अरुणाचल प्रदेश : चीन का दावा और भारत का कूटनीतिक दांव किरेन रिजिजू

विश्व में जिन दो राष्ट्रों के बीच के संबंधों को बड़ी बारीकी से पढ़ने व समझने की ज़रूरत है, वे हैं भारत और चीन, क्योंकि इन के बीच के रिश्ते कई आयामों में विभाजित हैं।

एक तरफ चीन अनाधिकृत रूप से भारत का शत्रु राष्ट्र है, लेकिन दूसरी तरफ चीन के साथ आर्थिक सहयोग भी है। एक तरफ भारत का व्यापारी वर्ग, चीन के सस्ते माल का बड़ा बाज़ार बना हुआ है और दूसरी तरफ वह अमेरिका की तरफ से शुरू किये गये आर्थिक युद्ध के विरुद्ध भारत के सहयोग का आकांक्षी भी है।

एक तरफ अमेरिका के प्रभुत्व वाले अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के समकक्ष चीन, भारत की सक्रिय भागीदारी से ब्रिक्स (BRICS) को खड़ा कर रहा है और दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट व भारत को प्रभावित करने वाले सिपेक (CPEC) बना रहा है।

एक तरफ चीन, भारत के घोषित शत्रु पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और अज़हर मसूद जैसे आतंकवादी को संयुक्त राष्ट्र संघ में बचाता है, वहीं दूसरी तरफ भारत से आंतरिक सुरक्षा पर द्वियपक्षीय अनुबंध भी करता है।

इन सारे आयामों में सबसे महत्वपूर्ण आयाम भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है, जिसको लेकर 1962 में युद्ध भी हो चुका है। इसमें भारत बुरी तरह पराजित होकर चीन के हाथों, जम्मू कश्मीर का उत्तरपूर्वी हिस्सा (अक्साई चिन) जो 38000 वर्ग किलोमीटर वर्ग है, गंवा चुका है।

सिर्फ इतना ही नहीं चीन उस वक्त के नेफा (नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) में, आज के अरुणाचल प्रदेश पर अपना अधिकार मानते हुये घुस आया था। बाद में युद्ध विराम होने पर अपनी सीमा में लौट अवश्य गया था लेकिन अरुणाचल प्रदेश पर अपने अधिकार का दावा आज भी करता है।

यहां समझने वाली बात यह है कि चीन, अरुणाचल प्रदेश को लेकर इतना संवेदनशील है कि वो इस भाग को भारत का आधिकारिक रूप से न सिर्फ हिस्सा ही नहीं मानता है बल्कि किसी अरुणाचल प्रदेश के निवासी को चीनी वीसा या तो देता नहीं है या फिर स्टेपल वीसा देता है, जिसका विरोध भारत करता रहता है।

यही नहीं, पूर्व में चीन ने भारत के प्रधानमंत्री की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा व उन इलाकों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लगाने का भी विरोध किया है। यूपीए काल में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2009 में अरुणाचल प्रदेश की यात्रा की थी जिसका चीन ने विरोध था। भारत ने तब चीन के दबाव में सारी बड़ी परियोजनाओं को बन्द कर दिया था।

चीन ने अपनी यही नीति 2014 में आयी मोदी सरकार पर भी अपनाई थी। 2015 में प्रधानमंत्री मोदी के दौरे, अप्रैल 2017 में दलाई लामा व नवंबर 2017 में राष्ट्रपति कोविंद की अरुणाचल यात्रा पर आपत्ति की थी।

इस सब के अलावा चीन की एक अरुणाचाल वासी पर प्रतिक्रिया ज्यादा आक्रोशित व असामान्य होती है। यह बात भारत के राज्य गृह मंत्री किरेन रिजिजू के उदाहरण से समझी जा सकती है, जो अरुणाचल प्रदेश के हैं।

2008 में किरेन रिजिजू को भारत के एक प्रतिनिधि मंडल के साथ चीन की यात्रा पर जाना था लेकिन वे नहीं जा पाये थे क्योंकि चीन ने उनको वीसा नहीं दिया था। पिछले एक दशक में कई बार रिजिजू भारत के प्रतिनधिमण्डल के सदस्य के नाते चीन जाने का अवसर मिला लेकिन चीन ने उन्हें कभी वीसा नहीं दिया है।

वह सिर्फ एक बार बीजिंग ओलिम्पिक के दौरान चीन गये थे लेकिन तब वे आर्चरी फेडरेशन के अधिकारी के रूप में गये थे। भारत में जब मोदी सरकार आयी तब भी चीन की संवेदनशीलता को देखते हुये, चीन को समझने व सबंध बेहतर करने के लिये, सितंबर 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा पर, रिजिजू को नेपथ्य में रखा था। यहां तक कि भारत के राष्ट्रपति द्वारा, शी जिनपिंग के सम्मान में दिये भोज में भी वो, एक मंत्री होते हुये भी शामिल नहीं हुये थे।

2014 में, नरेंद्र मोदी की सरकार में किरेन रिजिजू को एक केंद्रीय मंत्री होने के बाद भी चीन द्वारा न स्वीकारा जाना एक आम भारतीय के लिये क्षोभ व आश्चर्य का विषय ज़रूर हो सकता है, लेकिन तब वैश्विक पटल पर चीन के सामने, भारत की वास्तविक स्थिति यही थी।

आज 2018 में नरेंद्र मोदी ही का भारत 2014 से कैसा बदला है यह कल आये समाचारों से पता चला है। नई दिल्ली में 21 अक्टूबर 2018 को भारत व चीन के बीच आंतरिक सुरक्षा को लेकर एक अनुबंध हुआ है जिसमें भारत की तरफ से प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व गृहमंत्री राजनाथ सिंह व चीन की तरफ से चीन के नागरिक सुरक्षा मंत्री ज़हओ केज़ही (Zhao Kezhi) द्वारा नेतृत्व किया गया था।

अब क्योंकि किरेन रिजिजू गृह राज्यमंत्री हैं इसलिये उन्हें भारत के प्रतिनिधिमंडल में होना चाहिये था लेकिन चीनी अधिकारियों के विरोध के कारण, रिजिजू वार्ता के दौरान उसमें शामिल नहीं हुए और अपने घर चले गये। वार्ता के बाद जब दोनों प्रतिनिधिमंडलों में अनुबंध के बिंदुओं पर परस्पर सहमति बन गयी तब अनुबंध पर हस्ताक्षर करने का एक समारोह रखा गया।

उस समारोह में हस्ताक्षर करने चीनी मंत्री अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ पहुंचे तो देख कर भौचक्के रह गये कि भारत के प्रतिनिधिमंडल में गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ किरेन रिजिजू भी शामिल हैं।

भारत ने रिजिजू को ऐसे समय भारत के प्रतिनिधि के रूप में चीन के सामने रखा जब सारी दुनिया के सामने चीन को अनुबंध पर दस्तखत करना था। चीन यहां कूटनीतिक रूप से फंस गया था। उसके पास सिर्फ दो ही रास्ते बचे थे, एक तो यह कि चीन, विरोध स्वरूप अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से मना कर दे या फिर चीन के लिये अनुबंध के महत्व को स्वीकारते हुये, अरुणाचल वासी किरेन रिजिजू की उपस्थिति को बिना विरोध के स्वीकार कर ले।

चीन ने दूसरा रास्ता चुना और अनुबंध पर बिना किसी विरोध के हस्ताक्षर कर दिये। यह पहली बार हुआ है जब चीन ने अरुणाचल प्रदेश के वासी, जिस पर वह अपना दावा पेश करता है, को भारत के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार करना पड़ा है।

यहां यह बात महत्वपूर्ण है कि स्वयं रिजिजू को इस समाराह में उपस्थित होने को लेकर कोई पूर्व सूचना नहीं थी। वे अपने घर पर थे जब उनको प्रधानमंत्री कार्यालय से यह निर्देश मिला कि वे तुरन्त समारोह कक्ष में पहुंच कर गृहमंत्री राजनाथ सिंह का सहयोग करें।

मेरे लिये यह घटना, भारत के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है। भारत व चीन के बीच के रिश्तों की जो सारी विषमताएं है वह यही बताती हैं कि भारत ने चीन के साथ, सीमा विवाद को लेकर अपने मूलभूत मतभेद को, बिना भुलाये हुये, वास्तविक वैश्विक स्थिति का आंकलन करके कूटनीति से जीना व जीतना सीख लिया है।

लोगों को यह देखने में साधारण घटना लग सकती है लेकिन यह वैश्विक, विशेषकर चीन के दृष्टिकोण से भारत का एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव है।

यह 2018 का भारत है, जिसको नरेंद्र मोदी की सरकार ने नीति व कूटनीति से बदल डाला है। मेरे लिये अन्य मुद्दे गौण हैं, मुझे तो इसी बदलाव को और गति प्रदान करने के लिये, नरेंद्र मोदी को 2019 में फिर से लाना है।

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