गैरों पे करम, अपनों पे सितम – चीनी चकाचौंध की सच्चाई!

चीन की चकाचौंध कर देने वाली सम्पन्नता की कई कहानियाँ हैं, लेकिन उस दाल में कुछ काला है।

एक आयोजित दौरे पर मैं चीन गया था। उद्देश्य था चीन की ऐतिहासिक धरोहर देख आना। लेकिन उसी के साथ मैं चीन के चार विशालतम शहरों का अनुभव भी मैंने पाया।

मेरा निरीक्षण इन दस दिनों के प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर है। यह निजी निरीक्षण शायद कुछ मुद्दों पर यथार्थ से कुछ हट कर हो, पर मेरी नज़रों से जो मुझे प्रतीत हुआ, वह मेरे लिए पर्याप्त है।

बीसवीं सदी के माओ जेदोंग के क्रूर शासन में गरीबी से जूझते हुए करोड़ों के हुजूम के रूप से निकल कर चीन आज बड़ी सारी प्रगति कर चुका है। अर्थव्यवस्था में बदलाव और देश भर में उद्योगों को अभूतपूर्व बढ़ावा देने की नीति से चीनी नेताओं ने देश की सूरत ही बदल दी है।

पिछले कुछ दशकों में चीन ने सातत्यपूर्ण व्यापार वृद्धि दर दर्ज की है। कुछ ही वर्षों में वह विश्व के सबसे संपन्न देश संयुक्त राज्य अमरीका की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ देगा। अर्थव्यवस्था के आकार में न सही, पर क्रय शक्ति के आधार पर उसके नागरिक निश्चय ही अमरीकी नागरिकों से बेहतर साबित होते हैं।

बीजिंग का गाइड बड़े गर्व के साथ हमें देंग श्याओपिंग का वक्तव्य बता रहा था – “बिल्ली काली या सफ़ेद होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, बस उसने चूहे पकड़ने चाहिए!”

इन दिनों चीन देंग की नीति अपने पड़ोसी देशों पर आज़मा रहा है – वे लोकतांत्रिक हों या तानाशाही, कोई फर्क नहीं पड़ता, बस वे चीन के हितों की रक्षा करें! और चीन के हित उस की अर्थव्यवस्था में समाहित है।

एक देर रात मैं बीजिंग के एक होटल में सीएनएन देख रहा था। टीवी पर सऊदी पत्रकार खशोगी की हत्या के सन्दर्भ में सऊदी अरब के बारे में अमरीकी नीति के बारे में चर्चा हो रही थी। लेकिन जिस क्षण एंकर ने बुश की चीन नीति के बारे में बात करनी आरम्भ की, टीवी की स्क्रीन काली हो गई!

चीन से सम्बद्ध चर्चा के ख़त्म होते ही टीवी पुनः चालू हो गया। मैं इस से बड़ा विचलित हुआ। क्योंकि यह कोई अपवादात्मक घटना नहीं थी। मुझे अपने फोन पर व्हॉट्सअप और इतर सोशल मीडिया संस्थलों के बारे में दिक्कतें हो ही रही थी। गूगल तक रोक रखा गया था। इतना यदि भारत में हो, तो मारे छटपटाहट के आधे आबादी की जान चली जाए!

चीन की सरकार पत्रकारिता की स्वतंत्रता को तो जूते की नोक पर रखती ही है, लेकिन जहां एक ओर उसकी वैश्विक स्तर पर साख बढ़ रही है, वहीँ दूसरी ओर उस के नागरिक मुक्त सूचना प्राप्त करने से वंचित हैं, उस स्वतन्त्रता के लिए व्याकुल है।

कहने को तो अभिव्यक्ति और पत्रकारिता की स्वतन्त्रता चीन सरकार देती है, पर सरकारी गुप्त सूचनाओं को उजागर करने के आरोप की तलवार उसके वृत्त माध्यमों पर और आम नागरिकों पर लटकती रहती है।

इस आरोप में किसी को भी, किसी भी हद तक दंड दे सकने की सरकार की क्षमता उसे अपने राजनीतिक और आर्थिक हित-सम्बन्धों को हानि पहुंचाने वाकी किसी भी अभिव्यक्ति का गला घोंट देने के लिए सक्षम बनाती है।

शंघाई से कुनमिंग की उड़ान में नानचोंग में एक पड़ाव था। कुल 40 मिनट के उस पड़ाव में पहले तो हमें खिड़कियां बंद कर लेने के लिए कहा गया। पर बाद में हमें विमान से उतार कर एक कक्ष में ले जाया गया, और बिना किसी स्पष्टीकरण के हमें तीन घंटे रोक रखा गया।

खिड़की की दरार से झांकते हुए मेरे मित्र कर्नल बिस्वास ने कहा कि कहीं दूर विमानपत्तन के किसी छोर पर कोई सामरिक अभ्यास चल रहा था या कुछ विमान अगवा करने की घटना हो गई हो। विमानपत्तन के अधिकारी कुछ बता नहीं रहे थे। तीन घंटों बाद हमें वापस विमान में बिठा कर सिर्फ यह बताया गया कि कोई सामरिक अभ्यास चल रहा था।

विश्व भर में कहीं भी नागरी विमानन में सामरिक अभ्यास के कारण ऐसा व्यवधान नहीं डाला जाता है। चीन की सेना – पीपल्स लिबरेशन आर्मी पिछले छह दशकों से चीन के समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर प्रभाव डालने वाला प्रमुख, सुसंगठित और मुखर संगठन रहा है।

दूसरी ओर वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रम और नीतियाँ लागू करने के लिए और देश पर प्रभाव और नियंत्रण बनाए रखने के लिए एक शक्तिशाली साधन बन के रहा है।

चीन के राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक जीवन में और परराष्ट्र नीति में और देश के नेताओं के चयन में भी उस का महत्त्वपूर्ण सहभाग होता है। इस आर्थिक समृद्धि के दौर में भी इस बारे में कोई बदलाव नहीं दिखाई पड़ता है।

चीन में मुझे सब से अधिक आश्चर्य हुआ सो जरूरी और गैर-जरूरी सामान की कीमतों के बारे में! हमारी यह धारणा है कि चीनी सामान सस्ता होता है। लेकिन चीन में ऐसा कतई नहीं है।

पर्यटन स्थल पर किसी चकाचक फिरंगी छाप रेस्त्रां में कॉफी के 35 युआन (200/- रु.) अचरज की बात नहीं, पर मैंने एक साधारण से रिहाइशी इलाके की साधारण सी दुकान से मैंने एक लीटर दूध के रु. 250/- दिए हैं, और एक पैकेट सिगरेट के रु. 300/-! वैसेलिन की दस ग्राम डिब्बी के (जो भारत में 5/- के छुट्टे के बदले मिलती है) 150/- देने पड़ने पर मेरा बंगाली मित्र बड़ा क्षुब्ध था!

यह बात बड़ी चौंकाने वाली और विरोधाभासी थी। कई बार हमने पता किया कि कहीं हमें पर्यटक जान कर ये लोग चूना तो नहीं लगा रहे? पर दुकान में आने-जाने वाला आम नागरिक भी उन्ही दामों पर खरीदारी कर रहा रहा! इस पर हम ने जानकारी लेनी शुरू की.

चीन की वास्तविक औसत प्रतिव्यक्ति आय $12472.51 है, जो कि विश्व की मध्यम आय के बराबर है, किन्तु औसत से काफी कम है। निम्न आय वर्ग के घर शंघाई में लगभग 15000 युआन प्रति वर्ग मीटर के दाम में मिलते हैं। उच्च वर्ग में यही आंकड़ा अमरीकी डॉलर में हो सकता है। मजे की बात है कि चीन में आम नागरिक ज़मीन खरीद नहीं सकता!

एक स्तर की कमाई में यदि खर्चे अधिक हो, तो जीवनमान का स्तर कम हो जाता है। वहां कमाई का बड़ा सा हिस्सा घर के लिए ही खर्च हो जाता है। इस से जीवनमान का स्तर बुरी तरह प्रभावित होता है। तो फिर वे जीते कैसे है?

हमारे गाइड ने हमें बताया कि शंघाई में कोई तीस-पैंतीस वर्ष भी काम करे, तो अपने नाम एक पाई भी बचत नहीं कर सकता – गुजर-बसर में ही सारा खर्च हो जाता है, महीने के महीने!

ऊपर से शादी करनी हो तो लड़कीवालों को दहेज़ देना पड़ता है! इसलिए कई लोग शहर छोड़ कर अपने गाँव चले जाते है, ताकि कुछ तो जिंदगी हासिल हो! पर एक जाता है तो दस जीवन की ही लालसा में दाखिल होते है, और शहर की आबादी बनी रहती है।

तो वहां लोग अमीर कैसे बनते हैं? उसने कहा कि यदि आप की सही लोगों से पहचान है, तो सब कुछ हो सकता है। चीन में भ्रष्टाचार सर्वत्र है – और उस के टिके रहने की नींव है भाई-भतीजावाद!

अंत में चीन की सबसे पकाऊ बात की बात की जाए – यातायात! हम भी एक ट्रैफिक जैम में फँस गए थे, लेकिन वह बस दो ही घंटे के लिए था। अमूमन हालात बहुत बुरे होते हैं। चीन जैम के बारे में भी विश्व कीर्तिमान बनाता है – आप ने कुछ वर्ष पहले चीन के राष्ट्रीय महामार्ग पर बने जैम का समाचार सुना होगा – वह 100 किमी लंबा था, हजारों कारें उस में दस दिन तक फँसी रही थी!

भीड़भाड़ की जिंदगी से वाकिफ हम भारतीयों को चीन की जनसँख्या का कुछ आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पर हमें भी सोचना पड़ता है कि इतने सारे लोग भला आते कहाँ से है? क्या आप ने सुना है कि माओ की कब्र पर हर रविवार सुबह दस लाख तक लोग आते हैं? मैंने अपनी आँखों से देखा है!

कुल मिला कर हमें चीन से इतनी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, और हमारे जनतांत्रिक और जनभागीदारी से बने अपने सुन्दर देश के बारे में कभी कभार अच्छा भी सोचना चाहिए!

लेख श्री Abhijit Gadre का है और आनंद राजाध्यक्ष जी के द्वारा प्राप्त हुआ, और मुझे लगा कि इस का वितरण हिंदी भाषी लोगों के लिए होना ही चाहिए। इसलिए हल्के से मिर्च मसाला तड़के समेत अनुवादित किया, और साँझा कर रहा हूँ।

किसने और क्यों कहा था इस्लाम को शांति का धर्म!

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