।

अगर दुनिया के श्रेष्ठ बल्लेबाज़ का तमगा पाया है तो श्रेष्ठ को झेलना भी होगा। पाकिस्तान के तेज गेंदबाजों को तो छोड़िए वे सकलैन मुश्ताक को भी कभी उस तरह से नहीं पढ़ सके जिस तरह से गावस्कर अपने समय के महान स्पिनर को पढ़ पाते थे। सचिन में आवेग है, प्रवाह है, प्रभा है, चमत्कार है पर धीरोदात्त नायक का स्थैर्य नहीं है। वह नहीं कि धनु धर लिया तो ध्वस्त कर ही लौटेंगे।

सचिन हमारे गौरव हैं। लेकिन क्रिकेट के अंतिम हस्ताक्षर नहीं है। समय निरंतर आगे बढ़ता है और यह समय किसी और का है। निस्संदेह वन डे का पहला दोहरा शतक उनके ही नाम है। उन्होंने एक दिवसीय मैचों में कई बार विजय दिलवाई लेकिन विराट इस मामले में उनसे बहुत आगे हैं। यह आदमी तो अविश्वसनीय प्रतीत होता है।

सचिन से भारतीय क्रिकेट का एक नया रूप खुलता है। सचिन एक सुंदर वृक्ष हैं, जिसमें भांति भांति के फूल खिले परंतु सचिन वटवृक्ष नहीं हैं, जिसकी छाया विस्तृत होती है… जो रौद्र धूप से तपे यात्रियों को छाया की आश्वस्ति भऱता है। हर दौर के नायक का सम्मान होना चाहिए। मोह हमें बांधता है परंतु सचिन के मोह से मुक्त होकर देखना होगा। सचिन मेरे हमउम्र हैं, उनसे जैसा जुड़ाव था, वैसा विराट से नहीं है लेकिन विराट एक महारथी बल्लेबाज़ हैं। जब धनुष उठाते हैं तो विपक्ष को मूर्छा आ जाती है।

गाढ़ी पीली शाम का साया लंबा हो रहा है… वेस्टइंडीज़ क्रिकेट का सूर्य डूब रहा है

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