स्कूल बैग और राहुल का राफेल राग

बच्चा बहुत दिनों से ज़िद कर रहा था कि पापा मुझे भी स्कूल जाना है। मेरे लिए भी स्कूल बैग ला दो।

बाप नशेड़ी था। उसे अपने नशे से ही फुरसत न थी। उसकी खुमारी उतरती न थी।

वो बाज़ार गया… स्टेशनरी की दुकान पहुंच कर पूछा बैग कितने का है?

दुकानदार ने जवाब दिया, 100 रुपये का।

उसने जेब टटोली… बमुश्किल 50 – 60 रूपए थे… उसने 50 का पव्वा लिया, 10 का चखना… नशे में लड़खड़ाता घर आया… सो गया.

अब बच्चे ने माँ से ज़िद की… माँ, मैं भी स्कूल जाऊंगा। मुझे भी स्कूल बैग ला दो न… बापू तो नहीं लाये।

माँ भागी भागी बाज़ार गयी…

स्कूल बैग कितने का?’

“100 रुपये का…”

नहीं, 90 दूंगी…

“अच्छा चलो, न आपकी न मेरी… 91 में सौदा पक्का…”

पर ये खाली झोला ले के स्कूल जाएगा क्या बेटा? साथ में किताबें भी तो दो…

“कौन कौन सी किताबें दूं?”

हिंदी, अंग्रेज़ी और गणित की दे दो…

और सुनो… 3 कॉपियां भी देना…

और हाँ… पेंसिल, शार्पनर और इरेज़र भी…

यूँ करो, एक टिफ़िन और वॉटर बॉटल भी दे दो… मेरा लाल स्कूल जाएगा।

कुल कित्ते पैसे हुए?

“300 बहन जी…”

कैसे कैसे?

“91 रूपए bag के और बाकी 209 किताबों, copy, स्टेशनरी, टिफ़िन और बोतल के…”

माँ स्कूल बैग ले के घर आयी तो शराबी चरसी बोला… “कहाँ आवारागर्दी करके लौटी है कलमुँही… जब देखो तब घूमती रहती है आवारा?”

बच्चे का स्कूल बैग लेने गयी थी…

“कितने पैसे लुटा आयी बाज़ार में?”

300 रुपये…

“क्या कहा? 300? 100 रुपये का आता है स्कूल बैग… बाकी 200 किस यार पे लुटा आयी कुलटा, कुलच्छनी, कलमुँही?”

भैया, यही कहानी है राफेल की…

राहुल बाबा… 540 करोड़ में ही मिल रहा था राफेल तो काहे नहीं ले लिए 100 – 50 ठो?

खाली जहाज ले के चाटोगे? उसके साथ हथियार, गोला बारूद, मिसाइल, राडार भी तो लेना था न?

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष, और प्रधानमंत्री पद के अभिलाषी को समझ नहीं आएगा।

आप तो समझदार हैं…

रफाल और राजनीति का पप्पू काल

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