ना आरक्षण चाहिए, ना अलग प्रदेश! सबकुछ अपने स्वावलंबन से पाने की ज़िद!

अब्दुल्ला : कहते हैं कि जब नील आर्म स्ट्रांग ने चाँद पर पैर रखे तो उसे अजान की आवाज सुनाई दी थी, मतलब वहां मस्जिद थी और सबसे पहले मुस्लिम पहुंचे थे!

सिन्धी : वहां हम लोगों की किराना दुकान को देख कर ही मस्जिद बनी होगी, नहीं तो अब तक पत्थरों से ही रोज़ा खोल रहे होते।

बात मज़ाक की है, लेकिन सच भी है। यह बिग बाज़ार, मॉल, सब बहुत बाद में आये। सबसे पहले आई सिन्धी भाइयों की परचून दुकानें।

जो समस्त भारत, तमाम गाँव शहरों के हर गली मुहल्ले में किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के चेन स्टोर की तरह आज भी फल फूल रही हैं।

छोटी सी जगह में बेतरतीब माल ठुंसा हुआ, जो मांगो वह उपलब्ध, छोटी मोटी मेडिसिन से लेकर रिचार्ज तक, तोप से लेकर सुई तक! लेकिन मजाल हैं कि किसी सिन्धी दुकानदार को सुई खोजने की भी ज़हमत करना पड़े, एक ही बार में हाथ डाल कर वही चीज़ निकालना जो ग्राहक ने माँगी, अद्भुत होल्ड रहता उनका।

मेमोरी भी गजब रहती, बेशक उसका इस्तेमाल वह पढाई लिखाई में कम ही करते लेकिन धंधे की हर छोटी छोटी जानकारी उनके मुंह जुबान पर फिट रहती, उन्हें माल क्या बुलाना हो से लेकर किस से कितना उधार वसूलना हो तक!

1947 के विस्थापन में सिन्धी समाज भी लुट पिट कर सिंध से आया और जिसे जहाँ ठिकाना मिला वहां बस गया। बसा तो फिर ऐसे बसा कि हिंदुस्तान की आत्मा में रम गया।

बिना किसी शिकवे शिकायतों के, बिना किसी बवाल के चुपचाप अतीत के कड़वे दौर को भुला कर नई राह गढ़ते गया। ना उन्हें आरक्षण चाहिए, ना उन्हें अलग प्रदेश चाहिए, न कभी किसी साम्प्रदायिक दंगों में शामिल, न सरकार के विरोध में कोई आन्दोलन! कुछ नहीं चाहिए, सब कुछ अपने स्वालंबन से हासिल करने की ज़िद!

इनमें बचपन से धंधा करने की नैसर्गिक काबिलियत होती हैं, और गज़ब मेहनत और जोखिम से धंधा करते हैं। स्कूली जीवन में सुबह 4 बजे से शहर के बाहर दौड़ लगाने जाते थे हम कुछ मित्र। तब मैं हमउम्र सिन्धी लड़कों को साइकिल पर खूब माल लाद कर जाते हुए देखता।

एक दिन बातचीत से पता चला कि वह 25 किलोमीटर तक यह पोंगे बेचते हुए जाते जिसकी कीमत तब 5 पैसे प्रति नग थी! मैं सोच कर हैरान रह गया कि इसमें इन्हें कितना बचता होगा जो इतनी हाड़तोड़ ठण्ड में जाते हैं। लेकिन बड़ा होने पर और बहुत से सिन्धी मित्रों संग उठने बैठने से पता चला कि यह कम मार्जिन में ज्यादा खपत से कैसे धन कमाते हैं, का सबक था।

इनका सोचना यह है कि अगर हज़ार रूपये में शक्कर की बोरी खरीदी और उसे प्रतिद्वंदिता में हज़ार रूपये में ही बेचना पड़े, तब भी खाली शक्कर की बोरी उनके पास प्रॉफिट के रूप में बच जाती हैं। सोचिये कितनी सकारात्मकता से धंधे में उतरते हैं यह धन कमाने।

मुस्लिम बहुल क्षेत्र में कोई आम हिन्दू दुकान डालना पसंद नहीं करता लेकिन वहाँ भी सिन्धी भाई डंके की चोट पर अपनी दुकान चलाता और उन लोगों से कम्पीटीशन करता! इस बारे में मेरे एक सिन्धी मित्र से पूछा कि उनके इलाके में कैसे टिक जाते हो तो उसने मुस्कुरा कर कहा था, ज़रूरी नहीं सामने वाले को ज़हर देकर ही मारा जाए, गुड़ दे कर भी मारा जा सकता हैं!

सेल्यूट सिन्धी भाइयों को, जियो सिंध के लाल।

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