पुरोहितजी कहिन : कभी व्यर्थ जाता ही नहीं सशस्त्र पुरुषार्थ

बात तब की है जब रोहिंग्या घुसपैठियों पर मेरा लेख ‘आपके बेटे के बदले अपने बेटे को मृत्यु को प्रस्तुत करे, वही शरण का सच्चा अधिकारी‘ वायरल हो गया था।

फेसबुक पर हर दूसरी पोस्ट पर वही कॉपी पेस्ट, शेयर, 2 घंटे में 50 जगह से whatsapp पर मुझे ही वापस मिली, माने सभी जगह जमकर फैल गई।

तब मैं बहुत खुश हुआ कि संभवतः आज हम अपनी बात सरकार/ न्यायालय/ मीडिया तक पहुंचाने में सफल हो गए है, अतः शीघ्र ही रोहिंग्यासुरों को भारत से बाहर कर दिया जाएगा।

उसके कुछ ही दिनों पश्चात एक दिन जब मैं अपने कार्यालय में कार्यरत था तब एक तेज़ शोर सुनाई दिया, ‘नारा ए तक़बीर, अल्लाह हु अकबर’

मैं बाहर सड़क की ओर भागा और देखा कि एक विशाल जुलूस मुख्य मार्ग पर चला आ रहा था, जहाँ बड़े बड़े प्रिंटेड बैनर्स, हाथों में प्रिंटेड तख्तियां आदि लिए रोहिंग्या घुसपैठियों के पक्ष में मुस्लिम समुदाय नारे लगा रहा था, और अपील कर रहा था कि उनकी (रोहिंग्या) हत्याएं रोकी जाएं, उन्हें शरण दी जाए और भारत में रहने दिया जाए।

मैं यह सब देख आश्चर्य से भर गया और सोचने लगा कि आखिर ये सब था क्या और इसके क्या परिणाम होंगे!

परिणाम ये हुए कि ऐसे ही राष्ट्रव्यापी जुलूसों, विरोध प्रदर्शनों के चलते कोर्ट/ सरकार ने आज तक रोहिंग्याओं को भारत से बाहर नहीं किया।

कुछ समझे आप?

‘कब्ज़े की लड़ाई ग्राउंड पर ही होती है, आभासी ग्राउंड पर नहीं!’

उन्होंने बर्मा में भिड़ंत के समय प्रदर्शन किए (आज़ाद मैदान मुंबई), रोहिंग्या के लिए किए, सीरिया-फलीस्तीन के लिए किए और अब तक कर रहे हैं। और ये सब प्रभावी है, कुछ भी व्यर्थ नहीं गया, क्योंकि व्यर्थ जाता भी नहीं कभी सशस्त्र पुरुषार्थ।

ये बात हिन्दुओं को अब तक समझ नहीं आई है, कश्मीर से पंडित भगाए गए और ये अपनी भैंस को पानी पिलाते रहे, नार्थ ईस्ट की डेमोग्राफी बदल गई और ये सेटेलाइट टीवी पाकर किले जीत गए, बंगाल में बांग्लादेशी, शरणार्थी से मालिक बन बैठे और ये जगतगुरु बनने के ख्वाब देखते रह गए, केरल में वामी खुलेआम कत्ल करते रहे और ये उनसे छठी की किताब के कोर्स पर विशुद्ध शास्त्रार्थ करते रहे गए।

उद्देश्य हिन्दुओ को निराश करना नहीं है मन्तव्य स्पष्ट है कि आखिर इस निकृष्टतम एवं विकट संकटपूर्ण काल में हिन्दू अपनी वैश्विक एकीकृत चेतना को कब अभिव्यक्त करना सीखेगा?

बताइये कहाँ कहाँ सबरीमला विवाद पर केरल के धर्मयोद्धाओं के पक्ष में और कोर्ट के मूर्खतापूर्ण निर्णय के विरुद्ध प्रदर्शन हुए या हो रहे है नॉर्थ में?

एक, दो या चार जगह पर बस?

क्यों आज सम्पूर्ण भारत का हिन्दू एक साथ इस विषय पर अपने मलयाली भाइयों के साथ नहीं खड़ा है ग्राउंड पर?

एका है ही नहीं, कुछ बुद्धिजीवी हिन्दू कोर्ट के निर्णय से ही असंतुष्ट नहीं हैं! बताइये?

कुछ इसे नारी अधिकार और लैंगिक भेदभाव मानकर मौन धरे हुए है, कुछ के पास समय ही नहीं है, और कुछ मोदी जी के रास्ते में काँटे बीनने में लगे हुए हैं और कुछ तो ये सोच रहे हैं कि रहने दो यार, कहीं इसका नुकसान भी मोदी को ना हो जाये चुनावों में!

ये है आज के तकनीकी युग में हिन्दुओं की सामूहिक चेतना?

