क्या भारत के सर्वोच्च न्यायालय के गर्भ में गृह युद्ध व राष्ट्र का विनाश पल रहा है?

सीबीआई के केंद्रीय दफ्तर में ऐसा भूचाल आया है जिसकी कल्पना नरेंद्र मोदी के साथ समस्त भारतीयों ने भी नहीं की होगी।

यह मामला वर्मा या अस्थाना का बिल्कुल भी नहीं है। यह पूरा मामला, पिछले सात दशकों से भारतीय शासन तंत्र में फलते फूलते नासूर का है।

मैं आज यह बिल्कुल नहीं कहूँगा कि मुझे यह मालूम था कि यह होगा लेकिन यह ज़रूर कहूँगा कि मैं लगातार यह कहता रहा हूँ कि मोदी सरकार का अंतिम वर्ष यानी 2018-19 का वर्ष ‘खूनी वर्ष’ होगा।

यह जो हुआ है उसको सिर्फ शासकीय तन्त्र के बहते मवाद की परिणति समझने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिये क्योंकि यह मवाद सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय के कैंसर ग्रसित ट्यूमर की आखरी स्टेज है। यह ट्यूमर भारत की न्यायपालिका की देन है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा थर्ड स्टेज में पहुंच दिया गया है।

यह सीबीआई की लड़ाई अब इसी न्यायालय में लड़ी जाएगी और मेरी आंतरिक इच्छा तो यह है कि न्यायालय इससे दूर रहे क्योंकि यदि न्यायालय ने भारत की भावनाओं को जानते हुये भी फिर तिरस्कार किया तो इस न्यायपालिका को, जो भारत की जनता के सामने नैतिक अधिकार पहले ही खो चुकी है, अपने संवैधानिक अस्तित्व को 2019 के बाद बचाने में मुश्किल होगी, जो दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

भारत की न्यायपालिका इस समय अपने गर्त में पहुंच चुकी है। वो एक बलात्कारी बिशप को 15 ही दिन में बेल दे देती है और उसके विरुद्ध मुख्य गवाह को मरने देती है। वो सबरीमाला मंदिर की हिन्दू परंपराओं को जानते बूझते दूषित करती है। वो कानून को फांसी का फंदा बनाये हुये हर हिन्दू त्योहारों की मूलभावना का दम घोट रही है।

इस न्यायालय ने पिछले कई दशकों से भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओ की संवेदनाओं को नेपथ्य में धकेल कर, केवल गांधी परिवार के संरक्षण में बने कांगी-वामी इकोसिस्टम को ही भारत समझने की भूल की है और वो ही उसके लिए घातक होने की संभावना को सत्य करती दिख रही है।

मैं आज देख रहा हूँ कि भारत के हिन्दुओं का बड़ा वर्ग, शताब्दियों की नपुंसकता से जाग्रत हो कर, इस न्यायपालिका की अवहेलना करने को तत्पर हो रहा है। आज हिन्दू, लोकतंत्र से बंधी सभी मर्यादाओं व शीलता को भंग कर, इन न्यायाधीशों को भारत व उसके हिंदुत्व के विनाश करने के प्रयास का दोषी मान रहा है।

मुझे इस बात का पूरा संदेह है कि आलोक वर्मा की याचिका को सर्वोच्च न्यायालय में समर्थन मिलेगा। वो अपने 2 वर्ष के कार्यकाल को पूरा करने तक, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई के निदेशक बनाये रखे जायेंगे, जो न सिर्फ लोकतांत्रिक व्यवस्था बल्कि संवैधानिक संकट को खड़ा करेगा।

मैं न्यायालयों के अमर्यादित, भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी व हिंदुहन्ता न्यायाधीशों से आग्रह करूँगा कि भारत पर वे जो लगातार कुठाराघात कर रहे है, उन्हें आज से करीब 160 वर्ष पूर्व, हेनरी नॉक्स द्वारा लिखा हुआ यह वक्तव्य अवश्य पढ़ना चाहिये –

“Something is wanting, and something must be done, or we shall be involved in all the horror of failure, and civil war without a prospect of its termination.”
@Henry Knox

इसका हिंदी में अनुवाद कुछ इस तरह है कि, “हमारे पास सिर्फ आज का ही वक्त है, जब गलतियों को सुधार सकते है, अभी भी वक्त है कि सम्भल जायें, नहीं तो नैराश्य की भयानकता में गलती करते हुए, हम सब गृहयुद्ध की तरफ चले जायेंगे, जिसको रोकना असंभव हो जायेगा।”

19वीं शताब्दी के मध्य में, अमेरिकी गृहयुद्ध से पहले, हेनरी नॉक्स के निकले यह अल्फ़ाज़, आज डेढ़ शताब्दी बाद, भारत के वर्तमान की बानगी कह रहे हैं। मुझे लगता है कि आज केंद्र की वैधानिक रूप से निर्वाचित, संघीय ढांचे की सरकार का, कांगी-वामी गिरोह और विदेशी शक्तियों के गुलामों की ढाल बनी न्यायपालिका द्वारा बार बार तिरस्कार, गिद्धों और सियारो को न्योता देने वाला साबित हो सकता है।

जबसे केंद्र में भारत की प्रथम राष्ट्रवादी सरकार आयी है तब से, भारत के संघीय और संवैधानिक ढांचे को चरमरा कर, भारत को घुटने के बल लाने का यह प्रयास आक्रमक होता जा रहा है। यह एक अंतराष्ट्रीय एजेंडा है, जिसे सर्वोच्च यालय के न्यायाधीशों से संरक्षण प्राप्त, भारत के कांगी-वामी गिरोह को ढाल बनाकर, वैटिकन चर्च, चीन, वहाबी इस्लाम और भारत को सिर्फ बाज़ार बनाये रखने वाली शक्तियां, सहभागिता में आगे बढ़ा रही है।

इन शक्तियों के आंतरिक सहायक, भारतीय वामपंथी, कांग्रेसी और विदेशी पैसों से पलने वाले मानवतावादी और बुद्धिजीवी हैं, जो अपनी छद्म बुद्धिजीविता के विकार से उत्पन्न, अहम और दम्भ में, हिंदुत्व के प्रतीकों पर प्रहार व देश द्रोह को सामाजिक प्रतिष्ठा और मान्यता दिलाने की भूल कर बैठे हैं।

इसमें कभी भी कोई दो राय नहीं हो सकती है कि कोई भी राष्ट्र, गृहयुद्ध कभी भी नहीं चाहता है। वह हर संभव प्रयास कर, उसको टालना चाहता है लेकिन जब उसकी पदचाप, संवैधानिक दीवारों के अंदर सुनाई पड़ने लगती है और उसके तलवे तले, राष्ट्र के बहुसंख्यकों का अस्तित्व चरमराने लगता है तब राष्ट्र, चाह कर भी उस गृहयुद्ध से वापस नही लौट सकता है।

क्या भारत के सर्वोच्च न्यायालय के गर्भ में गृह युद्ध व राष्ट्र का विनाश पल रहा है?

हमें निर्णय यह लेना है कि राष्ट्र सर्वोपरि है या अहिंसा, सत्य और न्याय?

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