जब आप लव जिहाद बोलते हैं, तो मुझे सुनाई देता है कमज़ोर बेटी

लव जिहाद, बड़ा फेमस शब्द है।

वैसे तो नॉर्मल शादी दो इंसानों के बीच होती है।

पर जब शादी एक मुस्लिम पुरुष और हिन्दू स्त्री के बीच हो जाये तो जिहाद बस लड़की के साथ ही होता है।

वैसे ही अगर एक हिन्दू लड़का एक मुस्लिम लड़की पटा लेता है तो एक बड़ा हिन्दू वर्ग ताल ठोकता है। उस लड़के की मर्दानगी हर उस लड़के से दो बिलांग ज्यादा मानी जाती है, जो इन दुश्मन मुस्लिमों की औरत उठा कर नहीं ला पाये।

अब हर धर्म की औरत से मेरा प्रश्न है। पुरुषों के नजर में आपकी क्या औकात दर्शाती है यह मानसिकता???

एक उपभोग की वस्तु जिसे जीत कर लाया गया हो। एक अपने से नीचे का इंसान जिसपर जीतने वाले पुरुष का आधिपत्य हो। तभी तो शादी भले दो लोग करें, धर्म भी आपका ही बदलता है, compromise भी आप ही करती हैं। आपके धर्म वाले मातम मनाते हैं, उसके धर्म वाले खुश होते हैं, क्योंकि सबको मालूम है कि आप बदलेंगी। लड़के पर किसी को कोई खतरा नहीं दिखायी देता।

मेरी शादी अगर किसी अन्य धर्म के पुरुष से हो गयी तो आधे हिन्दू मुझे गाली देंगे, आधे कहेंगे कि बेचारी के साथ जिहाद हो गया। आखिर मुझ पर ही क्यों गुस्सा निकलेगा या मैं ही क्यों बेचारी रहूँगी??

सिर्फ इसीलिये क्योंकि मैं लड़कीं हूँ, अतः आप मान के चल रहे हैं कि मैं अपने दूसरे धर्म के पति से दब जाऊँगी। घर में जो चलेगी उसी की चलेगी।

आपको गलत भी नहीं कह सकती। नर्गिस शादी के बाद नरगिस दत्त बन जाती है, करीना के आगे खान लग जाता है। आपने आज तक यही देखा है। आज तक अपनी बेटियों को ऐसे ही पाला है।

पर जो होता आया है जरूरी नहीं है कि सही ही हो। कतई जरूरी नहीं कि आगे भी हो।

ऐसे समाज बनाने की कल्पना कर सकते हैं आप जहाँ आपकी बेटियाँ खुद इतनी मजबूत हो कि अगर दूसरे धर्म मे शादी कर ले तो भी जेहादी और इंसान के बीच फर्क पहचानना सीखे। अगर करे भी तो सामने वाले कि औकात ना हो उसके धर्म, उसकी आस्था पर प्रहार करने की?? है आपमें इतनी कुव्वत देश को ऐसी बेटियाँ देने की??

पोस्ट ग्रेजुएशन में एडमिशन लेने के दौरान मैं एक महीना देर हो गयी रजिस्ट्रेशन करवाने में। मेरे कॉलेज में एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य है। जब तक मेरा एडमिशन हुआ सारी भाषाओं की सीट भर चुकी थी और मेरे खाते में आया अरबी।

पहले दिन क्लास में कदम रखा तो तीस मुस्लिम लड़को और कुछ पर्दानशीं लड़कियों के बीच मैं इकलौती हिन्दू लड़की थी। मुस्लिमों का अरबी के प्रति जो भी मोह हो कि सब इधर ही टपक पड़े पर मेरे अलावा दो और हिन्दू लड़के ही इधर पहुँचे।

डेढ़ साल से उन अफगानिस्तान से लेकर इराक और कश्मीर तक के लड़कों के साथ पढ़ती हूँ, गप्पे हाँकती हूँ, और मेरे साथ किसी ने फ्लर्ट करने की भी कोशिश नहीं की। बातें होती हैं तो धर्म पर भी चर्चा होती है। वे कहते हैं कि इस्लाम शांति का मजहब है पर मुझे जो लगता है खुल कर बोल देती हूँ, तहजीब से।

अफगानिस्तानी लड़के को ये बताने में कोई झिझक नहीं होती कि अमेरिका तो जो है वो है, पर तुमलोगों की खुद की मेंटेलिटी भी ठीक नहीं है। कश्मीरी लड़के जब इंडियन आर्मी का बताते हैं तो मैं कश्मीरी पंडित का जिक्र भी कर देती हूँ।

अरबी मुझे पसन्द नहीं (और मैं पढ़ती नहीं ढंग से) तो फेल होने से भी ये मुस्लिम लड़के ही बचाते हैं मुझे पर इसकी वजह से एहसान दिखाने की कोशिश नहीं करते।

ज्यादातर हिंदू लड़कियों से तो ज्यादा ही करीब रह चुकी हूँ मुस्लिमों के पर मेरे साथ आज तक इस जिहाद की कोशिश क्यों नहीं हुयी? या फिर मुझे क्यों नही समझौता करना पड़ा अपनी सोच के साथ। असली ID से इस्लाम के विरोध में लिखती हूँ और फिर उन मुस्लिमों के बीच भी बैठती हूँ। यकीन मानिये गरदन सलामत है।

आप शिकायत करते हैं कि आपकी बेटियाँ फँसा ली जाती है। मैं खुद कई लड़कियों को जानती हूँ जो आज किसी और धर्म के लड़के के साथ शादी करने के सपने सजों रही है। और इस टेक्नोलॉजी के एज में आप नहीं रोक सकते ऐसे रिश्तों को बनने से। अतः, आपको अपनी बेटी को सही और गलत इंसान का फर्क सिखाना होगा। उसे सिखाना होगा कि प्यार के चक्कर में अपनी सोच अपनी आस्था से compromise ना करे।

आपकी शिक्षा सही होगी तो आपकी बेटी दूसरे धर्म में भी सही लड़का चुन कर अपनी शर्तो पर जियेगी। आपकी ट्रेनिंग कमज़ोर है तो अपने धर्म के लड़के के भी जूते तले आ जायेगी। वहाँ भी मार खायेगी। दहेज के लिये जलाई जाएगी।

अतः, जब आप लव जिहाद बोलते हैं तो मुझे कमजोर बेटी सुनाई देता है।

बेटी को ताले में बंद करने की कोशिश ना करें। यह सबसे फालतू और सबसे कम कारागार उपाय है। बन्धन बस विद्रोह ही पैदा करता है।
बस उसे इतना सबल बनाये कि जिस घर जाये वहाँ अपने स्वाभिमान के साथ समझौता ना करे। हमारी शिक्षा ही यह निश्चित करेगी कि हमारी औरतों की शादियां जिहाद बनती है या फिर बस दो धर्मो के दो लोगों का मिलन।

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