आशु उवाच : रामराज्य भाग – 6

कैकेयी के स्वर ने राम में अपार ऊर्जा का संचार किया। एक हल्के से विराम के बाद राम ने कहा- माँ मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे राज्याभिषेक की तैयारी चल रही है?

तो इसमें बुरा क्या है पुत्र? तुम सक्षम हो, उस अवस्था को प्राप्त कर चुके हो। तुम्हें चाहिए कि अब तुम सभी राजकीय दायित्वों का निर्वाह करते हुए हमें भी वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुरूप अपने जीवन को जीने के लिए स्वतंत्र करो।

राम ने बहुत शांति से कहा- जो कार्य कुश-आसन पर बैठकर सम्पन्न किए जा सकते हैं वे सिंहासन पर बैठकर सम्पन्न नहीं किए जा सकते माँ।

राम के कथन में एक सन्यासी के भाव को अनुभूत कर कैकेयी ने अत्यंत सतर्कता के साथ कहा- कुश-आसन पर बैठने की आयु में सिंहासन पर बैठना, और सिंहासन पर बैठने की आयु में कुश-आसन पर बैठना, दोनों ही कल्याणकारी नहीं होते पुत्र।

हमारे जीवन में संतुलन बना रहे, इसीलिए मनीषियों ने हमें वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुरूप जीवन जीने के मार्ग सुझाए हैं। तुमने अभी गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया है, इसलिए तुम कुश-आसन के नहीं सुखासन पर बैठने के अधिकारी हो।

राम ने गम्भीरता से कहा- माँ वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुरूप जीवन जीना हमारे व्यक्तिगत उत्कर्ष के लिए तो कल्याणकारी होता है, किंतु यह सामाजिक उत्कर्ष का हेतु नहीं बन पता।

आनंद पूर्वक किया गया श्रम ही आश्रम कहलाता है माँ, जिसमें आनंद के लिए नहीं, आनंद से किए जाने वाले कर्म समाहित होते हैं। इसमें आनंद उपलब्धि नहीं हमारी कर्मणाशक्ति का अविभाज्य अंग होता है। आनंद तो पहले से ही उपलब्ध है, किंतु भ्रम के वशिभूत होकर हम आनंद की प्राप्ति के लिए परिश्रम करते हुए अंत में थक कर शक्तिहीन हो जाते हैं और कहते हैं कि जीवन में आनंद नहीं है।

माँ, कर्म का सुसंचालन देह की शक्ति पर निर्भर होता है। हमारी देह पर आयु का प्रभाव पड़ता है जिससे देह की क्षमता सीमित हो जाती है, इससे व्यक्ति वृद्धावस्था में स्वयं की आत्मा का तो परिष्कार कर सकता है किंतु समग्र समाज की आत्मा का परिष्कार नहीं कर पता। इसलिए जिनका लक्ष्य सामाजिक उत्थान होता है, वे युवावस्था में सिंहासन के स्थान पर कुश-आसन को स्वीकार करते हैं, क्योंकि धर्म, कर्म और मर्म को सिद्ध करने के लिए संकल्प शक्ति के साथ-साथ शरीर का शक्तिशाली होना भी आवश्यक होता है।

जगत् के दैहिक, दैविक और भौतिक तापों का नाश शक्ति से ही किया जाता है। किंतु विचित्रता देखिए जब हम शक्ति सम्पन्न होते हैं तब त्रितापों के आवेश से वशिभूत हो जाते हैं, और जब अशक्त हो जाते हैं तब इनके शमन के लिए प्रयास करने लगते हैं। जबकि इन तीनों तापों का शमन तभी किया जाना चाहिए जब इनका जन्म होता है।

सुखासन में बैठकर इन तीनों तापों का नाश नहीं किया जाता माँ, अपितु इनका नाश करने के बाद ही हमें सुखासन उपलब्ध होता है।

कैकेयी ने हल्के हास्य से कहा- अब तुम बालक नहीं हो राम, कुश-आसन बाल्यावस्था और वृद्धावस्था में मनुष्य के कल्याण का हेतु होता है, युवावस्था में नहीं। युवावस्था दायित्वों से पलायन करने के लिए नहीं, दायित्वों का पालन करने के लिए होती है।

राम बहुत ममत्व से अपनी माँ को देखते हुए बोले- आपने बिलकुल ठीक कहा माँ, युवावस्था तो हमारे जीवन की कल को कल से जोड़ने वाली बड़ी महत्वपूर्ण कड़ी है।

युवावस्था हमारे बीते हुए कल अर्थात हमारे माता पिता और हमारे आने वाले कल यानि हमारी संतानों को जोड़ने वाला ‘आज’ अर्थात वर्तमान होता है। जिसके ऊपर अतीत को सहेजने और भविष्य को सँवारने का दायित्व होता है। इसलिए कहा जाता है कि जिसने अपने आज को सँवार लिया उसका अतीत और भविष्य स्वमेव सँवर जाएगा।

सन्यास संसार के प्रति पराजय से उत्पन्न भाव नहीं है माँ, अपितु ये उन्ही व्यक्तियों के हृदय में जन्म लेता है जो संसार को जय करने की प्रेरणा से भरे होते हैं। सन्यास का अर्थ जीवन से पलायन नहीं अपितु अत्यंत सजगता के साथ जीवन का पालन करना होता है। सन्यस्थ जीवन साहस का विषय होता है माँ, जो युवावस्था में संसार में रहते हुए सन्यास को जी लेता है वह वृद्धावस्था में राजत्व को जीत लेता है, फिर उसके राज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक तापों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

कैकेयी ने राम के नेत्रों में सीधे झाँकते हुए कहा- पुत्र, रावण ने भी अपनी युवावस्था में घोर तपस्या करके महादेव शिव को प्रसन्न किया था। उसने भी कुश-आसन को सिद्ध किया था, किंतु जैसे ही वह सिंहासन पर आरूढ़ हुआ उसने अपनी अर्जित शक्तियों का दुरुपयोग किया। और आज संसार साक्षी है कि परम विद्वान, ज्ञानी, ध्यानी, शक्तिशाली होते हुए भी रावण समाज के विकास का नहीं विनाश का हेतु हो गया है।

राम ने बहुत धैर्य से अपनी माँ के सचेत करने वाले कथन को सुना और हल्के से मुस्कुरा दिए।

कैकेयी ने देखा की राम की मुस्कान में ना तो कैकेयी के लिए उपहास का भाव था, और ना ही स्वयं की तुलना रावण से किए जाने की बेचैनी.. अपितु उसकी मुस्कान में अपनी माँ के विवेकपूर्ण कथन के लिए प्रशंसा थी। राम का ये भाव कैकेयी को बहुत भाता था, इस बच्चे को किसी भी प्रकार की तुलना व्यथित नहीं करती, राम का तुलना में विश्वास ही नहीं है इसलिए तो संसार राम को अतुलनीय मानता है।

राम मुग्ध भाव से अपनी माँ को देखते हुए बोले- किसी सन्यासी के चित्त में सिंहासन की आकाँक्षा जहाँ अकल्याणकारी होती है, वहीं किसी राजसी हृदय में सन्यास का भाव अत्यंत कल्याणकारी होता है माँ।

रावण की साधना का हेतु त्रिलोक पर शासन करना था तो राम का लक्ष्य त्रितापों का शमन करना है।

रावण और तुम्हारे राम में अंतर है माँ, वो कुश-आसन से सिंहासन की ओर बढ़ना चाहता था और मैं सिंहासन से कुश-आसन की ओर बढ़ना चाहता हूँ। रावण की साधना का लक्ष्य सत्ता थी, और राम की साधना का लक्ष्य समाज है, रावण प्राप्ति के भाव से भरा हुआ था, और राम परिष्कार की प्रेरणा से प्रेरित है। रावण को अपने ज्ञान, अपनी शक्ति का अहंकार है, और तुम्हारे राम को अपनी शक्ति, अपने अहंकार का ज्ञान है। रावण अपनी साधना से शक्ति प्राप्त करना चाहता था और राम अपनी शक्ति को साधना में लगाना चाहता है।

माँ जब भी कोई साधक सत्ता को लक्ष्य बनाता है तब वह विनाशकारी हो जाता है, वहीं दूसरी ओर यदि किसी सत्ताधिकारी के हृदय में साधना का भाव उत्पन्न हो तो वह विकास का हेतु होता है। रावण प्राप्ति की प्रेरणा से प्रेरित था, और राम त्याग के भाव से भरा हुआ है। रावण राजनीति के माध्यम से धर्म को नियंत्रित करना चाहता है और राम, धर्म के दंड से राजनीति को सही दिशा देना संकल्पबद्ध है।

तुम निश्चिन्त रहो माँ, हम दोनों के उद्देश्य में बहुत अंतर है इसलिए हमें मिलने वाले परिणाम भी भिन्न होंगे।

कैकेयी सोच में पड़ गयीं, यदि देखा जाए तो राम और रावण दोनों एक ही धरातल पर खड़ी हुए दो भिन्न चेतनाएँ हैं। दोनों ही महान शक्तिशाली हैं, दोनों ही ज्ञान का पर्याय हैं, दोनों ही शिव के उपासक हैं, दोनों की ही आस्था- तप, तपस्या, साधना, शक्ति, और संकल्प में है।

ये दोनों ही जन्मजात नायकत्व के गुणों से भूषित हैं किंतु इसके बाद भी इन दोनों में कितना भारी अंतर है ! जहाँ राम को समाज के वंदन में सुख मिलता है वहीं रावण को सामाजिक क्रंदन में आनंद आता है। जहाँ राम नमन की शक्ति में विश्वास करता है वहीं रावण दमन की नीति को प्रश्रय देता है। अपने इन्हीं गुणों के कारण आज राम अपने छोटे से संसार में वंदनीय है तो रावण पूरे संसार में निंदनीय हो गया। राम के लिए समाज में सत्कार का भाव है तो रावण के लिए संसार धिक्कार की ध्वनि से भरा हुआ है।

कितनी सरलता से राम ने कर्म और उद्देश्य के बीच निहित अंतर को स्पष्ट कर दिया। महानतम कर्म भी अपवित्र उद्देश्यों के साथ संलग्न होने के कारण अपकर्म की श्रेणी में आ जाते हैं, और पवित्रतम उद्देश्य की पूर्ति के लिए किए गए अन्यथा कर्म भी कालान्तर में सदकर्म की प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं।

तभी अध्ययन कक्ष के द्वार पर एक हल्की सी थाप से कैकेयी की विचार शृंखला टूटी और उन्होंने गरिमापूर्ण स्वर में पूछा- कौन है द्वार पर?

क्रमश:

– आशुतोष राणा

आशु उवाच : रामराज्य भाग – 5

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