मंगल परिणय : सप्तपदी, हिन्दू विवाह पद्धति की आत्मा

यूं तो हिन्दू विवाह पद्धति समग्र रूप से भाव और विज्ञान से परिपूर्ण अनुष्ठान है, फिर वो चाहे हल्दी की रस्म हो, चाहे तेल चढ़ाने की या फिर सप्तपदी। किन्तु इन सभी रस्मों में पलकाचार की रस्म अद्वितीय है।

विवाह की शुरूआती रस्म बाना जीमना भी एक सामाजिक एकरसता बढ़ाने वाली और ग्रहस्थ संसार में प्रवेश करने जा रहे युगल को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करने की रस्म है। इसके पूर्व किशोर लड़के लड़कियों को माता-पिता के साथ ही समाज में भोजन हेतु निमंत्रित किया जाता है।

उद्यापन या कन्याभोज में उन्हें जरूर अकेले निमंत्रण होता है किंतु वह सम्मान उन्हें देवी-देवता स्वरूप मान कर दिया जाता है, एक सामाजिक इकाई मान कर नहीं।

बाना जीमने की रस्म द्वारा दूल्हा-दुल्हन को गरिष्ठ और पोषक आहार प्रस्तुत कर आने वाले ग्रहस्थ जीवन के लिए शारीरिक रूप से ऊर्जावान और हष्ट-पुष्ट बनाने का प्रयास होता है।

सात बार हल्दी और इक्कीस बार तेल चढ़ा कर युगल की काम ग्रन्थियों को सक्रिय किया जाता है। जब बाल विवाह प्रथा थी तब यह प्रक्रिया अधिक महत्व रखती थी, आज कल ये काम इंटरनेट से हो जाता है।

सप्तपदी अर्थात अग्नि को साक्षी मान सात वचन और सात फेरो की रस्म हिन्दू विवाह पद्धति की आत्मा है। दूल्हे द्वारा दुल्हन को दिए जाने वाले विश्व प्रसिद्ध सात वचन कन्या के अधिकारों को स्थापित करते हैं।

सात फेरों में चार में कन्या आगे रहती है जो यह दर्शाता है कि उसके नेतृत्व में ही नवयुगल धर्म, अर्थ काम, मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ प्राप्त करेगा। शेष तीन में दूल्हा आगे रहता है जो कन्या की रक्षा, पालन और काम में पुरुष को ही पहल करने का कर्तव्य बोध कराता है।

पलकाचार वह रस्म है जिसके तत्काल बाद कन्या वर पक्ष की कुटुम्बी हो जाती है, अर्थात इस रस्म के तुरंत बाद कन्या को ससुराल पक्ष का सूतक लागू और मायके पक्ष का सूतक खारिज हो जाता है।

पलकाचार की रस्म में नवयुगल को नए पलँग पर सम्मान पूर्वक बैठा कर उन्हें साक्षात लक्ष्मी-नारायण स्वरूप में पूजा जाता है। यह काम को धार्मिक अनुष्ठान बना देने की विशिष्ट हिन्दू शैली है।

पलँग पर बैठे लक्ष्मी नारायण स्वरूप युगल की परिक्रमा करते हुए कन्या का भाई दूध की धार डालते हुए सप्त सागर की रचना भी करता है। पश्चात उपस्थित सभी लोग लक्ष्मी-नारायण स्वरूप की पूजा करते है, और उनसे सृष्टि के विकास और पालन की अपेक्षा प्रकट करते है।

लेख लिखने का कारण यह है कि हाल ही में एक उच्च कोटि के विद्वान द्वारा मुझे यह बताया गया कि, पलकाचार के समय जो व्यक्ति इस युगल में लक्ष्मी-नारायण का भाव रखते हुए उनकी अर्चना करता है उसके आर्थिक अभाव तत्काल दूर होते है। अतः निकट सम्बन्धो में जिस किसी को भी यह अवसर प्राप्त हो वह अवश्य अनुभव करे।

बाल विवाह का एक फायदा यह रहता था कि जैसे बचपन से ही बाल मन में माता, पिता , एवं अन्य सम्बन्धियो से जो रिश्ता अंकित होजाता था वह अंत तक बना रहता था। जैसे किसी बालक का जो सम्बन्धी होता था फिर वो चाहे जैसा हो उसके स्थान कोई दूसरा नहीं ले पाता था, वैसे ही बाल मन में पति या पत्नी का जो चित्र बन जाता था वह उसके लिए जीवन भर अमिट रहता था, उनके लिए पति या पत्नी का अर्थ सिर्फ वही एक अक्स होता था। फिर तमाम मतभेदों के बाद भी तलाक की नोबत नहीं आती थी।

लेकिन मुझे ख़ुशी हुई की वर्तमान परिस्थितियों में अप्रासंगिक हो चुके बाल विवाह से हिन्दू समाज ने खुद को पृथक कर लिया।

नि:संदेह यौनकर्म विवाह का आधार है, किंतु केवल यही सर्वस्व नहीं

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY