समझने से अधिक जीने का दर्शन है संघ

एक समाचार पत्र में चेतन भगत का संघ पर लिखा एक लेख आया है। मैंने यह लेख उसी संदर्भ में लिखा है।

एक तटस्थ चिंतक/लेखक के रूप में संघ पर उनका लिखा लेख स्वागत योग्य कहा जा सकता है। हालाँकि संघ में जाने वाले नियमित स्वयंसेवकों के बीच भी यह जुमला बहुत प्रचलित रहा है कि ”मैं विगत 25 वर्षों से स्वयंसेवक हूँ, पर संघ को समझ नहीं पाया… तो कोई नौसिखिया क्या संघ को समझेगा?'”

दरअसल इस कथन के पीछे मंतव्य केवल इतना है कि संघ समझने से अधिक जीने का दर्शन है। जी हाँ, जीने का दर्शन!

जहाँ तक संघ में समय, संदर्भ, देश-काल, युगीन परिस्थितियों के अनुसार होने वाले बदलाव की बात है तो यह संघ के स्वयंसेवकों के लिए कोई अचरज की बात नहीं है। संघ के स्वयंसेवक भली-भाँति जानते हैं कि संघ समाज में संगठन नहीं, समाज का संगठन है। संघ के लिए हर भारतीय उसका संभावित स्वयंसेवक है।

संघ ने किसी को अस्पृश्य नहीं माना है। बल्कि देश के शीर्ष शैक्षिक संस्थानों में संघ के कार्यकर्ताओं को मैंने निकट से काम करते हुए देखा है और उन्हें लेकर उनके विरोधी विचार के लोगों की भी प्रायः यही टिप्पणी होती है कि ”आप तो अच्छे हैं, पर आप जिस संगठन के लिए काम कर रहे हैं, वह अच्छा नहीं है।”

इस टिप्पणी की असली वज़ह यह होती है कि संघ के बारे में उनकी धारणा सुनी-सुनाई बातों के आधार पर होती है। जैसे ही वे किसी स्वयंसेवक के निकट संपर्क में आते हैं, उन्हें महसूस होता है कि इनके विषय में जैसा प्रचारित किया जाता है, ये वैसे कट्टर, सांप्रदायिक, रूढ़िवादी, पुरातनपंथी तो हैं ही नहीं।

सच तो यह है कि संघ का कोई लिखित संविधान नहीं है। वह किसी एक पुस्तक के आधार पर खड़ा संगठन नहीं है। बल्कि संघ तो सनातन संस्कृति में विश्वास रखने वाला संगठन है। सनातन संस्कृति में विश्वास रखने वाला साधारण-से-साधारण व्यक्ति भी इस सत्य से भली-भाँति परिचित है कि परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। फिर संघ कैसे परिवर्तन से मुख मोड़ेगा?

संघ सदैव विवाद से संवाद और संवाद से समाधान की ओर उन्मुख रहा है। संघ ने संघर्ष में नहीं समन्वय में जीवन के सत्य का शोधन किया है। उसने किसी एक निष्कर्ष को अंतिम सत्य घोषित कर चिंतन-मनन-विचार की प्रक्रिया को कभी विराम नहीं दिया। बल्कि अपने स्वयंसेवकों द्वारा भी संघ को न समझ पाने जैसे वक्तव्य में उनका भी निहितार्थ ”नेति-नेति” ही रहा है।

सत्य या विचार-प्रक्रिया के संदर्भ में कोई भी तत्त्व-चिंतक उसे अंतिम रूप से या एकमात्र सत्य घोषित नहीं कर सकता। बल्कि वह तो न इति, न इति.. चलते जाओ, चलते जाओ… ”चरैवेति-चरैवेति” के मार्ग का ही अनुसरण करेगा।

विरोध तो तब शुरू होता है, जब कहा जाता है कि सारा सत्य जान लिया गया है, मानवता को प्रकाश देने वाली सारी चीजें खोज ली गई हैं… कि जो कुछ है वह यही एक ग्रंथ है, यही एक पंथ है, यही एक मार्ग है… कि सारे रास्ते ग़लत हैं और यही एक रास्ता सही है… कि तुम्हें भी इसी रास्ते पर चलना ही पड़ेगा।

और यहीं संघ से उन्हें आपत्ति होती है, क्योंकि संघ कहता है कि भई, तुम्हारा भी रास्ता सही हो सकता है; पर युगों के अनुभव से सिंचित यह जो जीवन-पद्धति, परंपरा, मूल्य, दर्शन आदि हैं, ये भी तो उस एक सर्वशक्तिमान की तरफ ही जाते हैं, इन्हें क्यों छोड़ रहे हो? विवाद का मूल कारण यहाँ है!

क्यों प्राकृतिक आपदाओं में संघ के स्वयंसेवक जाति-मज़हब से ऊपर उठकर निःस्वार्थ भाव से पीड़ितों की सहायता करते हैं; क्यों उनकी शाखाओं में किसी प्रकार का भेदभाव देखने को नहीं मिलता; क्यों वहाँ सत्ता-संघर्ष या अधिकार-लिप्सा का खुला खेल नहीं दिखता; क्यों उनकी शाखाओं से निकले ‘विद्या-भारती, राष्ट्र सेविका समिति, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ जैसे 50 से भी अधिक संगठन विविध सामाजिक क्षेत्रों में शीर्ष संगठन के नाते काम कर रहे हैं?

यदि ईमानदारी से इसका उत्तर ढूँढें तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि संघ सदैव समय के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने वाला संगठन रहा है, उसने हमेशा संवाद और समन्वय का मार्ग चुना है, उसने संगठन के केंद्र में व्यक्ति को न रखकर विचार, समाज और राष्ट्र को ही रखा है।

चेतन भगत अपने लेख में स्वीकार करते हैं कि ”जिस संगठन के पास 50000 से अधिक शाखाएँ, लगभग 1 करोड़ के आस-पास स्वयंसेवक, सर्वाधिक सदस्यों वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक शाखा हो, उसकी अनदेखी कैसे की जा सकती है?”

उनकी इस स्वीकार्यता में ही उनके सवालों के जवाब छुपे हैं। क्या ऐसी विश्व-व्यापी स्वीकार्यता कट्टर, सांप्रदायिक, रूढ़िवादी, पुरातनपंथी होने पर संभव है? क्यों वामपंथ जैसी विचारधाराएँ और उन पर आधारित तमाम पार्टियाँ सिमटती ही जा रही हैं और संघ है कि अबाध बढ़ता चला जा रहा है? क्या इतनी बड़ी संख्या में लोग केवल प्रतिक्रियावश किसी संगठन से जुड़ सकते हैं? बल्कि ऐसी व्यापक स्वीकार्यता तब तक नहीं पाई जा सकती जब तक आपके पास ठोस वैचारिक आधार, रचनात्मक कार्यक्रम, दूरदर्शी-युगांतकारी-समयानुकूल सोच न हो!

वे (चेतन भगत) प्रश्न उठाते हैं कि यदि हिंदू धर्म और राष्ट्र में से चुनना पड़े तो संघ का स्वयंसेवक किसे चुनेगा? अव्वल तो हिंदू धर्म और राष्ट्रवाद में कोई टकराहट नहीं है, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, सारी समस्या धर्म और मज़हब को पर्याय मानने से प्रारंभ होती है; फिर भी यदि एक स्वयंसेवक के जीवन में ऐसा कोई प्रश्न उपस्थित भी हुआ तो निःसंदेह वह राष्ट्र को ही चुनेगा।

उन्होंने अपने लेख में संघ को कुछ सुझाव भी दिए हैं, एक स्वयंसेवक के रूप में मुझे उन सुझावों के पालन में कोई आपत्ति नहीं दिखती। बल्कि संघ के अनुसार शाखा व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशाला है, संगठन ने उस शाखा-पद्धति के माध्यम से ही ऐसे हजारों-हजारों कार्यकर्त्ताओं का निर्माण किया है, जिन्होंने राष्ट्र-सेवा के लिए अपना पूरा जीवन ही अर्पित कर दिया।

यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि आज के घोर भौतिकवादी दौर में भी शाखा के माध्यम से वह ऐसे असंख्य व्यक्तियों का निर्माण कर पाया है जो राष्ट्र-सेवा के ध्येय को सर्वोच्च मानते हैं और आजीवन उस विचार-पथ का अनुसरण करते हैं।

जिस दिन संघ को लगेगा कि उसकी शाखा-पद्धति व्यक्ति-निर्माण नहीं कर पा रही है, व्यक्ति-निर्माण के उसके सत्यापित प्रयोग विफल हो रहे हैं, कि उसमें कुछ बदलाव आवश्यक हैं, वह सहर्ष बदलाव को गति प्रदान करेगा।

संघ ज़िंदा लोगों का संगठन है और ज़िंदा समूह कभी भी मृत ग्रंथों या आकाशीय संदेशों से संचालित नहीं होते। उन्हें तो समय की धड़कनों को सुनना ही पड़ेगा! पर बदलाव की यही अपील क्या उनसे भी की जा सकती है, जिनकी सारी सोच-समझ सदियों पूर्व किसी धार्मिक खूँटी पर टँगी है? या उनसे जो विचारधारा के नाम पर लाखों मासूमों-निर्दोषों का ख़ून बहाने से भी परहेज़ नहीं करते!

अब समझ आया, आपको इतना क्यों गरियाते हैं लोग

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