शरद पूर्णिमा : महारास रहस्य

मित्रों आज शरद पूर्णिमा है। आज का दिन हम कृष्ण के गोपियों संग किये गए महारास की याद में उत्सव पूर्वक, उत्साह पूर्वक मनाते हैं। इस दिन चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट एवं सोलह कलाओं से युक्त होता है।

भगवान श्रीकृष्ण चन्द्रवँशी है और चंद्र सोलह कलाओं में पूर्ण होता है अतः कृष्ण अवतार को सोलह कला युक्त कहा गया। भगवान श्रीराम सूर्यवंशी है और सूर्य बारह कलाओं में पूर्ण होता है अतः राम अवतार को बारह कला युक्त कहा गया।

मान्यता है कि इस दिन चन्द्रमा से अमृत की बारिश होती है। सूर्य से निकलने वाली किरण चन्द्रमा से परावर्तित होते समय अपनी ऊष्मा चन्द्रमा पर ही छोड़ कर पृथ्वी पर आती है। ये किरणे ही तो वह अमृत है। अग्नितत्व के दो गुण, ओज और ऊष्मा। ऊष्मा गुण अन्न को परिपक्व करता है और ओज गुण औषधी और प्राण तत्व को। प्रकृति में ऊष्मा गुण की उपस्थिति में ओज गुण क्षीण रहता है।

शरद पूर्णिमा को चंद्रमा पृथ्वी के निकट रहता है। वहाँ से परावर्तित होकर आ रही ऊष्माहीन और ओजपूर्ण किरणे पृथ्वी के हर जीव वनस्पति की प्राण ऊर्जा में वृद्धि करती है। आप इसके अधिकतम सम्पर्क में रहकर साल भर की प्राण ऊर्जा पा सको, इस हेतु बारह बजे रात तक छत पर खीर ठंडी करने फिर खाने की व्यवस्था करी गई है।

यूं इतना विज्ञान किस किस को समझा पाओगे सो अमृत और खीर से जोड़ दिया। मैं तो इस रात अपना बिस्तर छत पर ही लगाता हूं, देर रात तक जब तक नींद न आये लेटे-लेटे चन्द्रमा को निहारने से मन को सुकून मिलता है। क्यों न मिले मन का कारक ग्रह चन्द्रमा ही तो है।

महारास…

श्रीमद भागवद के दशम अध्याय से ही महारास की कथा निकली है। इस अध्याय पर आकर ही परीक्षित का वैराग्य रूपी चन्द्रमा पूर्णता एवं अमृत्व को प्राप्त करता है। जीव का ब्रह्म में समर्पण ही महारास है।

सनातन विरोधियों को यह जान कर निराशा होगी कि भगवान श्रीकृष्ण ने यह रासलीला मात्र आठ वर्ष की उम्र में रचाई थी।

शुकदेव ने परीक्षित को पिछले नव अध्याय में सभी रसों जैसे बाल लीला के वात्सल्य, कंस वध के वीर आदि से दीक्षित किया। लेकिन परीक्षित को वैराग्य नहीं आया तब कृष्ण प्रेम अमृत से लबालब यह अध्याय कहा, जिससे परीक्षित को ज्ञान के सोलह कला एवं मोक्ष रूपी अमृत युक्त पूर्ण चन्द्र के दर्शन हुए।

जब कृष्ण ने बाँसुरी के के तीन छिद्र अपनी तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से दबाकर सरगम छेड़ी तो बताते हैं कि पूरी सृष्टि मोह व समर्पण ग्रस्त हो गई। बेलें वृक्षो पर लिपट गई, नदियां अपनी मर्यादा तोड़ किनारों को आलिंगन में लेने लगी, आकाश धरती की और झुकने लगा मोर नृत्य करने लगे, गोपियां सुध बुध खोकर कृष्ण के पास जा पहुंची।

कृष्ण ने जितनी गोपियां उतने ही रूप रख रास नृत्य किया.. आदि हज़ारों रूपक से कथा को सजाया गया। काम का सदुपयोग इंद्रिय सुख से हटा ईश्वरीय तत्व की प्राप्ति के लिए स्थापित किया। भक्ति मार्ग द्वारा प्रेम में डूब कर वैराग्य प्राप्त करने का रास्ता दिखाया। घृणित काम को ईश्वर प्राप्ति का साधन बनाया।

