रहस्य के आवरण में छुपी हुई है स्फिंक्स की महानता

जाने कितने बरस बीते जब इजिप्ट हरीतिमा से आच्छादित था। सुंदर नाइल नदी के तट हरे-भरे हुआ करते थे।

तब एक सभ्यता यहाँ निवास करती थी। वे लोग बहुत बुद्धिमान थे। खेती करना जानते थे। वे पत्थरों को तराश सकते थे। वे तारों की भाषा जानते थे। उन्होंने ऐसे निर्माण बनाए जिनका अर्थ समझना पहेली हल करने जैसा काम था।

स्फिंक्स उन्होंने ही बनाया। हम आज तक नहीं जानते कि इन्हे क्यों बनाया गया था। मौसम बदला। ये क्षेत्र धीरे-धीरे रेगिस्तान में बदलने लगा। स्फिंक्स के निर्माता ये क्षेत्र छोड़कर जा चुके थे।

उन्होंने एक ऐसा निर्माण किया जो अगले हज़ारों साल तक प्रकृति की मार सहने के बाद भी अक्षुण्ण रहे। वे बुद्धिमान लोग जानते थे कि नदी का तल पृथ्वी पर मौजूद पाषाण में सबसे कठोर होता है।

सीमित संसाधनों में उन्होंने इस कठोर तल के आधार पर ‘स्फिंक्स’ की महान मूर्ति बनाई। शेर के धड़ और मानव मुख को मिलाकर बनाई गई ये मूर्ति दुनिया की सबसे बड़ी मोनोलिथ मूर्ति है।

महाराष्ट्र स्थित एलोरा भी ‘मोनोलिथ’ है लेकिन वह मूर्ति की नहीं मंदिर की श्रेणी में आता है। जब वे लोग ये जगह छोड़कर किसी अज्ञात स्थान पर चले गए तो उनका ये महान निर्माण रेत के आगोश में खो गया जब तक कि 1901 में उसे खोज नहीं लिया गया।

इस सभ्यता के बाद आई सभ्यता ने मिस्र में नए निर्माण किये। ग्रेट पिरामिड बनाया। इस सभ्यता की टाइमलाइन चौथी सदी की मानी जाती है। मिस्र की इस सभ्यता ने ‘स्फिंक्स’ पर भी दावा जताया। बाद में हुए विस्तृत शोध ने स्पष्ट कर दिया कि ‘स्फिंक्स’ तो चौथी सदी से भी अधिक पुराना है और पूर्णतः सुरक्षित है।

इसे जब खोजा गया तो सिर के ठीक ऊपर भीतर जाने का गुप्त मार्ग बना हुआ था। इस मार्ग को बाद में बंद कर दिया गया। स्फिंक्स ठोस नहीं है। 66 फ़ीट ऊँचे, 73 मीटर लम्बे और 19 मीटर चौड़े स्फिंक्स के भीतर गलियारे और गुप्त रास्ते बने हुए हैं। अब तो इसकी सुरक्षा को लेकर इतनी सजगता है कि आप गूगल सेटेलाइट इमेजनरी से इसका एरियल व्यू नहीं देख सकते।

प्रारम्भ में स्फिंक्स चमकदार लाल रंग में दिखाई देता था। चेहरे पर एक दाढ़ी हुआ करती थी। एक नाग भी हुआ करता था। समय के साथ ये सभी नष्ट हो गए। भीतर से ये आज भी पूरी तरह सुरक्षित है।

स्फिंक्स का न निर्माण का समय ज्ञात हो सका है और न इसे बनाने वाली सभ्यता की आज तक कोई पहचान हो सकी है। दुनिया के सारे इंजीनियरों को सारे साधन दे दिए जाए, करोड़ों का फंड उपलब्ध करवा दिया जाए। तब भी वे स्फिंक्स खड़ा नहीं कर सकते।

उन्नीसवीं सदी के महान रहस्यदर्शी गुरजिएफ ने जब इस महान आश्चर्य के दर्शन किये तो वे हतप्रभ रह गए। उन्होंने अपने साथियों के साथ इसका गहन अध्ययन किया। वे ऐसे अद्भुत मेधा के व्यक्ति थे जो स्फिंक्स के निर्माताओं को साँस भरते महसूस कर सकते थे। वे देख सकते थे कि अनूठे इंजीनियर कैसे वस्त्र पहनते होंगे।

गुरजिएफ ने स्फिंक्स को देखकर जो जाना उसका उल्लेख नीचे कर रहा हूँ। हालांकि महान रहस्यदर्शी ने सब कुछ बताकर भी कुछ नहीं बताया।

‘ऐसा ही एक निर्माण मैंने हिन्दू कुश की पहाड़ियों में देखा था। वह मूर्ति कुछ कहती थी। स्फिंक्स का अध्ययन करते हुए महसूस हुआ कि इस आकृति में ब्रह्मांड विज्ञान की एक बड़ी, पूर्ण और जटिल प्रणाली शामिल है। हमने इस प्रणाली को समझना शुरू किया। एक अनजान भाषा इस बड़ी मूर्ति पर चस्पा की गई है। वह भाषा शरीर में, उसके पैरों में, अपनी बाहों में, उसके सिर में, उसकी आंखों में, उसके कानों में दिखाई देती है। ये भाषा पृथ्वी पर नहीं जन्मी। धीरे-धीरे हम इस मूर्ति को बनाने वाले लोगों के उद्देश्य को समझ गए। हमने उनके विचारों, उनकी भावनाओं को महसूस करना शुरू कर दिया। हमने उनके चेहरे देखे हैं, उनकी आवाज़ें सुनी हैं। वे हमें हज़ारों साल की यात्रा में क्या समझाना चाहते थे, हमने उसका अर्थ समझ लिया।’

(ऊपर प्रदर्शित फोटो में से बाएं और तरफ के दोनों फोटो बहुत पुराने हैं, लाइफ पत्रिका के फोटो में आप इसका एरियल व्यू देख सकेंगे साथ ही ध्यान से देखने पर गोलाकार छेद भी दिखाई देगा। इस गुप्त मार्ग को कई साल पहले ही बंद कर दिया गया था।)

पांच हज़ार साल तक प्रकृति की मार सहती रही वो स्याही

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