भारत माँ के गौरव, सम्मान, अक्षुणता और संस्कृति के संरक्षण के लिए मुद्दे पर बने रहिये

JNU की रिसर्च स्कॉलर शहला रशीद ने इंडियन एक्सप्रेस में असम के अवैध घुसपैठियों की मृत्यु के बारे में छपे एक समाचार को लेकर ट्वीट किया कि यह भारत का नरसंहार (कंसंट्रेशन) कैंप है।

इसके जवाब में JNU के बाहर के एक अन्य रिसर्च स्कॉलर करण भसीन ने उनसे पूछा कि क्या शहला कोई अकादमिक साक्ष्य दे सकती है कि भारत में नरसंहार कैंप चलाये जा रहे है?

शहला उन्हें उकसाती रही, करण को नरसंहार समर्थक बोलती रही, लेकिन करण बार-बार शहला से साक्ष्य पूछते रहे। उनसे मुद्दे पर बने रहने को बोलते रहे।

वे बार-बार पूछ रहे थे कि यदि आपके पास नरसंहार का कोई साक्ष्य है तो उसे प्रदान करें, नहीं तो आप जो कह रही हैं वह एक निराधार आरोप है और कोरी गप्प से परे कुछ भी नहीं।

बीसियों ट्वीट के एक्सचेंज के बाद जिसमें करण उनसे मुद्दे पर बने रहने को बोलते रहे, शहला भाग गई और खुद से बहस शुरू कर दी।

उसने अलग ट्वीट चलाई कि हिंसक फासीवादी कार्यक्रमों के लिए समाज के निचले स्तर – ध्यान दीजिये, वह जो स्वयं एक कम्युनिस्ट है कह रही है समाज के निचले स्तर – के लोगों को प्यादों के रूप में तैनात किया जाता है, जबकि सफेद कॉलर बुद्धिजीवी तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत करके फासीवाद के औचित्य को न्यायोचित साबित करने में मदद करते हैं। ऐसे लोग सबसे बुरे हैं। इस प्रकार के लोगों से सावधान रहें।

और इस ट्वीट के साथ शहला डिबेट में परास्त हो गई।

सामान्यतः मैं किसी का नाम नहीं लेता और मैं नहीं चाहता कि आप शहला के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करें, लेकिन मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि किसी भी विचार-विमर्श में वामपंथियों और काँग्रेसियों को भला-बुरा ना कहे, बल्कि उनसे प्रश्न पूछे, साक्ष्य मांगें और मुद्दे पर बने रहने को कहें।

वे छटपटायेंगे, आपको उकसायेंगे, प्रधानमंत्री मोदी के लिए उलूल-जुलूल बोलेंगे, सनातन धर्म को बदनाम करेंगे, लेकिन आप विषय पर बने रहें और उनसे उन्ही के द्वारा लगाए गए आरोपों के बारे में साक्ष्य मांगें।

यही समस्या मेरे लेखों पर भी मित्र लोग उत्पन्न करते हैं। मैं लिखता कुछ हूँ, कमैंट्स मुद्दे के बाहर के होते है। उदहारण के लिए, मेरे लेख – डिजिटल युग में सूचना का मायाजाल – पर किसी ने संयुक्त राष्ट्र में अल्पसंख्यकों की परिभाषा के बारे में प्रधानमंत्री मोदी के ऊपर कटाक्ष कर दिया। जब मैंने लिखा कि ऐसी कोई परिभाषा नहीं है, तो तुरंत प्रधानमंत्री मोदी के अयोध्या ना जाने पर कटाक्ष कर दिया। मैं शिष्टाचारवश जवाब देता रहता हूँ, लेकिन मुद्दे के बाहर के कमैंट्स में मेरा समय व्यर्थ हो जाता है।

चलिए, इन सब बातों से मेरे स्वास्थ्य पर असर नहीं पड़ता। मैं चाहूँ तो उस कमेंट को इग्नोर भी कर सकता था, लेकिन मेरे स्वास्थ्य से बढ़कर राष्ट्र का हित है।

कुछ लोग यह बात करते हैं कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भाजपा को हरा देंगे तो उससे प्रधानमंत्री मोदी को कोई संदेश मिल जाएगा। इससे गलत बात कोई और नहीं हो सकती।

इन सभी राज्यों में चुनाव जीतना अत्यधिक आवश्यक है क्योंकि एक तो इससे भाजपा के समर्थकों का मनोबल बढ़ेगा, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सभा, जिसके चुनावों में जिसमें विधानसभा सांसद चुनकर भेजती हैं, में भाजपा को अगले वर्ष के अंत तक बहुमत मिलने की संभावना होगी।

अगर भाजपा इन राज्यों का चुनाव हार जाती है तो आप राज्यसभा में बहुमत देखने का स्वप्न छोड़ दीजिए। और राज्यसभा में बहुमत मिले बिना आपके और हमारे सपने पूरे नहीं होंगे।

सिर्फ अगले सात महीने तक मुद्दे पर बने रहना है। आप अपने परिवार में बहुत सी चीज़ें पांच वर्ष में पूरा नहीं कर पाते, चाहे कितना भी जोर लगा लें।

प्रधानमंत्री मोदी दूरदृष्टि और सत्यनिष्ठा से भ्रष्ट अभिजात्य वर्ग का रचनात्मक विनाश कर रहे हैं और भारत को अभिजात्य वर्ग के शिकंजे से मुक्त करा रहे हैं। अगर हमारा ध्यान ज़रा सा डगमगाया, तो क्लाउन प्रिंस सत्ता में आ जाएगा।

भारत माँ के गौरव, सम्मान, अक्षुणता और संस्कृति के संरक्षण के लिए मुद्दे पर बने रहिये.

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