बौद्धिकता से खोखले पत्रकारों को क्यों झेल रहे हैं हम

एक बुझे हुये पत्रकार रविश कुमार, नरेन्द्र मोदी के इतिहासबोध को ‘सतहीकरण’ की संज्ञा देते हुये बताते हैं कि उनका कांग्रेस पर यह आरोप कि एक परिवार के पीछे देश के तमाम नायकों को भुला दिया, गलत है।

इसे साबित करने के लिये वह यह तर्क परोसते हैं कि आज भी शहरों के मुहल्लों के नाम बोस के नाम पर हैं। इसके अलावा उनके जीवन पर आधारित दर्जनों किताबें छपी हैं, चौराहों पर मूर्तियां लगी हैं, बच्चे आज भी स्कूल के फैंसी ड्रेस कंपटिशन में नेताजी बन कर जाते हैं और सबसे तगड़ा तर्क यह कि उपकार फिल्म के एक गाने में उनका नाम लिया गया है।

इन तमाम तर्कों को एक पत्रकार द्वारा गिनाये जाने के बाद यह सोचकर स्तब्ध हूं कि आखिर हमारे देश में पत्रकार पैदा करने वाली संस्थाएं बौद्धिकता से इतनी खोखली कैसे हो गयी थीं कि इस तरीके के तर्क भी उनके द्वारा गिनाये जाने लगे? क्या अब इनकी बौद्धिकता इतनी सतही हो गयी है कि सरकार और जनता में अंतर नहीं कर पा रहे हैं?क्योंकि आरोप कांग्रेस का नाम लेकर तत्कालीन सरकारों पर था, जनता पर नहीं।

फिर बात अगर कांग्रेस और उसकी सरकारों की करें तो जुलाई 1940 में कोलकाता के ‘हालवेट स्तम्भ’ जो भारत की गुलामी का प्रतीक था, के इर्द-गिर्द सुभाष की यूथ ब्रिगेड के स्वयंसेवक भारी मात्रा में एकत्र हुए और देखते-देखते वह स्तम्भ मिट्टी में मिला दिया गया था। स्वयंसेवक उसकी नींव तक की एक-एक ईंट तक उखाड़ ले गये।

यह एक प्रतीकात्मक शुरुआत थी। इसके माध्यम से नेताजी ने यह सन्देश दिया कि जैसे उन्होंने यह स्तम्भ धूल में मिला दिया है उसी तरह वे ब्रिटिश साम्राज्य की भी ईंट-से-ईंट बजा देंगे। लेकिन आज़ादी के बाद की सरकारों ने नेताजी के इस विचार को भुला दिया और गुलामी के प्रतीकों को आत्मसाथ करने के साथ ही खुद नेताजी की पहचान को भी भूलना जारी रखा।

इसकी एक बानगी यह भी है कि भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त दस्तावेज़ों के अनुसार नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में रात्रि 21.00 बजे हुई थी।

स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिये 1956 और 1977 में दो बार आयोग नियुक्त किया। दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये।

फिर 1999 में जस्टिस मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था।

2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें उन्होंने कहा कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। लेकिन इस बात के जवाब नहीं दिये गये कि किन दस्तावेज़ों के आधार पर सरकार ने उनकी मृत्यु दुर्घटना में होना बताया।

आज जब उन दस्तावेज़ों को सार्वजनिक करने की बात आती है तो सरकार के सामने यह विकट समस्या आती है कि इससे विदेशी मुल्कों के साथ बनाये गये संबंधों पर आंच आयेगी। लेकिन अगर यह दस्तावेज़ आजादी के तत्काल बाद ही सार्वजनिक हो जाते तो संभवत: ऐसी कोई समस्या नहीं आती।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दू धर्म में कोई व्यक्ति जब मरता है तो दाह संस्कार करने के बाद उसकी अस्थियों को किसी पवित्र नदी या गंगा सागर में विसर्जित करने की परम्परा है। लेकिन जापान की राजधानी टोकियो के रैंकोजी मन्दिर में रखी नेताजी की अस्थियों को भारत लाने, उनका डीएनए टेस्ट कराने और उन्हें यहां विसर्जित करने के लिये कांग्रेस ने कभी भी पहल नहीं की।

चूंकि रविश कुमार जानबूझ कर मामले का सतहीकरण करना चाहते हैं, जो उनकी पुरानी फितरत भी रही है। नहीं तो जिन तर्कों को वह नेताजी के याद की निशानी बता रहे हैं वह देश की जनता का नेताजी के प्रति सम्मान और स्नेह है, ना कि कांग्रेस और उसकी सरकारों का।

क्योंकि कांग्रेस चाहे लाख जतन कर लेती लेकिन नेताजी को नजरअंदाज़ करना उसके लिये तब भी असंभव था, आज भी देश की जनता की निगाहों से उनकी स्मृतियों को मिटा पाना नामुमकिन है। यह देश की जनता है जो कैलेंडर छपवाकर, किताबें लिखकर, शहर के मुहल्लों का नाम देकर और अपने बच्चों को फैंसी ड्रेस कंपटिशन में नेताजी बनाकर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करती रही है और करती रहेगी।

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