यदि विवाह सांस्थानिक वेश्यावृत्ति, तो फिर परिवार एक कोठा और समाज एक मंडी

विवाह एक सांस्थानिक वेश्यावृत्ति है। इस विषय पर आजकल में कुछ एक फेसबुक पोस्ट पढ़ी।

मूल रूप में, यह जिस किसी का भी कथन है, वो अति विद्वान होना चाहिए। और यह ‘अति’ का होना हर जगह घातक और नुकसानदायक ही होता है, स्वयं के साथ साथ अन्य के लिए भी।

जिस तरह से, आवश्यकता से अधिक खा लो तो अपच से शारीरिक रोग हो जाता है, ठीक उसी तरह से कोई बुद्धिजीवी अगर धारण करने की क्षमता से अधिक बौद्धिकता पी ले तो मानसिक रोगी बन जाता है।

सवाल तो कई हो सकते हैं, लेकिन उपरोक्त कथन कहने वाले की तरह बौद्धिक विलास ना किया जाये तो सीधे सरल कुछ एक बिंदुओं को उठाना ही यहां पर्याप्त होगा।

अगर विवाह एक सांस्थानिक वेश्यावृति है तो मानव द्वारा बनाई गई सम्पूर्ण व्यवस्था उसके गुण-अवगुण का संस्थानीकरण ही है। यहाँ तक कहा जा सकता है कि परिवार, समाज, देश सब एक सांस्थानिक जेल हैं और सभी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक व्याख्या जेल का मैनुअल है, फिर चाहे वो कोई भी धार्मिक पुस्तक हो या फिर किसी भी देश का संविधान।

सच कहें तो मनुष्य ने जो कुछ भी बनाया सब अप्राकृतिक है। फिर सिर्फ विवाह ही सांस्थानिक क्यों, वेश्यावृत्ति भी तो है। विवाह एक व्यवस्था है समाज की, उसी समाज की जिसमे वेश्यावृत्ति भी होती रही है। अगर दोनों एक ही होती तो दो नामों की ज़रूरत ही क्या थी। और ये दो नाम वहां भी हैं जहां वेश्यावृत्ति स्वयं में स्वतंत्र रूप से सांस्थानिक है। और तो और, इस तरह के समाज में भी विवाह उतना ही संदर्भित है जितना किसी अन्य सभ्य समाज में।

यहां यह समझना होगा कि अगर समाज का निर्माण करना है तो परिवार आवश्यक है और परिवार के नींव में है विवाह। अब यहां सवाल उठता है कि आप विवाह को क्या मानते हैं। अगर यह संस्कार है, जैसा कि सनातन में माना जाता है, तो फिर संस्कारजनित विवाह एक आदर्श परिवार का निर्माण करता है जो फिर सभ्य समाज बनाता है।

यही कारण रहा जो सनातन संस्कृति में वैवाहिक संस्कार पर बहुत ध्यान केंद्रित किया गया और उसे अधिक महत्व भी दिया गया। जिसका सकारात्मक परिणाम हुआ कि सनातन समाज हज़ारों हज़ार साल जीवंत रहा और अब भी बचा हुआ है। यूं ही हमारे पूर्वज आर्य अर्थात श्रेष्ठ नहीं कहलाये।

और अगर आप विवाह को सांस्थानिक वेश्यावृत्ति मानते हैं तो फिर परिवार एक कोठा बन जाता है और समाज एक मंडी। पश्चिम, जिसने अपने परिवार अर्थात विवाह के नैतिक मूल्यों पर और उसके स्थायित्व पर अधिक ध्यान नहीं दिया, जिसका दुष्परिणाम यह है कि वो सभ्यता मात्र कुछ एक शताब्दी में ही हांफने लगी है। लेकिन वहां भी विवाह वेश्यावृत्ति तो नहीं मानी जाती। हाँ वो मात्र एक कॉन्ट्रैक्ट है, और कॉन्ट्रैक्ट तोड़ा जा सकता है। इसलिए वहां तलाक की अवधारणा प्रारम्भ से है और हमारी परम्पराओं में तलाक शब्द भी नहीं। यहां तो विवाह सात जन्मों के लिए बंधन है। यह बंधन ही है जो सनातन संस्कृति को उच्छृंखल होने से बचाता है।

उच्छृंखलता सिर्फ समाज में ही स्वीकार्य नहीं बल्कि जंगल और प्रकृति में भी सम्भव नहीं। पशु भी उच्छृंखल नहीं होता। तो फिर मानव कैसे होना चाहेगा। ये वामपंथियों की अति प्रगतिशीलता ही मनुष्य को पशुता की ओर ले जाती है। वही पशुता, जो पशु भी नहीं करते।

बुद्धिजीवियों का दायित्व है कि वे समाज के लिए स्वस्थ, स्वच्छ और दूरगामी सुखद परिणाम देने वाले सार्थक दृष्टिकोण का निर्माण करें, ना कि अराजकता और प्रदूषण फैलाएं।

क्या वे जानते नहीं कि विवाह में दोनों पक्ष सहयोग करते हैं और दोनों ही कामसुख भी लेते हैं और अगर यह बिना प्रेम के है तब भी वह उत्तम संसर्ग ही कहलाएगा। इसे वेश्यावृत्ति कहना मानसिक विक्षिप्तता है, एक किस्म की बौद्धिक कुंठा जिसका समय रहते इलाज ना होने पर ऐसे ही मूर्खतापूर्ण कथन अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के हथियार रखने वाले परोसते रहते है।

आप अपने परिवार और समाज के लिए कैसी कल्पना करते हैं यह आप के विचारों से समझा जा सकता है और उन विचारों को आप के शब्दों में पढ़ा जा सकता है। ये शब्द प्रेम प्रदर्शित कर सकते हैं, किसी को अपना बना सकते हैं, दानव को मानव बना सकते हैं अर्थात शब्द सभ्य समाज का निर्माण कर सकते हैं। और यही शब्द किसी को घाव दे सकते हैं, युद्ध करवा सकते हैं, विनाश का कारण बन सकते हैं, असभ्यता से समाज का सर्वनाश कर सकते हैं।

आप अपने संबंधों को कैसे देखते हैं, यह आप के शब्दो से झलकता है। कोई एक अगर विवाह को वेश्यावृति मान सकता है तो अनेक ऐसे भी हैं जो किसी वेश्या को विवाह के बंधन में बाँध कर अपनी पत्नी भी बनाते आये हैं। पहला मानव नहीं दानव है दुष्ट है राक्षस है, जबकि दूसरा उत्तम पुरुष और आदर्श नायक कहलाता है।

इस विषय पर अगर किसी को गहराई में जानना और समझना है तो किसी वेश्या से जाकर पूछे, वो बताएगी कि उसके लिए विवाह की क्या कीमत है। और वो उसका हर मूल्य चुकाने के लिए तैयार भी मिलेगी।

नि:संदेह यौनकर्म विवाह का आधार है, किंतु केवल यही सर्वस्व नहीं

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY