हाँ मैं एक संन्यासी हूँ : साध्वी प्रज्ञा

मेरे बच्चे मुझे खींच रहे थे… मम्मा सुलाने चलो ना… हमें अकेले डर लग रहा है कमरे में… मम्मा….

और मैं जैसे पत्थर की मूरत सी बैठी थी… लग रहा था मेरा पूरा शरीर घावों से भर गया है… इतना अधिक कि अब उसमें संवेदना भी नहीं बची…. कुछ जीवंत था तो बस ये दो आँखें, जिनमें से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे…

वह बस कहती जा रही थी… बिलकुल सहज भाव से जैसे किसी और की कहानी सुना रही हो…
“वो लोग चमड़े के बेल्ट में लकड़ी का ठूंठ लगाकर मारते थे… काँटों के बिस्तर पर लेटा कर मारते थे…
सोने नहीं देते थे…
मेरे शिष्य के हाथ में बेल्ट पकड़ा देते थे… मारो अपनी गुरू को… वो बेचारा मार नहीं पाता था… मैं कहती थी मारो मुझे… ताकि तुम्हें न मारे वो… फिर भी नहीं मार पाया… तो वे खुद बेल्ट हाथ में लेकर मुझे भी मारते और उसे भी… देखो ऐसे मारा जाता है…

मैं मार खाकर भी नहीं थकती थी… वो लोग थक जाते तो बारी बारी से मारने के लिए अलग अलग लोग रखे जाते…

चोट के कारण हाथ पैर पर नील पड़ जाते, इतने सूज जाते कि लगता कि अब तो त्वचा ही फट जाएगी… तो वो लोग नमक मिले पानी को घाव पर डालते…

असहनीय पीड़ा के साथ गंदी गालियाँ और रिकॉर्डिंग सुनाते…

एक बार तो गहरी चोट के कारण मेरे फेफड़े की झिल्ली तक फट गयी…

13 दिनों तक गैर कानूनी तरीके से काल कोठरी में रखा और लगातार पीटते रहे… वह भी महिला पुलिस नहीं, ATS के पुरुष अधिकारियों द्वारा…

लोहे की हथकड़ियों में हाथ पैर फंसा कर पीटते… तलवो से लेकर सर तक… अकल्पनीय… असहनीय … अप्राकृतिक…. यदि मैं अपना ध्यान उस पर ले जाऊं तो मैं शायद ज़िन्दा न बचूं…

नारको टेस्ट, ब्रेन मेपिंग, पोलीग्राफी टेस्ट सब तीन तीन बार हुए जिसके लिए गोपनीय तरीके से चेहरे पर कपड़ा ओढ़ा देते…
तब भी मैं कहती … मैं संन्यासी हूँ इसलिए काला बुरका मुझ पर मत डालना…
इन सारे टेस्ट से भी वे कुछ न उगलवा पाए… मेरे पास शून्यता के अलावा कुछ नहीं था… सामने कैलेण्डर पर लाल बाग़ के राजा की तस्वीर बनी थी, मैं बस उसे देखती रहती थी… वे मारते रहते और मैं कहती मार डालो मुझे लेकिन झूठ स्वीकार न करूंगी…

मार डालो, तोड़ दो मुझे… मेरे अन्दर जो मेरे ठाकुर विराजमान है मेरे अन्दर जो भारत माता विराजमान है वहां तक तो मैं तुम्हें पहुँचने भी न दूंगी… क्योंकि…

मैं एक संन्यासी हूँ
इस आत्मतत्व को न मिटा सके कोई
मैं वह अविनाशी हूँ…
मैं संन्यासी हूँ ”

कल रात टीवी पर आपकी अदालत में साध्वी प्रज्ञा उपरोक्त बातें बता रही थीं… एक स्त्री को इतनी प्रताड़ना देने वाले क्या मनुष्य श्रेणी में आते हैं? भगवा आतंकवाद की झूठी धारणा स्थापित करने के लिए ऐसा नीच कृत्य करने वाली कौन सी सरकार है क्या आप जानते नहीं?

अभी तक तो सिर्फ सुना ही सुना था.. साध्वी प्रज्ञा के बारे में, उन पर हुए अत्याचारों के बारे में जैसे कर्नल पुरोहित पर हुए अत्याचारों के बारे में सुना था… आज उन्हें बोलते हुए देख रही थी…. और जैसे जैसे वह पुलिस द्वारा किये गए थर्ड डिग्री टार्चर के बारे में बताती जा रही थी वैसे वैसे उस समय की सरकार के प्रति घृणा के भाव जाग रहे थे….

मुझे अमूमन किसी से घृणा नहीं होती, लेकिन यह सब देख सुन कर लगा कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ घृणा के ही पात्र होते हैं… फिर चाहे वो कितना ही अच्छा काम करके दिखाए कभी सम्मान के लायक नहीं हो सकते… कांग्रेस सरकार ने जिस तरह से साध्वी प्रज्ञा को तोड़ने के लिए उनके शरीर के अंग अंग को तोड़ कर रख दिया है, उन्हें व्हील चेयर पर जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया है… ऐसी सरकार का यदि आप सपना देख रहे हैं तो आपसे अधिक मूर्ख इस दुनिया में कोई नहीं.

साध्वी प्रज्ञा ने आपकी अदालत में रजत शर्मा को बयान देते हुए बताया कि जब मारते मारते वो लोग थक जाते थे तो बीच बीच में अन्ताक्षरी खेलने लगते थे, और मुझसे भी कहते थे गाने को… और एक दिन मैंने भी गाया—

साध्वी प्रज्ञा गाना शुरू करे उसके पहले ही चेतना से जैसे आवाज़ उठी अवश्य कोई जादू घटित होने वाला है… और जैसे ही उन्होंने गाना शुरू किया …

“मधुबन खुशबू देता है सागर सावन देता है,
जीना उसका जीना है जो औरों को जीवन देता है…”

और मैं रोते रोते एकदम से हंस दी… अपने कई लेखों में मैंने इस गीत का ज़िक्र किया है कि पीड़ा के दिनों में मुझे पिता का सबसे पसंदीदा एक गीत बहुत संबल देता है… यह वही गीत है… और उस गीत की पंक्ति जैसे एक बार फिर आँखों से आंसू बन कर झर गयी… कि
“सूरज ना बन पाए तो … बनके दीपक जलता चल…”

एक घंटे का कार्यक्रम ख़त्म हुआ तब तक बच्चे दादा के पास सो चुके थे… इतने वर्षों में यह पहली बार हुआ होगा कि बच्चे सोने के लिए मचल रहे हो और मैं उन्हें यूं नज़र अंदाज़ कर दूं…

जीवन में अक्सर ऐसे मौके आते हैं… जब आपको अपनी प्राथमिकता तय करना पड़ती है… और मैं अपने मित्रों और सखियों से उनकी समय न दे पाने की नाराज़गी पर यही कहती हूँ… मेरे लिए राष्ट्र प्रथम है… उसके बाद सब है…

कल बच्चों को पहली बार इस बात का एहसास करवाया… लेकिन अगली सुबह उनके स्तर पर उन्हें समझाया भी… कि यह “डर” शब्द को हमें हमारे शब्दकोष से निकालना है…

क्योंकि यदि यह डर, यह भय, चाहे अपनी जान गंवाने का ही क्यों न हो या असहनीय पीड़ा पाने का ही क्यों न हो, जब तक रहेगा, वह देशभक्ति सिर्फ दिखावा होगी, जब तक आपकी देशभक्ति इस स्तर की न हो जैसे साध्वी प्रज्ञा में है… तब तक उसका कोई अर्थ नहीं…

वे इस बात को स्वीकार करती हैं कि राष्ट्र को आवश्यकता हुई तो वह राजनीति में अवश्य उतरेंगी, वे न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में है बल्कि वे कहती हैं मैं संघमय भी हूँ…

पूरे इंटरव्यू के दौरान मेरे लिए सबसे अधिक गर्व के क्षण थे जब वे अपनी कविता की पंक्तियाँ बीच बीच में सुनाती … – कि हाँ मैं एक संन्यासी हूँ… और एक संन्यासी अपनी साधना से किस स्तर की ऊर्जा संग्रहित कर सकता है, या कर सकती है, उसका भी आभास हुआ…

लोग अक्सर मुझे अपने नाम के आगे माँ जीवन लगाने का कारण पूछते हैं… उन्हें बताती भी हूँ कि यह मेरा संन्यास नाम है… लेकिन साध्वी प्रज्ञा के अनुभवों को सुनने के बाद, उनकी कविता से जो संन्यास भाव छलका वो सीधे मेरी चेतना में उतर गया… लगा आज मैं एक बार फिर दीक्षित हुई… जैसे एक बार फिर मैंने संन्यास लिया… लगा जैसे जो भगवा रंग के कपड़े उन्होंने पहन रखे हैं.. उसे मेरी चेतना ने अपना पैरहन बना लिया… और जैसे वह आज प्रज्ञावान हुई…

और हृदय से उनकी आवाज़ से एक आवाज़ और जुड़ी… कि हां मैं एक संन्यासी हूँ…

VIDEO : ले. कर्नल पुरोहित को षडयंत्रपूर्वक फंसाने की साज़िश का खुलासा

मैं ईश्वर की प्रयोगशाला हूँ

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY