कैसा भी नियम, कानून, नीति बना ले, डिजिटल क्रांति को नहीं रोक सकती सरकार

पिछले बीस वर्षो में किसी भी दुकान पर कोई भी इलेट्रॉनिक वस्तुएं, खिलौने, घरेलू सामान खरीदने पर वहां चीन में बने उत्पाद मिलते थे। भारत में बना कोई भी उत्पाद दुकानदार रखता ही नहीं था, क्योंकि विदेशी माल चीन के किसी शहर से चलकर, जहाज पर लदकर, भारत में सड़क मार्ग से यात्रा करने के बाद भी दुकानदार और उपभोक्ता को सस्ता पड़ता था।

उदाहरण के लिए, जब भारत में 1980 के दशक में रंगीन टेलीविज़न आया तो उस समय बहुत सी कंपनियां जैसे कि टेस्ला, डायनेमो, बुश इत्यादि यहीं पर टीवी बनाकर बेचती थीं।

फिर एकाएक बाज़ार चीन से आए सस्ते टेलीविज़न से भर गया। ओनिडा तो एक टीवी खरीदने पर एक छोटा टीवी फ्री देता था, वह भी भारत में बने किसी भी टीवी की तुलना में सस्ता।

उस समय किसी भी व्यापारी और दुकानदार को मेड इन इंडिया प्रोडक्ट की याद नहीं आई। भारतीय कंपनियों के दिवालिया होने का ध्यान नहीं आया और उन में काम कर रहे कर्मचारियों, जो अब बेरोज़गार होने वाले थे, के बारे में कोई चिंता नहीं थी।

उन्हें सिर्फ इस बात की चिंता थी कि उपभोक्ता को क्या माल चाहिए और जब उन्होंने जाना कि उपभोक्ता को सस्ता माल चाहिए तो भारत में बने माल जाए भाड़ में! वह चाहे टेलीविज़न हो, वॉशिंग मशीन हो, फ्रिज या बिजली की झालर हो।

और तो और, दीपावली के लक्ष्मी और गणेश भी चीन में बनने लगे, पटाखे चीन से, और भारत के कुम्हारों को बेरोज़गारी के संकट से जूझना पड़ा।

कई बार मैं लिख चुका हूं कि हम भारतीयों में महत्वाकांक्षा और उद्यमशीलता की कमी है। बहुत ही जल्दी शोर मचाने लगते हैं, लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं देते कि कैसे विदेशी कंपनियों को उन्हीं के खेल में मात दिया जाए।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारतीय ओयो कंपनी चीन में होटल और घरों में रूम बुक करने वाली सबसे बड़ी कंपनी बनने की तरफ अग्रसर है। यही हाल भारत के पेटीएम, भीम और रुपे एप का है जिसने वीज़ा और मास्टरकार्ड को अच्छी चुनौती दे दी है।

एक मित्र चंबल में बैठकर वहां के किसानों को रातों-रात 21 रूपए लीटर की जगह 30 रूपए लीटर की दर से A2 दूध खरीद कर उसका घी अमेरिका में बेच रहे हैं। एक अन्य मित्र अपने ही घर में मसाले बनाकर ऑनलाइन पूरे भारत में बेच रहे हैं और वे मांग के हिसाब से माल नहीं बना पा रहे हैं।

दुकानदार लोग अपने प्रतिष्ठानों में रोज़गार देने की बहुत हांकते हैं। ज़रा बताने का कष्ट करेंगे कि वह लोग दुकान में काम करने वाले ‘लड़कों’ को कितना वेतन देते हैं? न्यूनतम दर से भी कम वेतन दिया जाता है।

मेरे वृहद परिवार में दुकानें हैं और कई बार मैंने आश्चर्य किया कि उस दुकान पर काम करने वाले लड़के को मिलने वाली तनख्वाह से उस का गुज़ारा कैसे होता होगा?

और अगर 8 करोड़ दुकानों ने 40 करोड़ लोगों को सहारा दिया है तो भारत में कैसे इतनी भयंकर गरीबी हो गई? हमें तो यही बताया गया है कि आधे से ज्यादा भारतीय किसानी में लगे हुए हैं, 40 करोड़ दुकानदारी में लगे हैं। तो फिर समस्या कहाँ है?

कुछ विचार आपके समक्ष रखूँगा (इन प्रश्नों को मैं पहले भी उठा चुका हूँ); उत्तर की अपेक्षा है।

अगर पब्लिक पॉलिसी के नज़रिये से देखें तो सरकार की क्या नीति होनी चाहिए?

पहला, क्या सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उत्पादकों, व्यवसायियों और दुकानदारों को अधिक लाभ मिले या या उपभोक्ताओ को सस्ता उत्पाद मिले?

दूसरा, किस बिंदु पर उत्पादकों, दुकानदारों और उपभोक्ताओं का हित एक हो सकता है?

तीसरा, क्या सरकार नवयुवक और नवयुवतियों को छोटे और पारम्परिक व्यवसायियों को बचाने के लिए ऑनलाइन उद्यम लगाने से मना कर सकती है?

चौथा, क्या सरकार – या कोई भी राजनैतिक दल या हम स्वयं भी – डिजिटल युग में आने वाले नए इनोवेशन या खोज को रोक सकते हैं?

पांचवां, कैसे इस डिजिटल युग में विश्व भर में होने वाले व्यापारों और उद्यमों से कैसे टक्कर लेंगे, अगर हम अपने देश में ही इस युग के विकास पर रोक लगा देंगे?

छठा, कैसे ऑनलाइन विक्रेता और छोटे दुकानदार अपना काम कर सकें, साथ ही नए इनोवेशन या खोज, नए उद्यमों और नवयुवक और नवयुवतियों को भी बढ़ावा मिले?

सातवां, कुछ ही वर्षो में पेट्रोल का उत्पादन करने वाले देशों का एकाधिकार ख़त्म हो जायेगा। क्या हम गैर पारम्परिक ऊर्जा के स्रोतों का उत्पादन बंद कर दें, क्या इलेक्ट्रिक कार मार्केट में ना आने दें, क्यों कि पेट्रोल पंप के मालिक की दुकाने बंद हो जाएंगी? इलेक्ट्रिक कार में लगभग 24 मूविंग पार्ट्स या घूमने वाले हिस्से होंगे, जबकि पेट्रोल कार में लगभग 150 होते हैं। क्या कार मैकेनिक के जॉब चले जाने के डर से भारत में इलेक्ट्रिक कार ना आने दें?

सरकार ई-कॉमर्स के डिस्काउंट पर रोक नहीं लगा सकती। कुछ उदाहरण के साथ समझाने का प्रयास करते हैं।

चलिए अमेज़न तो एक विदेशी कंपनी हुई, लेकिन कल को वही अमेज़न भारत में एक सब्सिडियरी क्रिएट कर देती है जिसका मालिक एक भारतीय है। तब आप क्या करेंगे?

उदाहरण के लिए क्या कोलगेट एक विदेशी कंपनी है या भारतीय कंपनी? क्या प्रोक्टर एंड गैंबल एक विदेशी कंपनी है या भारतीय कंपनी? Suzuki एक विदेशी कंपनी है या भारतीय? Hyundai विदेशी कंपनी है या भारतीय? टाटा एक विदेशी कंपनी है या भारतीय। याद रखिए टाटा की यूरोप में कार और स्टील बनाने के भी कारखाने हैं।

और जिन ऑनलाइन कंपनियों को आप डिस्काउंट देने से मना करेंगे अगर वह कोर्ट चले गए तब?

ओला और उबेर में यात्रा, दिल्ली की काली पीली टैक्सी से सस्ती पड़ती है। क्या आप ओला और उबेर को बैन कर देंगे?

चलिए सरकार ने कहा कि 31 इंच के टीवी की कीमत यह होगी। अब कंपनी कहती है 42 इंच का TV आपको 31 इंच के दाम पर देंगे। क्या आप उसे ऐसा करने से मना कर देंगे? या फिर कंपनी कहती है कि हम आपको इसी दाम पर HD TV की जगह 4K टीवी देंगे। साथ में बढ़िया एक्सटर्नल स्पीकर भी देंगे। क्या उस पर सरकार एक्शन लेगी?

या फिर ऑनलाइन सेल फोन विक्रेता कहता है कि आप इस ब्रांड का सेल फोन खरीदेंगे तो आपको एक साल जियो का सब्सक्रिप्शन फ्री। क्या आप उस पर रोक लगा सकेंगे?

एक अन्य उदाहरण। जूता बेचने वाला कहता है कि एक जोड़ा जूता खरीदने पर एक जोड़ा जूता मुफ्त। फिर आप क्या करेंगे? या फिर एक किलो दाल खरीदने पर एक किलो चावल मुफ्त। क्या आप इसे डिस्काउंट बोलेंगे या चावल का प्रमोशन या विज्ञापन?

क्या सरकार बतलाएगी कि जूते की कीमत क्या होनी चाहिए? या फिर सेल फ़ोन की, जिसमें हर छः महीने में नया फीचर जैसे कि शक्तिशाली कैमरा, मेमोरी, फ़ास्ट प्रोसेसर इत्यादि के बाद भी दाम वही रहता है? या फिर आटे की कीमत, चाहे गेंहू शरबती हो, ऑर्गेनिक हो, या फिर बेसन और सोया का मिक्स हो? किस अनुपात में अन्य अनाज का आटा मिक्स होना चाहिए, क्या सरकार इसे निर्धारित करेगी? या फिर, अगर उद्यमी या ऑनलाइन विक्रेता पांच किलो आटे पर एक किलो बेसन फ्री में देना चाहे तब सरकार को क्या करना चाहिए?

मैं यह विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा कि कोई भी सरकार कैसा भी नियम, कानून, नीति बना ले, इस डिजिटल क्रांति के प्रभाव को नहीं रोक सकती है।

समय के साथ बदलिए और उभरते हुए भारत में नए अवसरों का लाभ उठाइए

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