सबरीमला पर समानता का दुराग्रह

कल इस विषय पर दुबारा लौटा क्योंकि अदालत के अतिक्रमणीय आदेश के विरुद्ध चल रहे हस्ताक्षऱ अभियान का कुछ लोगों ने विरोध कर दिया। उनके मतानुसार सबरीमला में उम्रविशेष की स्त्रियों का प्रवेश निषेध अधोगामी या पतनशील है।

ऐसे तर्क का प्राकट्य प्राय: वहां से होता है जहां लोग स्वयं को महान और मुक्त हिन्दू मानते हैं, कम से कम इस भ्रम में तो अवश्य ही रहते हैं कि हिन्दू धर्म के बारे में उनके विचार अंतिम और प्रामाणिक सत्य हैं।

और आश्चर्य तो यह कि ऐसे तर्क वहीं से अधिक दिये जाते हैं, जहां सबरीमला के विधान, व्रत, पूजनपद्धति के बारे में पूर्ण अनभिज्ञता है।

यानी, ऐसे लोग जो आज तक सबरीमला नहीं गए, जिन्होंने कभी देखा भी नहीं कि आखिर वह व्रत क्या है, वे ही हाय हाय कर रहे।

विस्मय तो यह कि जिस केरल में यह प्रथा सदियों से चल रही है, वहां की स्त्रियां लाखों की संख्या में रो कलप रही हैं, धरती पर लोट रहीं हैं कि हमें अपने विधान के साथ रहने दो। अयप्पा स्वामी हमें वैसे ही पूज्य हैं, आत्मस्थ हैं, जैसे अब तक रहे हैं। हमें नहीं करना मंदिर में प्रवेश।

परंतु अपने स्तन पर तरबूज लटकाकर फोटो चिपकाने वाली ललनाओं में हठात ही धार्मिक कर्तव्यबोध का जागरण हुआ है, वे कहती हैं रजस्वला हैं तो क्या..? रक्तरंजित पैड पहना है तो क्या… हम तो जाएंगी मंदिर..!!

ध्यान रहे कि केरल का समाज मातृसत्तात्मक है। यहां से चिल्ला रहे ज्ञानियों ने अपने समाज में जितनी आज़ादी स्त्रियों को दी है, उससे दस गुणा अधिक आज़ादी और समानता उन्हें वहां प्राप्त है। वे साक्षरता में भी आप से आगे हैं परंतु दुर्भाग्य देखिए कि उन्हें मंदिर में जबरन घुसने का ज्ञान प्राप्त न हो सका..! कितनी मूर्खाएं हैं वे… क्यों ?

तो, हमारे ज्ञानी बंधु उन तरबूजधारिणियों के साथ खड़े होते हैं। अहा… रज न हो तो संतानोत्पत्ति ही कहां हो सकती है..! इसलिए रजस्वला स्त्रियां तो सबसे पवित्र हैं!! उन्हें यह अधिकार मिलना ही चाहिए! आप तो मूर्ख ठहरे जो अब तलक अपने घरों के मंदिर से भी दूर रहीं, रसोई से दूर रहीं!! आप विमूढ़ हैं!!!

कल कोई पुरुष रजस्वला स्त्रियों के साथ संभोग के अधिकार पर अदालत जा सकता है… क्यों नहीं? उसकी इच्छा है! कितना तो सुंदर है यह..!! क्यों, ग़लत कहा क्या ?

समानता का यह अधिकार कुछ वैसा ही है जैसा कि दो हाथों में से दाहिने हाथ से भोजन करने पर प्रश्न उठा देना। अरे यह तो बाएं हाथ के साथ अन्याय है। आज से मैं उसे भी यह अधिकार दूंगा। अब मैं एक वक्त बाएं हाथ से खाऊंगा और दूसरे पहर दाहिने हाथ से। शरीर का साम्यवाद कायम होगा और इसी तरह हम शौच के बाद पिछवाड़ा प्रक्षालन के लिए बाएं नहीं दाएं हाथ का प्रयोग करेंगे। आखिर उसे क्यों इस महान कार्य से वंचित कर दिया जाए।या फिर शौच के बाद धोना जरूरी ही क्यों है, अंग्रेज़ तो कागज़ से पोछ लेते हैं। इस तरह जलबचाव भी होगा। वह विष्ठा है तो क्या.. है तो भोजन का ही अपशिष्ट पदार्थ!

या यज्ञोपवीत सिर्फ बालकों का क्यों… बालिकाओं का क्यों नहीं? उनका भी सिर मूंड़कर जनेऊ पहनाया जाना जरूरी है। अब वे पूजा पाठ इत्यादि भी करवाती हैं अत: उन्हें अर्धनग्न होकर या अपने खुले वक्षों के साथ पंडितों की तरह उत्तरीय धारण कर कर्मकांड करना चाहिए! आखिर बात समानता की है भाई…

केरल के महान वामपंथी मूर्खमंत्री कहते हैं कि अयप्पा नैस्टिक ब्रह्मचारी थे तो उनका पुजारी भी वही हो..! यह अदना सा आदमी पूछता है.. आप कौन होते हैं यह बताने वाले कि पुजारी कैसे हों..? यह तो मंदिर तय करेगा। केरल का हिन्दू समाज तय करेगा। आप तो वैसे भी कहने को हिन्दू भर हैं। आपके त्रिदेव तो मार्क्स, लेनिन और स्टालिन हैं। आप उनकी सुध लें साहब !

तर्क यह कि किसी देवता ने नहीं कहा मेरा मंदिर बनाओ… तो मंदिर क्यों बनाया? राम ने भी नहीं कहा, कृष्ण ने भी नहीं कहा, बुद्ध ने भी नहीं कहा मगर उनके भक्तों को लगा कि मंदिर बनना चाहिए तो उऩ्होंने मंदिर बनवाए। कोई अवतारी नहीं कहते, यह तो लोग कह देते हैं। इस पर हमारा क्या वश..? आपका वश चले तो ध्वस्त करवा दीजिए सारे मंदिर… गजनवी को बुलावा भेजिये। वे इस कार्य में दक्ष हैं।

तर्क यह कि तीन तलाक पर भी औरतों ने शरिया का समर्थन किया। हे प्रभु… तीन तलाक और सबरीमला एक हैं! वह तो सदियों से प्रताड़ना का औज़ार है और सच्चे अर्थों में पतनोन्मुख परंपरा है। उसमें तो एक क्षण में किसी स्त्री को उसके लोक से बहिष्कृत कर दिया जाता है। उसकी सारी निधि, उसका सारा आत्माभिमान एक क्षण में नष्ट! वह तो संबंध से ही शून्य कर दी जाती है। मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना अलग। वह तो खत्म होना ही चाहिए…

यहां किसी स्त्री को मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना नहीं है। उन्होंने सहर्ष इसे चुना है। यह केरल की जनता का विशेष धर्माधिकार है। उनकी निजता का प्रश्न है। अयप्पा की पूजा वे कैसे करेंगीं यह तय करना उऩका काम है। किसी बिहारी, बंगाली और राजस्थानी का नहीं।

करणी माता की पूजा का दिशानिर्देश केरल से जारी नहीं होता। अयप्पा उनके अधिष्ठाता देव हैं, वे उनके लिए कलपते हैं उन्हें छोड़ दो… कोई न्यायालय इसमें अपनी नाक नहीं घुसेड़ेगा। और सिर्फ हिन्दुओं के ही धार्मिक विधान में वह क्यों दखल देगा..?

सबरीमला मंदिर : अब तो हाकिम साब ही हमारे भगवान हैं!

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