लंपट और धर्मद्रोही वामियों ने इस विषय को बड़ी ही धूर्तता के साथ लैंगिक भेदभाव से जोड़ दिया है और यह डिफ़ॉल्ट नैरेटिव जमा दिया है कि वस्तुतः सबरीमला मंदिर में निर्दिष्ट महिलाओ के नहीं जाने की परंपरा असल में महज़ लैंगिक भेदभाव है, और आश्चर्यजनक रूप से वे उच्चतम न्यायालय तक को इस मुगालते में उलझाने में सफल रहे।

उत्तर-भारतीय महिलाएं जो वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ या इस विषय में अल्पज्ञ हैं, वे भी इस कुप्रचार को सत्य मानकर मौन अथवा विरोध में हैं जो कि अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

आइये इस विषय पर विमर्श करें।

लंबे समय तक विश्व की सभी सेनाओं ने महिलाओं को अपनी सेना में कई कार्यभार दिए किन्तु सीधे युद्ध में लड़ने की अनुमति नहीं थी, कारण दक्षता, योग्यता या अविश्वास नहीं था कभी भी, बल्कि वह सनातन प्राकृतिक भाव था पुरूष द्वारा महिला की सुरक्षा के दायित्व का।

यह पुरातन भाव सम्पूर्ण मानवजाति के अवचेतन में रहा है जिसके सकारात्मक पक्ष को भी धूर्त वामियों ने ‘नारी सशक्तिकरण में बाधा’ के रूप में कुप्रचारित कर के इस भाव का ह्रास कर दिया है। आज विवश होकर सेनाएं महिलाओं को फ्रंट पर लड़ने की अनुमति दे रही हैं जबकि वे ‘ताबूतों मे आती माँ’ को कांधा देने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है और इसे ‘प्रचंड नैतिक शर्म’ मानते हैं।

ऐसा ही कुछ सबरीमला को लेकर भी है, विचार कीजिये कि जिस अर्धांगिनी को अपने पति द्वारा किये गए समस्त धार्मिक कार्यों, दर्शनों एवं यज्ञों का आधा फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, उन्हें क्यों उस दुर्गम यात्रा का हिस्सा बनाया जाए जो अत्यंत कष्टसाध्य है? पुरुष उस यात्रा का फल सहर्ष अपनी महिला सम्बन्धियों के साथ बांटकर अनुग्रहित है, फिर क्यों उसके इस वृहद हृदय भाव को भेदभाव का नाम दिया जा रहा है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुधा भारत के धर्म सहिष्णु होने का उदाहरण देते हुए पारसियों के शरण की घटना का वर्णन करते हैं, जिसमें वे कहते हैं कि हिन्दू राजा यादव राणा के समक्ष पारसियों ने यह समस्या रखी कि हमारी पवित्र अग्नि के पास 25 किमी के दायरे में कोई अन्य धर्मावलंबी नहीं आ सकता, क्या आप ऐसी व्यवस्था दे पाएंगे? तब उस हिन्दू राजा ने सहर्ष उन्हें इसकी अनुमति और स्थान प्रदान किया जो सूरत में संजाण नाम से प्रसिद्ध है।

मैं उच्चतम न्यायालय से यह पूछने का दुस्साहस करूँगा कि क्या पारसियों के उस पवित्र स्थान पर किसी अन्य धर्मावलंबी के प्रवेश निषेध की ‘परंपरा’ को ‘रिलिजियस डिस्क्रिमिनेशन’ मानकर भंग कर देना चाहिए!

नहीं ना! क्योंकि एक हिंदुत्व ही है जिसके सभी रीति-रिवाज, परंपराएं विशुद्ध पाखंड, अवैज्ञानिक, भेदभावपूर्ण एवं स्त्रीविरोधी है, जिनसे समस्त ब्रह्मांड को ही खतरा है।

सारे रोड़े बस उसी के पालन में लगाइए, बाकी सभी धर्म हिन्दुओं द्वारा प्रताड़ित हैं अतः उन्हें विशेषाधिकार से नवाज़ते रहिये। यही है आपका आधुनिक भारत!

हे हिन्दुओं! खेत के लिए फसल को, फसल के लिए पूली को, पूली के लिए तिनके को आसानी से बलिदान कर देने की मानसिकता से बाज़ आइये, अपनी सभ्यता शत्रु से सीखिए और तिनके के लिए पूली, पूली के लिए फसल और फसल के लिए खेत को भी दांव पर लगाने से चूकिये मत।

धर्मार्थ एक तिनके जैसे विवाद के लिए भी पूर्ण आक्रामक रुख के साथ लड़िये ताकि कोई आपकी संस्कृति के खेत की तरफ कुदृष्टि तक ना डाल सके! तीव्र प्रतिक्रियात्मक बनिये सर्प के समान, ना कि गरुड़ की तरह अनंत धैर्यवान कि ज़मीन से कब्ज़ा ही समाप्त हो जाए!

हे योद्धाओं! उतरिये दक्षिण के धर्मयोद्धाओं के समर्थन में यथाशक्ति, विरोध प्रदर्शन, ज्ञापन, गोष्ठियां, आदि से अपने उन दृढ़ संकल्पित धर्म रक्षकों के सहयोगार्थ, ताकि अपनी संतति को गर्व से कह सकें कि अपने पुरखों की तरह ही धर्म पर छाए संकटों के समय हम नपुंसक मौन धरे नहीं बैठे थे बल्कि जी जान से लड़े थे, हमारा गिलहरी योगदान भी अधर्म के रावण का वध करने में पूर्णतः सक्षम है।

इसलिए उतिष्ठ पार्थ युद्धाय कृतनिश्चय!

अपने जिलाधीशों, विधायकों, सांसदों, मंत्रियों आदि को ज्ञापन, ईमेल एवं सम्मुख खरी खोटी सुनाना शुरू कीजिए, धार्मिक स्वतंत्रता के मूलाधिकार के हनन के मुक़दमे दर्ज कीजिये, उतरिये सड़क पर और शांतिपूर्ण आक्रोश का उचित प्रदर्शन कीजिये। यह आर पार की लड़ाई है, भिड़ जाइये अन्यथा आगे समय और खराब होने वाला है।

आपके बेटे के बदले अपने बेटे को मृत्यु को प्रस्तुत करे, वही शरण का सच्चा अधिकारी

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