देश के बौद्धिक, वैचारिक पोषण के बारे में तीव्र चिंता करने का समय आ चुका जानिए

15 की उम्र तक मैं घनघोर नास्तिक था। ना ईश्वर को मानता था, न पूजा, प्रार्थना में विश्वास रखता था।

सौभाग्यवश मैं चिन्मय मिशन की युवा शाखा चिन्मय युवा केंद्र से जुड गया। आरंभ में मटरगश्ती के लिए ही सही, पर जुडे रहने से कुछ भारतीय संस्कृति की झलक मुझे मिलने लगी।

चिन्मय मिशन से हमारे शहर आनेवाली पहली व्यक्ति पूज्य ब्रह्मचारिणी स्मृति चैतन्य जी (अब स्वामिनी विमलानंद जी) थीं। हमारी आयु से कुछ ही वर्ष बड़ी, फर्राटेदार अंग्रेज़ी झाडने वाली, आर्किटेक्चर पढी हुई और उनकी ओर उछाले गए हर प्रश्न का तर्कसंगत उत्तर देने की क्षमता रखनेवाली, फिर भी सादे सूती पीले वस्त्र परिधान करती वह युवती बड़ी प्रभावशाली प्रतीत हुई।

जब प्रश्नोत्तरों का समय होता तो बडा मजा आता! बड़े बूढे जब प्रश्न पूछते तो ब्रह्मचारिणी जी को “अम्मा” कह पुकारते! मैं मन ही मन हंसता कि अरे वह तो आप के पोती के आयु की हैं! आप की अम्मा वह कैसे होने लगी!

और अम्मा भी अपनी आयु के विपरीत उनसे ऐसे पेश आतीं जैसे वे वाकई उन की संतान थे! बुजुर्गों की आयु का लिहाज और आदर था ही, पर एक अधिकार का भाव भी था, जो उनके आध्यात्मिक गुरु और मार्गदर्शक होने के अनुरूप था।

और जब कार्यक्रम समाप्त होता तो सभी भाविक जनों में एक होड़ सी लगी रहती, कि कौन पहले जा कर उनके पैर छूता है! एक पच्चीस छब्बीस के अवस्था की आधुनिक परवरिश की वह लड़की किसी वृद्धा द्वारा पैर छुए जाने पर कहीं सकुचाई नहीं दिखी। केवल आंखें मूंद कर हाथ जोड कर “नारायण” कहतीं अभिवादन का प्रत्युत्तर देतीं।

हम निठल्ले पहले तो अभिवादन तक करने में सकुचाए रहे। लेकिन बाद में उन का आध्यात्मिक अधिकार देखते हुए पैर छूने में सहजता पाने लगे।

जब और लोगों को और मिशन के ब्रह्मचारीगण तथा संन्यासियों को समीप से देखने का अवसर मिला तो जाना कि उनका ज्ञान, त्याग और समाजसेवा में योगदान देखा जाए तो किसी भी आयु के गृहस्थ व्यक्ति को उनके पैर छूने में हिचकिचाना नहीं चाहिए।

बाद में मेरे ही आयु के, साथ पढे, हंसी ठिठोली किए युवक-युवती मिशन के कार्य में समर्पित हुए। कुछ समय बाद उनके व्यक्तित्व में धर्म और समाज की सेवा से जो तेज निखर आया, उसे देख कर गीता का वह श्लोक याद आता है जिसमें अर्जुन विश्वरूप दर्शन के बाद भगवान् श्रीकृष्ण से हाथ जोड़, आंखों में आंसू लिए कहता है, कि ‘आप को सखा मान कर मेरे से आप के साथ अब तक हुए व्यवहार में जो धृष्टता हुई है, उसके लिए आप मुझे क्षमा करें!’

आज उनके पैर छूने में मुझे संकोच नहीं, बल्कि असीम आनंद मिलता है। आज 47 वर्ष की आयु में चिन्मय मिशन या किसी अन्य संस्था से संबंधित किसी उप-न्यास में जाऊँ तो हो सकता है मेरे बेटे की उम्र का कोई साधु वहां उपदेश कर रहा हो।

21 की आयु में गीता पर गहन विवेचन कर संजीवन समाधि लेनेवाले संत ज्ञानेश्वर की भूमि का मैं वासी, मुझे पैर छूने के लिए आयु नहीं, अधिकार देखना चाहिए, इस बात का ज्ञान है। पर दशकों से सारे भारतवर्ष में खबरें देने के लिए घूमनेवाले एनडीटीवी का इस बात से अनभिज्ञ होना आश्चर्य की बात है।

कल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमण सिंह ने विधानसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल करते हुए वहां उपस्थित उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री महंत योगी आदित्यनाथ के पैर छुए, और NDTV को यह इतना अटपटा लगा कि उन्होंने इसकी ब्रेकिंग न्यूज़ बना डाली।

यदि हमारे बुद्धिजीवियों को दुनिया से जोड़े रखने वाली कड़ी इतनी कमज़ोर है, तो देश के बौद्धिक, वैचारिक पोषण के बारे में तीव्र चिंता करने का समय आ चुका जानिए।

इसलिए हमें चाहिए कि हर ऐसी सांस्कृतिक और धार्मिक, आध्यात्मिक विरासत से जुडी बातें हम जनसामान्य तक सही परिप्रेक्ष्य में पहुंचाए! हम इस काम के लिए समाचार माध्यमों का विश्वास नहीं कर सकते हैं, इसलिए हमारा उत्तरदायित्व कई गुना बढ जाता है।

अतः सावधान मित्रों!

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