साईँ के बहाने करोड़ों हिन्दुओं को सनातन से दूर करने की साज़िश!

साईं पर दो दिन पूर्व लिखे मेरे लेख पर दो मित्रों की प्रतिक्रियाएं विशेष रूप से अच्छी लगीं क्योंकि उन्होंने आगे की बात पकड़ ली थी। यहाँ इन्हीं मुद्दों पर लिखने का मन है।

पहले मित्र ने कहा :
इससे पहले कि साईं भक्त एक अलग धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त कर लें, उनको अपने साथ जोड़ कर रखना ही पड़ेगा। बीस साल के बाद होने वाले विवाद को समय रहते साध लेना एक बहुत ही अच्छा प्रयास है। इस स्ट्रेटजी के लिए मोदी जी प्रशंसा के पात्र हैं।

और दूसरी प्रतिक्रिया सतवीर जी की थी :
इस्लाम के मूल विचारों में दरगाह, मजार का स्थान नहीं होता। उनके किसी भी नबी की मजार दरगाह नहीं है, यहाँ तक कि मुहम्मद की मजार, फोटो, स्मारक नहीं हैं।

फिर भी अपनी कट्टर असहिष्णुता के बावजूद भारत में इतनी ढेरों दरगाह मजारों को कैसे सहन कर लिया जाता है?

क्योंकि वह लोग हमसे बेहतर रणनीतिकार हैं, वह लड़ने के तौर तरीके जानते हैं। हर मजार दरगाह उनके लिए भविष्य की छोटी छोटी छावनी, बंकर, चौकी का काम करेगी।

हिन्दुओं के विशाल संपदा वाले मंदिर उनके लिए बैंक समान हैं, जहां खज़ाना दबा है। उन्हें भविष्य के लिए भूमि और धन की आवश्यकता है इस्लाम के प्रसार के लिए। शिरडी के विरोध से हम उन्हें भूमि, खज़ाना और साईं भक्तो के रूप में लश्कर सौंप रहे हैं।

क्यों?

क्योंकि किसी ने साईँ को मुस्लिम घोषित किया हुआ था!

[ये भी पढ़ें : जितने भी साईँ भक्तों को आप जानते हैं, उनमें से कौन श्रीराम का शत्रु है?]

अब याद करें वो किस्से जहां गाय का कान काटकर रात को कुंए में डाला जाता था और सुबह यह बात बताकर लोगों को बताया जाता था कि आप लोगों ने यह पानी पिया तो अब आप मुसलमान हो गए।

दुर्भाग्य से इसे हमारे ही तथाकथित विद्वानों ने सत्य मानकर उन्हें मुसलमान ही माना और इस्लाम की सेना में अगली कई पीढ़ियों के लिए सैनिक भर दिये।

असम की कमलादेवी हजारिका ने केक खिलाने वाले दुष्टमति पादरी से कहा था कि तुम्हारे दिये हुए एक टुकड़ा केक खाने से मैं ईसाई बनती हूँ तो इतने दिनों से तुम मेरे घर का खाना खा रहे हो, इसी भूमि पर सांस ले रहे हो, इसी भूमि का अन्न जल ग्रहण कर रहे हो, मेरे पहले तो तुम ही हिन्दू नहीं बन गए?

दुर्भाग्य था कि यह समझ हमारे पूर्वजों ने नहीं दिखाई और अपने ही धर्मबंधुओं को अपने ही शत्रु की सेना में उसके लिए सैनिक पैदा करने भेज दिया।

साईं पर उठाये विवाद को मैं काँग्रेस का मास्टरस्ट्रोक मानता हूँ। षडयंत्र को समझते हुए भी, प्रधान मंत्री को तो छोड़िए, किसी भी हिन्दू राजनेता को शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती की बातों का खंडन करना असंभव है क्योंकि उनका पद उनकी ढाल बना हुआ था।

बाकी काँग्रेस पोषित स्वार्थ के अंधे हिन्दू नामधारियों की कमी नहीं जो इसे तुरंत शंकराचार्य पर हमला बताते और लश्कर ए मीडिया के सहारे माहौल बिगाड़ देते। कोई भी राजनेता यह रिस्क ले ही नहीं सकता।

काँग्रेस के लिए यह हिंदुओं में फूट थी, फायदे की राजनीति करने वाले एक पुराने नेता के लिए यह शिर्डी संस्थान की संपत्ति को हथियाने का लॉन्ग टर्म प्लान था और विधर्मियों के लिए ज़र ज़मीन और जनता तीनों अनायास कब्जाने का मौका था।

और इसे हमारे ही लोग बढ़ावा देते चले, देते रहे, बिना ये सोचे कि कितनी संख्या में अपने ही भाइयों को दूर कर रहे हैं, अपने ही दीर्घकालीन विरोधी बना रहे हैं, अपने ही धन और और संसाधन विधर्मियों को अपने ही हाथों नज़र कर रहे हैं।

साईं के भक्त करोड़ों हिंदुओं को भाजपा से दूर करना काँग्रेस के लिए आसान हो गया – भाजपा वालों को ही सार्वजनिक उलाहना दो कि कैसे हिन्दू हो आप जो इनको साथ लिए चले हो, जिनके उपास्य को एक पीठासीन शंकराचार्य ने मुसलमान घोषित किया है?

अब कौनसा नेता है जो एक पीठासीन शंकराचार्य को चैलेंज करे, भले ही उनकी बात के संदर्भ और उनके काँग्रेसियों से संबंध सब को पता हैं?

ऐसे में साईं के भारत भर में फैले करोड़ों हिन्दू भक्तों को मुख्य धारा से अलग न करने का एक ही तरीका था जो मोदी जी ने वहाँ जा कर अपने कृतत्व से संदेश दिया है।

मैंने यहाँ अपना विश्लेषण स्पष्ट शब्दों में रखा है और जैसे पहले भी कहा था और यहाँ भी कहता हूँ, यह केवल रणनीतिक विश्लेषण है, भाव और भक्ति पर कोई टिप्पणी नहीं।

जितने भी साईँ भक्तों को आप जानते हैं, उनमें से कौन श्रीराम का शत्रु है?

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