अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है लाइसेंस-परमिट-कोटा राज

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भारत में उद्यम और व्यापार करने इत्यादि जैसी प्रक्रियाओं को सरल बनाने के बारे में हम सभी को जानकारी है।

जीएसटी लागू करना, ऑनलाइन टैक्स भरना, मेक इन इंडिया प्रोग्राम, बिजनेस लगाने की प्रक्रिया का ऑनलाइन अप्रूवल, बैंकों को लोन देने के लिए दिल्ली से फोन नहीं करना, इन सभी को इस संदर्भ में समझना चाहिए कि आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी के आने के पहले ऐसे निर्णय कैसे लिए जाते थे।

1990 की शुरुआत में विश्व मीडिया साम्राज्य के मालिक रूपर्ट मर्डोक भारत में अपना टीवी चैनल स्थापित करना चाहते थे।

सरकारी लोगों से ढेर सारी मीटिंग खत्म करने के बाद वह धीरूभाई अंबानी से मिलने गए और बताया कि उन्होंने भारत में ‘सही लोगों’ (all the right people) से मिल लिया है और उन्हें आशा है कि उनका काम हो जाएगा, यानी कि टीवी चैनल का लाइसेंस मिल जाएगा।

धीरूभाई ने जवाब दिया कि रूपर्ट, अगर भारत में सफलता पानी है, तो उसके लिए राइट लोगों से नहीं, बल्कि आपको ‘गलत लोगों’ (all the wrong people) से मिलना चाहिए।

यही पर लाइसेंस-परमिट व्यवस्था का राज़ छुपा था।

भारत में लाइसेंस-परमिट-कोटा राज में सरकारी नियंत्रण इतना मज़बूत था कि न केवल यह तय किया जाता था कि कौन सी कंपनी किस वस्तु का उत्पादन करेगी, बल्कि उत्पादन की मात्रा, साथ ही साथ वस्तुओं की कीमत भी सरकार तय करती थी।

लाइसेंस राज के तहत आवश्यक वस्तुओं और संसाधनों की कमी को जानबूझकर बनाये रखा गया था। आम लोगों को दैनिक जीवन निर्वाह करने के लिए उपलब्ध विकल्प बहुत सीमित थे और अधिकतर वस्तुओं को बनाने के लिए लाइसेंस और खरीदने के लिए कोटा और परमिट चाहिए था।

उदाहरण के लिए, केरोसिन या मिट्टी का तेल, चीनी, सीमेंट का उत्पादन लाइसेंस के द्वारा जानबूझकर कम रखा गया था; इन वस्तुओं को खरीदने के लिए हर परिवार का कोटा बंधा था, जो एक परमिट के द्वारा गिनी-चुनी दुकानों पर उपलब्ध था। खुले बाज़ार में यही वस्तुएं दोगुने दामों पर उपलब्ध थीं।

बाजार में केवल दो से तीन ब्रांड की कार और स्कूटर मौजूद थे, एक ही सरकारी कंपनी का टेलीफोन था, जिनको खरीदने के लिए बुकिंग के बाद दस वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।

लाइसेंस राज की विशेषता यह थी कि लाइसेंस स्वयं एक प्रोडक्ट बन गया था और एक प्रोडक्ट की तरह दुर्लभ हो गया था। यदि कोई कंपनी अपने उत्पाद को बढ़ाना चाहती थी, तो ऐसा करने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता थी, जो आसानी से उपलब्ध नहीं था।

लाइसेंस के लिए एक ‘बाज़ार’ विकसित किया; लाइसेंस की कीमत थी। बिजनेस चलने के लिए आपको अपने प्रतिद्वंद्वी से पूर्व लाइसेंस प्राप्त करना था और फिर उस प्रतिद्वंद्वी को लाइसेंस ना मिले, उसकी कीमत देनी होती थी।

अपना उत्पाद निर्यात करना है। कस्टम वाले पूछते थे कि आपके उत्पाद की कीमत भारत में बिकने वाले उत्पाद से कम कैसे है? ऐसी बहुत सी बाधाएं जानबूझकर भारतीयों के रास्ते में डाली गयी थीं जिससे एक परिवार और उनके मित्रों को लाइसेंस की कीमत मिलती रहे।

अभी भी लाइसेंस-परमिट-कोटा राज पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। काँग्रेसियों में प्रधानमंत्री बनने का लाइसेंस सिर्फ क्लाउन प्रिंस के पास है।

अगर स्वयं की फैक्टरी उत्पादन के लिए तैयार नहीं है तो कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री का लाइसेंस सरदार जी को दे दिया। लेकिन उस लाइसेंस की कीमत भी तो देनी होगी। अतः परिवार ने 2G, 3G, कॉमनवेल्थ, कोयला, जयंती (पर्यावरण) शुल्क वसूल कर लिया।

और इस परिवार ने भारतीयों का कोटा भी फिक्स कर दिया था। जैसे कि एक समुदाय को प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार दे दिया। भारत तोड़क शक्तियों को कोटा के तहत JNU में एडमिशन दे दिया।

अगर हम नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री ना बनाते तो उसी कोटे से हामिद अंसारी आज देश के राष्ट्रपति होते।

पुरानी आदत है; इतनी आसानी से तो छूटती नहीं।

स्वाधीनता उपरांत लगभग लगातार शासन करके काँग्रेसियों ने दी थी यह प्रगति!

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