मीलॉर्ड का हत्यारा कॉलेजियम सिस्टम

कल दोपहर में एक पारिवारिक परिचित जो सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं और लखनऊ हाईकोर्ट में एक केस के सिलसिले में आये थे, से मिलने हयात होटल जाना हुआ।

मिलने की बात हालांकि शाम को तय थी लेकिन दोपहर में ही सूचना मिली कि कोर्ट में कंडोलेंस हो गयी, आप अभी आ सकते हैं।

पहुंचने पर पता चला कि लखनऊ, गोमतीनगर के विभूतिखंड में न्यू हाई कोर्ट बिल्डिंग की चौथी मंजिल से कूद कर स्टैंडिंग काउंसिल के पूर्व चीफ वकील रमेश चंद्र पाण्डेय ने आत्महत्या कर ली।

मेरे लिए कोई भी मौत दुःखद होती है और इस तरह की असमय दुर्घटना तो और भी व्यथित करती है। लेकिन इस घटना पर आज सुबह के अखबार और फिर साइबर में डिजिटल खबरों को देख कर मन घृणा से भर उठा। बड़ी दिक्कत तब होती है जब आप सत्य को जानते हों और अपने सामने ही उस सत्य की हत्या होते देख रहे हों।

आज के समाचार बता रहे हैं कि : अधिवक्ता रमेश चंद्र पाण्डेय (55) गोमतीनगर के विशेषखंड में परिवार के साथ रहते थे। जुलाई में उन्होंने हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के चीफ स्टैंडिंग काउंसिल पद से इस्तीफा दे दिया था।

मंगलवार सुबह वह रोज़ की तरह अपने जूनियर वकीलों के साथ हाई कोर्ट पहुंचे। दोपहर में लंच के वक्त हाई कोर्ट बिल्डिंग के सी-ब्लॉक स्थित चौथी मंजिल पर अपने जूनियर के केबिन में पहुंचे। वहां कुछ देर बैठने के बाद वॉशरूम चले गए।

दोपहर 1:15 से 1:40 के बीच वह संदिग्ध हालात में चौथी मंजिल के वॉशरूम या बालकनी से गिर गए। उन्हें डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

पूर्व चीफ स्टैंडिंग काउंसिल की मौत की खबर मिलते ही कई न्यायाधीश और बड़ी संख्या में वकील लोहिया अस्पताल पहुंचे। पत्नी अल्पिका, बेटे यश और अन्य परिजनों को भी अस्पताल लाया गया। छानबीन के बाद पुलिस ने रमेश का शव पोस्टमॉर्टम के लिए भिजवा दिया। अस्पताल में परिजन चर्चा कर रहे थे कि : “वह कुछ दिनों से अवसाद में थे”।

सत्य “वह कुछ दिनों से अवसाद में थे” से शुरू होता है : मृतक वरिष्ठ वकील रमेश पाण्डेय अवसाद में इसलिए थे क्योंकि जजों को नियुक्त करने वाले कॉलेजियम व्यवस्था ने बीते दिनों उन्हें जज के तौर पर नियुक्त करने का निर्णय अपनी चयन प्रक्रिया के तहत किया था। लेकिन जब नियुक्ति के आदेश जारी हुए तो उसमें से रमेश पाण्डेय का नाम नहीं था। कॉलेजियम द्वारा चयन की सिफारिश का निर्णय तय हो जाने के बाद न जाने किन वजहों से रमेश पाण्डेय का नाम अंतिम चयन लिस्ट से गायब था।

इससे उपजे अवसाद ने एक वरिष्ठ वकील के लिए चौथी मंजिल से कूद जाने की स्थिति तक पहुंचा दिया।

परिवार इसे हत्या बता रहा है। सत्य है कि यह आत्महत्या है। अखबार इसे दुर्घटना बता रहे हैं।

यहां सच को जानने के आधार पर मैं मृतक के परिवार के हत्या वाले आरोप के साथ हूं।

मीलॉर्डों द्वारा खुद मीलॉर्डों को चुनने वाली कॉलेजियम व्यवस्था इस मामले में वरिष्ठ वकील रमेश चंद्र पाण्डेय की हत्यारी है।

स्थापित मीडिया को चुल्लू भर पानी भी नसीब नहीं होना चाहिए ऐसी झूठी रिपोर्टिंग पर। ये सत्य की हत्या के गुनाहगार हैं।

कौन कहता है सत्य कभी हारता नहीं!

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