इसीलिए मंदिरों की परंपराओं का पालन ज़रूरी है!

जिस तरह से अलग-अलग स्कूलों और कॉलेजों के अपने अनुशासन (ड्रेस कोड पाठ्यक्रम इत्यादि) होते हैं ठीक उसी तरह पुराने जमाने में मंदिरों की अपनी परंपराएं और तौर-तरीके हुआ करते थे।

भारतीय सनातन परंपरा के अनुसार मंदिरों में बैठी हुई मूर्तियां सिर्फ पत्थर की मूर्ति भर नहीं होती है उनकी प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। प्राण प्रतिष्ठा का मतलब यह है कि उस मूर्ति में प्राण आ जाते हैं और हमें यह भी याद रखना होगा कि यह मूर्ति किसी मनुष्य की मूर्ति के तौर पर नहीं ली जाती है। इस मूर्ति को परमात्मा या सर्वोच्च शक्ति के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

भांति भांति के प्रतीकात्मक देवी देवताओं के मंदिर बनाने की परंपरा हमारे देश में बहुत पुरानी रही है। अलग-अलग देवी-देवताओं के मंदिरों के अलग-अलग अनुशासन और रीति-रिवाज बनाए गए। अपनी आध्यात्मिक रूचि और आध्यात्मिक विस्तार के आधार पर लोगों ने इन मंदिरों का अनुसरण करना शुरू किया। जाहिर तौर पर देवी देवता अलग थे मंदिरों के तौर तरीके अलग थे तो यहां के अनुशासन भी अलग अलग बनाए गए।

यह ठीक वैसा ही है जैसे आज के स्कूल या कॉलेज में या किसी अन्य संस्था विशेष के अपने अनुशासन। कई कॉलेजों को सिर्फ महिलाओं के लिए बनाया जाता है तो कई कॉलेज सिर्फ पुरुषों के लिए बनाए जाते हैं।

आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए कुछ अनुशासन और कुछ नियम पुराने जमाने में तय किए गए जैसे-जैसे वक्त आगे बढ़ा यह मंदिर सिर्फ उस विशेष वर्ग के लिए नहीं रह गए जो नियमों का या अनुशासन का पालन कर रहा था। वह परंपरा आज तक बरकरार रही और उन मंदिरों का मकसद भी आज तक जस का तस बना हुआ है यही वजह रही कि इन मंदिरों की लोकप्रियता और इनमें आने वाला धन आदि बढ़ने के बाद यहां पर प्रशासनिक दखल भी हुआ।

प्रशासनिक दखल के बावजूद हमारे प्रशासन की सुंदरता यह रही है कि उन्होंने पूजा विधि नियम और अनुशासनों के साथ कभी छेड़छाड़ नहीं की। वह मंदिर प्रबंधन या वहां आने जाने वाले लोगों की व्यवस्थाओं और वहां आने वाले धन आदि के इस्तेमाल और संरक्षण तक ही सीमित रहा।

ऐसा देश के कई पुराने और बड़े मंदिरों में हुआ है। हमें यह समझना होगा कि मंदिरों में जो अनुशासन बनाए गए थे वह महिला पुरुषों के भेद के कारण नहीं बनाए गए थे ना ही उनका मकसद समाज में भेदभाव पैदा करना था उनका मकसद किसी एक धारा को या किसी एक व्यवहार का पालन करने वाले लोगों को शिक्षा दीक्षा और एक विश्वास प्रदान करना था।

उदाहरण के लिए यदि किसी ब्रह्मचारी देवी या देवता के मंदिर में अनुशासन बनाए गए या महिलाओं के लिए कोई मंदिर बनाए गए तो वहां पर पुरुषों के प्रवेश को निषिद्ध किया गया। देश में ऐसे कई मंदिर हैं जहां पर पुरुषों का जाना निषेध है या ऐसे भी कई मंदिर है जहां पर विवाहित पुरुष नहीं जा सकते।

देश में ऐसे भी कई मंदिर हैं जहां पर सिर्फ आप धोती पहनकर प्रवेश कर सकते हैं। इस तरह की कई परंपराएं अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग मंदिरों में देखने को मिलती है। वर्तमान परिपेक्ष्य में जिस तरह से इस मुद्दे को उठाया गया है वह मंदिरों की पुरानी परंपराओं के बारे में अज्ञानता के कारण है।

सामाजिक या आध्यात्मिक जीवन में किसी भी अनुशासन को तोड़ना बहस का मुद्दा बनता है। लोकप्रियता और राजनीति का आधार बनता है, वर्तमान में चल रही बहस के मूल में यही बड़े कारण दिखाई पड़ते हैं। मंदिरों में चलने वाले अनुशासन को तोड़ने के पीछे की वजह को जानना होगा। जो इस अनुशासन को सचमुच जानते समझते हैं तमाम अधिकारों को पा लेने के बावजूद वे उस मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगे जहां उनका जाना वर्जित बताया गया है।

अब हमें और उन लोगों पर करना पड़ेगा जो इन अनुशासनों को तोड़ना चाहते हैं और उनके मकसद पर भी जाना होगा अगर हम इसकी एक विस्तृत विवेचना के लिए जाएंगे तो हमें कई जानकारियां मिलेंगी लेकिन मोटे तौर पर साफ दिखाई देता है इसमें कहीं ना कहीं राजनीति और सस्ती लोकप्रियता पाना एक बड़ा मकसद जहां तक महिलाओं से या पुरुषों से भेदभाव की बात है हमारे देश ने पूरी दुनिया को आध्यात्मिकता का ज्ञान दिया है और आज भी भारत वर्ष आध्यात्मिकता के मामले में विश्व गुरु है।

दुनिया भर के जाने-माने विचारकों ने भारतीय साहित्य का भारतीय विचारकों का भारतीय गुरुओं का गहन अध्ययन किया और उसके बाद उन्होंने अपने विचार लिखे।

इस शानदार परंपरा का मूल इसके अपने अनुशासन ही रहे हैं और इसमें कहीं भी महिला पुरुष भेदभाव का कोई स्थान कभी भी नहीं रहा है। दूसरी महत्वपूर्ण बात आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए मंदिरों की आवश्यकता पर भी विचार करना होगा।

शिवोहम और अहम ब्रह्मास्मि कि इस वैदिक परंपरा में आपको यदि सचमुच आध्यात्मिक उत्कर्ष या ईश्वर की प्राप्ति करनी है या देवी संपदाओं को अपने अंदर धारण करना है तो कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। आप जहां हैं वहां उसकी प्राप्ति कर सकते हैं।

अब प्रश्न यह उठता है कि वे लोग कौन हैं जिनके मन में अचानक यह भक्ति भाव जाग रहा है? यकायक भगवान के प्रति इतना समर्पण क्यों दिखा रहे हैं? या इन मंदिरों में घुसने के लिए इतने आतुर क्यों दिखाई पड़ रहा है?

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मंदिरों में कौन जाता है किस अवस्था में जाता है लेकिन इस बात से फर्क पड़ता है कि एक अनुशासन जो किसी संस्था का बहुत लंबे समय से चला आ रहा है वह टूट जाएगा।

जो लोग इसे अज्ञानता वश कुरीति कह रहे हैं, वह भारतीय आश्रम व्यवस्था या मंदिरों की व्यवस्था, मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठा उस मंदिर को बनाने का मकसद, अलग-अलग देवी-देवताओं के होने का मकसद इन तमाम चीजों के प्रति अज्ञानता से भरे हुए हैं।

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