विषैला वामपंथ : सावधानी ही बचाव है

सर्दियाँ आ रही हैं। सर्दी ज़ुकाम से बच कर रहिए। फ्लू तो सभी जानते हैं। इन्फ्लुएंजा भी कहते हैं इसे। हर साल होता है। नाम ही बस लंबा चौड़ा है। है यह बस सर्दी-ज़ुकाम।

पर हर फ्लू सिर्फ सर्दी ज़ुकाम नहीं होता। बीच बीच में यह खतरनाक रूप ले लेता है। कभी आप सुनते हैं स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू… ये सब भी फ्लू ही हैं। पर जब इनका एपिडेमिक फैलता है तो इससे बहुत लोग मरते हैं।

फ्लू का वायरस म्युटेशन से अपना रूप बदलता रहता है। इसे एन्टीजेनिक ड्रिफ्ट कहते हैं। इसलिए हर साल फ्लू के नए स्ट्रेन आ जाते हैं और आपकी इम्युनिटी उसके विरुद्ध काम नहीं करती। इसलिए फ्लू का वैक्सीन हर साल लेना पड़ता है। जब तक पॉपुलेशन में उसकी इम्युनिटी बढ़ती है, अगले सीज़न में अगला स्ट्रेन आ जाता है।

लेकिन बीच बीच में इस वायरस में बड़े परिवर्तन आते हैं, जिसे एन्टीजेनिक शिफ्ट कहा जाता है। तब यह फ्लू अपने खतरनाक रूप में पूरी दुनिया में फैलता है। इसे पैन्डेमिक (pandemic) कहते हैं।

अभी तक दुनिया में कई इन्फ्लुएंजा पैन्डेमिक हो चुके हैं जिसमें करोड़ों लोग मरे हैं। सबसे खतरनाक पैंडेमिक 1918 में फैला था जिसमें पूरी दुनिया में पाँच से दस करोड़ लोगों के मरने का अनुमान है।

वैसे भी हर वर्ष पूरी दुनिया में तीन से छः लाख वयस्क इन्फ्लूएंजा से मर जाते हैं। इसमें बच्चों के मरने का आंकड़ा शामिल नहीं है क्योंकि वह मुझे आसानी से नहीं मिला। कमज़ोर इम्युनिटी के लोग, वृद्ध, फेफड़े की बीमारियों से ग्रस्त लोग इसके ज्यादा शिकार होते हैं।

फ्लू की बात क्यों कर रहा हूँ? यह साल 1918 के इन्फ्लुएंजा पैंडेमिक की 100वीं वर्षगांठ है। यही वह काल था जब रूसी क्रांति भी पनप रही थी। तब दुनिया ने एक और पैंडेमिक देखा था जिसे कम्युनिज़्म कहते थे।

फ्लू और वामपंथ में और भी बहुत सी समानताएँ हैं। वामपंथ भी नित नए रूप बदलता रहता है। दुनिया को रूसी क्रांति और माओवाद जैसे बड़े पैंडेमिक याद हैं जिसमें करोड़ों लोग मारे गए थे… पर इसके छोटे छोटे एपिडेमिक पूरी दुनिया में फैलते रहते हैं और उसमें भी हर साल लाखों लोग मारे जाते हैं। पर उनकी गिनती नहीं होती, वामपंथ के खूनी इतिहास में वे सर्दी-ज़ुकाम जैसे ही गिने जाते हैं।

वामपंथ वैचारिक फ्लू है, पर इसका सीज़न सदाबहार होता है। यह नए रूप लेकर आता है और हमें धर दबोचता है। किसी को इसका आर्थिक पक्ष आकर्षित करता है, किसी को सामाजिक पक्ष, किसी को बौद्धिक पक्ष।

वामपंथी विचार हमारे आसपास बड़ी ही मासूम शक्लों में घूमता रहता है, और हम अनजाने ही उनसे संक्रमित होकर छींकने लगते हैं. और हम इसे बीमारी भी नहीं गिनते।

पिछले कुछ दशकों में इस फ्लू के कई नए स्ट्रेन हमारे बीच पनप रहे हैं। बौद्धिकवाद, उदारवाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे कुछ हल्के फुल्के स्ट्रेन निकलते हैं। फिर उन्हीं में मेजर एन्टीजेनिक शिफ्ट होता है और नए ज़हरीले स्ट्रेन निकल कर आते हैं और फैलने लगते हैं।

नारीवाद ऐसा ही एक खतरनाक स्ट्रेन है जो आता तो है स्त्री के अधिकारों की मासूम सी शक्ल में, लेकिन लाखों परिवारों को तबाह करके चला जाता है। और चूंकि इसकी शक्ल इतनी मासूम है कि हम इसे सर्दी-ज़ुकाम से ज्यादा कुछ नहीं समझते।

विदेशों में यह चाइल्ड-प्रोटेक्शन की शक्ल में आया है और परिवार में बच्चों पर माता-पिता और शिक्षकों की अथॉरिटी को नष्ट कर गया है। बच्चों और किशोरों में इसने यौन-शिक्षा के रूप में हमला किया है और समाज की नैतिकता और मर्यादा को बर्बाद कर दिया है।

सीज़न आने से फ्लू हर किसी को पकड़ता ही है। ज्यादातर लोगों में दो-चार दिन रहकर चला जाता है। पर जिनकी बौद्धिक और सांस्कृतिक इम्युनिटी कम होती है उन्हें यह बहुत बुरी तरह प्रभावित करता है। उनके संस्कारों को, सभ्यता को, आत्म-सम्मान को नष्ट कर देता है।

पर बहुत से मित्र हैं जो सामान्यतः वामपंथी नहीं होते पर किसी एक विषय पर इस वायरस के प्रभाव में आ जाते हैं, और कहीं नास्तिकता, कहीं उदारवाद, कहीं नारीवाद छींकने लगते है।

सभ्यता तो कहती है, छींक आये तो नाक पर रुमाल रख कर छींकिये। यूँ ही नाक सुड़कते हुए इधर उधर मत फैलाइये। पर सच्चाई यही है कि इतना हाइजीन हमारे समाज में है नहीं। वैचारिक हाइजीन भी नहीं है। तो लोग यूँ ही छींकते, खांसते, नाक सुड़कते मिल जाते हैं। उन्हें पता भी नहीं होता कि उन्हें फ्लू हुआ है। कहते हैं, कल शादी में आइसक्रीम खाई थी, सर्दी लग गई है।

क्या करेंगे? कितनों को दूर भगाएंगे? ज़ुकाम है, दो चार दिन में चला जायेगा। उन्हें धकिया के भगाने की आवश्यकता शायद ना हो। धैर्य रखिये, उसमें से कई लौट आएंगे। अगर अच्छा, साफसुथरा एक रूमाल हो पास में तो पकड़ा दीजिये… भाई! ले, रूमाल में छींक।

कोई अच्छे तर्क हों तो इज्जत से दे दीजिए। लेना होगा तो ले लेगा, नहीं तो दो चार दिन दूरी बना के रखिये। उसका पिछला रिकॉर्ड भी ध्यान में रखिये, कि उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक इम्युनिटी कितनी है। हाँ, अगर कोई बिल्कुल निरा वामिया ही हो, जिसकी आत्मा वेंटिलेटर पर टंगी हो तो अलग बात है। उसे जाने दीजिए… हर मरीज़ नहीं बचता, हम डॉक्टर भी जानते हैं।

यह एक सामाजिक हाइजीन का भी प्रश्न है। वामपंथ के नए नए प्रयोगों पर नज़र रखनी होगी, उसका अध्ययन करते रहना होगा। नई पीढ़ी को आगाह करते रहना होगा।

इंग्लैंड में नए स्ट्रेन को ध्यान में रखकर हर साल नई वैक्सीन आ जाती है। उसका अध्ययन यहाँ माइक्रोबायोलॉजिस्ट करते रहते हैं। हमारे हस्पताल में आकर सीज़न के शुरू में ही सभी हेल्थ प्रोफेशनल्स को वैक्सीन दे दिया जाता है। मैं तो हर साल ले लेता हूँ। तो इतनी सर्दी पड़ती है यहाँ, लेकिन आठ साल में एक बार भी ज़ुकाम नहीं हुआ। सावधानी ही बचाव है।

दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य है वामपंथी पॉलिटिकल करेक्टनेस

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