कृष्ण की तीन उंगलिया…

प्राण, प्रज्ञा और तेज ही कृष्ण की तीन उंगलिया हैं, जो इस सप्तछिद्र युक्त शरीर रूपी बांसुरी के सुरों को साधती है।

जीव का शरीर ही वह बाँसुरी है जिसमें सात छिद्र दो नेत्र, दो कर्ण, दो नासिक, एक मुख के रूप में होते है। गुदा और लिंग के छिद्र ग्रहण नहीं त्याग के लिए बने है अतः उन्हें इन सात में स्थान नहीं मिला।

जब जीव प्राण, प्रज्ञा और तेज रूपी अंगुलियों को साध कर इनसे इस शरीर रूपी बाँसुरी के सातों छिद्र नियमानुसार दबा एवं खोल कर सरगम छेड़ता है तब यह सरगम हज़ारों गोपियों अर्थात इंद्रियो एवं इनकी वृत्तियों को संसार भुलाकर कृष्ण (ब्रह्म) के साथ महारास करने को मजबूर कर देती है।

हर इंद्री तब सिर्फ संसार के हर दृश्य में कृष्ण को ही देखती है, कृष्ण नाम ही सुनती है, कृष्ण की ही सुगंध लेती है, कृष्ण का ही स्वाद पाती है, तब उनकी समस्त निजी क्रियाएं भी कृष्ण के लिए हो जाती है। वो खाती है तो कृष्ण के लिए, रोती है तो कृष्ण के लिए, हसंती है तो कृष्ण के लिए। हर साँस कृष्ण की हो जाती है। खुद का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। सिर्फ कृष्ण का ही आस्तित्व बचता है।

मै हूं तो हरि नाही हरी है तो मैं नाही।
प्रेम गली अति सांकरी या में दो न समाही।।

साधक के जीवन का ईष्ट के प्रति यह समर्पण, प्रेम की सर्वोच्च अवस्था ही तो गोपीयों का कृष्ण के साथ महारास है। जब साधक के जीवन में यह ब्रह्म से एकाकार घटने का क्षण आता है तभी शुद्ध ज्ञान रूपी पूर्ण चन्द्र, मोक्ष रूपी अमृत बरसाता हुआ इस महारास का साक्षी होता है। जब प्रेम पूर्णता पर पहुँचता है ठीक तभी मीरा कृष्ण तत्व में विलीन हो जाती है। यह महारास है।

मित्रो महारास एक अत्यंत दुर्गम विषय है।

परीक्षित भाग्य शाली थे जो उन्हें शुक्रदेव जी समझाने के लिए मिले। लेकिन हम अभी परीक्षित बनने से बहुत दूर है। परीक्षित आसन्न मृत्यु जो सातवे रोज (सप्तमं कालरात्रि ) सर्प (काल ) द्वार डसे जाने से होना तय थी.

मेरी बुद्धि अनुसार जैसा मैंने लिखा है, महारास उससे कई कोटि गुणा गूढ़ है।

मेरा पात्र जितना बड़ा था मैं उतना ही श्रीकृष्ण लीला अमृत भर पाया। यानी समुद्र में से सिर्फ एक प्याला। अतः सभी विचारकों को अपने पात्र अपने दृष्टिकोण से भरने की गुंजाइश बाकी है। फिर भी यह समुद्र खाली न होगा। वस्तुतः किसी एक विचारक का पात्र इतना बड़ा है ही नहीं, जो समग्र समुद्र को समेट ले। अतः आपके दृष्टिकोण और मेरे दृष्टिकोण में यदि अंतर आता है, तो यह स्वभाविक होगा जिससे मेरा कोई विरोध नहीं होगा।

यह लेख मैंने अपने मन के भाव एवं क्षुद्र बुद्धि से लिखा है, अतः आपके अनुसार कुछ अलग भाव भी हो सकता है। मेरा आपके भावार्थ से किसी प्रकार का विरोध नहीं है।

सभी मित्रों को शरदपूर्णिमा की बधाई।

शरद पूर्णिमा की चांदनी रात को इश्क़ भी हो जाता है अमृत

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