आज की नायिका : बेबी हालदार, कामवाली बाई से लेखिका बनने की संघर्षपूर्ण कहानी

दिल से लिखी हुई बात सीधा दिल पर लगती है।

आज का लेख एक लेखिका के सँघर्ष को समर्पित है।

तस्वीर बेबी हालदार की है।

बेबी चार साल की थीं, तभी मां चल बसी। पिता को बच्चों की चिंता सताने लगी तो उन्होंने पुनः विवाह कर लिया। घर में सौतेली माँ आ गयी। सौतेली माँ के इशारे पर पिता ने 12 साल की बेबी का बाल विवाह करने की ठान ली।
वर की तालाश शुरू हो गयी और बारह वर्षीय बेबी से 15 साल बड़े व्यक्ति से विवाह पक्का कर दिया गया।

एक दोपहर मोहल्ले में अपनी सखियों के साथ खेल रही बारह वर्षिय बेबी को बताया गया के आज उसका विवाह है। एक अपरिपक्व बच्ची को उस समय पता भी नहीं था के विवाह और वैवाहिक सम्बन्धों का अर्थ क्या होता है।

ब्याह कर आई बेबी के साथ ज़बरदस्ती शारीरिक सम्बंध बनाये गये । 13 वर्ष की आयु में बेबी ने एक बेटी को जन्म दिया और 15 वर्ष की अल्पायु में वह दो बच्चों की माँ बन चुकी थी। इस अल्पायु में जब इंसान ख़ुद को सम्भालने लायक भी नहीं होता बेबी पर दो बच्चों को सम्भालने की ज़िम्मेवारी आन पड़ी थी।

कमोबेश रोजाना ही वह उम्रदराज पति की गालियां सुनतीं, उसके हाथों पिटती रहतीं। जिंदगी नर्क हो चली थी।

एक दिन पति ने गांव के किसी आदमी से बात करते देखकर उनके सिर पर पत्थर मारकर लहूलुहान कर दिया। उनकी जेठानी ने समझाया कि औरत मर्द के सहारे जीवन काटती है। जीना दुश्वार हो चला था और बेबी फिर पेट से थी। एक और बच्चे को जन्म दिया और जीवन रूपी चक्की में बेबी का पिसना जारी था।

एक रात पति ने बच्चों के आगे इतना पीटा कि दांत जबड़े से टूट कर नीचे गिर गया। चेहरा बुरी तरह से सूज गया।

एक दिन तंग आकर आत्महत्या करने की ठान ली। फिर विचार आया के मरने के बाद बच्चों का क्या होगा। जीना पड़ेगा पर इन परिस्थितियों में तो जीना असम्भव था। इस दहलीज को पार करना तो आवश्यक था।

बदहवास सी हो चुकी बेबी तीनो बच्चों को साथ लेकर रेलवे स्टेशन पहुंचीं और एक ट्रेन के शौचालय में बैठे-बैठे दिल्ली और फिर वहां से गुड़गांव पहुंच गईं।

एक अकेली महिला तीन बच्चे और एक अजनबी शहर। फुटपाथ के किनारे ज़िंदगी शुरू की और कुछ दिनों के बाद एक कोठी में झाड़ू पोछा करने का काम मिल गया।

रात बेशक कितनी भी लंबी हो पर प्रकृति का नियम है के सूर्य की पहली किरण अंधेरे को चीरते हुये धरा को उजाले से रौशन कर देती है।

बेबी हालदार की किस्मत पलटने वाली थी। । एक दिन उन्होंने उपन्यास सम्राट “मुंशी प्रेमचंद” के प्रौत्र एवं रिटायर्ड प्रोफेसर प्रबोध कुमार के दरवाजे पर दस्तक दी।

इस दस्तक ने उनके जीवन की दिशा मोड़ दी। प्रबोध बाबू ने जब बेबी कहानी सुनी तो उनका दिल पिघल गया। उन्होंने बेबी से कहा के आज से वह उन्हें “पिता” कहेंगी और उनके ही घर में रहेंगी। प्रबोध बाबू ने बच्चों का स्कूल में एडमिशन करवा दिया।

बेबी बांग्ला भाषा पढ़ना और लिखना जानती थी। एक दिन प्रबोध कुमार कुछ दिनों के लिये घर से बाहर जा रहे थे। जाने से पहले उन्होंने बेबी के हाथ में एक कॉपी और कलम थमा दी और कहा …………. “लिखो”

बेबी ने पूछा “क्या लिखूं”
………… तो प्रबोध बाबू ने कहा ……….. “आपबीती लिखो”। जो गुज़री है उसे इस कलम के ज़रिये कागज़ पर उतार दो।

बेबी लिखने लगी। बचपन के उन सुनहरे दिनों के बारे में लिखा जब उनकी माँ ज़िंदा थी। इस विवाह के बारे में लिखा जब 12 वर्ष की आयु में उन्हें एक 27 साल के मर्द की सेज सजाने भेज दिया गया था। 13 वर्ष की अल्पायु में एक बच्चे के जन्म देने की पीड़ा के बारे में लिखा। उन तमाचों के बारे में लिखा जो हर बीते दिन उसके पति ने उसे मारे थे। उन लम्हों के बारे में लिखा जब वह अकेली किसी कोने में पड़ी सुबकती रहती थी। हर एक भावना हर एक संवेदना मानो कलम के ज़रिए कागज़ पर बह रही थी। हर एक दुख मानो शब्दों का रूप ले रहा था। जो दिल में बरसों से दबा था वह ज्वालामुखी का रूप लेकर कलम के ज़रिये बाहर आ रहा था।

कॉपी प्रबोध बाबू के हाथ में थमा दी गयी। प्रबोध ने जब बेबी के लिखे शब्दों को बांग्ला से हिंदी में अनुवादित किया तो वह स्वयं कई बार रो पड़े।

कुछ दिन बीते और एक शाम बेबी हालदार के हाथ में प्रबोध ने एक किताब थमा दी। किताब का शीर्षक था ‘आलो आंधारि’ और लेखिका का नाम था …….

बेबी हालदार।।

वह कॉपी जिसपर बेबी ने अपने सारे जीवन को उढेल कर रख दिया था अब एक किताब का रूप ले चुकी थी।

लेख के शुरुआत में मैंने लिखा था के जब बात दिल से लिखी हो तो सीधा।दिल पर जा कर लगती है।

सीधी-सादी भाषा-शैली में लिखी जब यह किताब बाजार में आई तो इसका पहला ही संस्करण हाथोहाथ बिक गया। प्रकाशक ने दूसरा, फिर तीसरा संस्करण भी प्रकाशित कर दिया।

इसके बाद तो फिर इस किताब का कई भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो गया और बेबी हालदार काम वाली बाई से दुनिया की मशहूर लेखिका बन गईं। न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे प्रतिष्टित अख़बार ने भी उनकी आत्मकथा को भरपूर सराहा।

कुछ वर्ष बाद उर्वशी बुटालिा ने उसे अंग्रेजी में ‘अ लाइफ लेस्स ऑर्डिनरी’ नाम से अनुवादित कर दिया और देश विदेश में इस किताब की रिकार्ड बिक्री हुई।

एक वक्त था जब बेबी आत्महत्या करने की ठान चुकी थी। फिर वह लम्हा आया जब उन्होंने जीवन को एक दूसरा मौका देने की ठानी और सभी बेड़ियां तोड़ कर घर से भाग गयी।

जीवन की पहली पारी में बुरी तरह से असफल बेबी को जीवन की दूरी पारी में गज़ब की सफ़लता प्राप्त हुई है। असफलता कभी निर्णायक नहीं। होती । जीवन हम सब को दूसरा मौका ज़रूर देता है।

बेबी अब तक तीन किताबें लिख चुकी हैं और अच्छी खासी धनराशि कमा चुकी हैं।कभी कामवाली बाई कहलाने वाली बेबी आज एक प्रख्यात लेखिका बन चुकी हैं। आजकल कोलकता में अपने बच्चों के साथ बेहतरीन जीवन गुज़ार रही हैं।

अभी कुछ ही देर पहले एफएम पर मेरा पसंदीदा गीत बज रहा था ……

रुक जाना नहीं तू कहीं हार के
काँटों पे चलके मिलेंगे साये बहार के
ओ राही, ओ राही।

गीत सुना तो अनायास ही बेबी हालदार के सँघर्ष और सफलता की यह सत्यकथा याद आ गयी।

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