अयप्पा टू अयोध्या

विगत 16 अक्टूबर को मैंने लिखा था कि किस प्रकार केंद्र और राज्य में हिंदुत्व विरोधी सरकारों के कारण 484 वर्षों बाद मिली जीत पर भी उत्तर प्रदेश और भारत के हिंदुओं को ख़ून का घूँट पीकर चुप रह जाना पड़ा था…

जहाँ दीवाली मनाई जानी चाहिए थी, वहाँ एक दिया भी जलाने की हिम्मत हिंदुओं ने न दिखाई क्योंकि राज्याश्रय का अभाव था।

हिंदुओं के सौभाग्य से इस समय केंद्र और अधिकांश राज्यों में ख़ुद को बेझिझक हिन्दू राष्ट्रवादी कहने वालों के नेतृत्व की सरकार है।

इसी समय हम यह भी देख सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के एक असंवेदनशील निर्णय से केरल राज्य के हिंदुओं को सबरीमाला प्रकरण में आंदोलित कर दिया है और उनकी भावनाओं को ताक पर रखते हुए वहाँ की सरकार रक्तस्नान पर उतारू हो चुकी है।

वाम का सत्ता में होना रक्तस्नान की गारंटी रहा है। यह पूरे विश्व के साथ साथ भारतीय राज्यों जैसे बँगाल, त्रिपुरा और केरल में हम देखते आये हैं।

ऐसे में केंद्र सरकार के रुख़ और राष्ट्रवादी पार्टी के दृष्टिकोण को देखने पर हिंदुत्व की राजनीतिक इच्छाशक्ति को परखा जा सकता है।

भाजपा अध्यक्ष अमित भाई शाह केरल जाकर सबरीमाला प्रकरण पर अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता डंके की चोट पर स्पष्ट कर आये हैं।

अमित शाह कहते हैं कि यदि केरल की वाम सरकार अयप्पा भक्तों पर अपना दमन चक्र नहीं रोकती है तो भाजपा केरल सरकार की ईंट से ईंट बजा देगी।

अमित शाह यह भी कहते हैं कि यहाँ धर्म, श्रद्धा, न्याय और कानून के बीच में द्वंद्व है जिसमें उनकी पार्टी जनता और धर्म, श्रद्धा, न्याय के साथ खड़ी है।

आज के इस पूरे घटनाक्रम और अमित भाई शाह के मुख से उच्चारित वक्तव्य को श्रीराम जन्मभूमि और अयोध्या जी में जो होने वाला है, उसका रिहर्सल समझ लीजिए।

वामपंथी सरकार को दी जाने वाली चेतावनी पर कान तो माननीय उच्चतम न्यायालय को धरने चाहिए क्योंकि इसी महीने की 29वीं तारीख़ से श्रीराम जन्मभूमि मुद्दे की नियमित सुनवाई तय है।

श्रीराम जन्मभूमि पर फ़ैसला हो, और दो टूक हो, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरह पंचायती खानापूरी न हो वरना राष्ट्रवादी हिंदुओं की पार्टी केरल की तर्ज़ पर ही धर्म, श्रद्धा, न्याय और कानून के बीच खड़ी होकर न्याय के पक्ष में खड़ी हो जाएगी और कॉलेजियम के बजबजाते तारकोल से सनी दीवारें खुद को कम मात्रा में चलाये गए पटाखों की आँच से पिघलती हुई देखने को बाध्य हो जानी हैं।

आज देश के अधिकाँश राज्यों में इन्हीं हिन्दू राष्ट्रवादियों की सरकारें हैं जो श्रद्धा के विषयों में आंदोलित हिंदुओं पर न गोली चलाने वाली हैं, ना ही दमन चक्र दुहराने वाली हैं।

हिन्दू समाज अब खुद को श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन तक सीमित रखने को भी तैयार नहीं है। वह राष्ट्रवादी तो है ही, साथ ही वर्तमान लोकतंत्र को नागरिक चेतना के स्तर पर चुनौती देते हुए और अधिक परिष्कृत लोकतंत्र की माँग कर रहा है।

श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण में शीघ्रता हो, यह अब उसकी भविष्य की योजनाओं के लिए आवश्यक हो चला है, उसका धैर्य अगर चूकने लगा तो पहली मार सड़ चुकी कानूनपालिका पर पड़ सकती है।

चिंता न करें भारत में हिन्दू अहिंसक क्रान्ति ही करेंगे पर विध्वंस तो व्यवस्था को ही झेलना पड़ेगा।

अयप्पा से अयोध्या की ओर जाने वाली चिंगारी फूट पड़ी है, केरल में वामपंथी सरकार को दी जाने वाली चेतावनी उत्तर में बैठे क़ानूनपाल सुनकर समझ लें तो संभव है कि आने वाली पीढ़ियों में उनके प्रति आदरभाव बचा रह जाये।

देश को जगाने के लिए भगवान श्री अयप्पा को नमन करता हूँ… जय श्रीराम।

बिन सत्ता सब सून

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY